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‘ग्रीन बोनस’ पहाड़ी राज्यों का हक

95,112.60 करोड़ रुपये है उत्तराखंड की पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत, हिमालयन कॉनक्लेव में हिमालयीराज्यों ने केंद्र से की ग्रीन बोनस की मांग।

हिमालयी राज्यों का दावा

  • जो राज्य प्रकृति के संरक्षण में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं, सिर्फ देश को ही नहीं, पूरे विश्व को पर्यावरणीय सेवाएं मुहैया करा रहे हैं, क्या उनकी सेवा का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए। शुद्ध हवा और साफ पानी से ज्यादा कीमती और क्या हो सकता है।

हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून

मानसून सीजन उत्तराखंड समेत असम, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भारी तबाही लेकर आता है। जिस बारिश का किसान बड़ी शिद्दत से इंतज़ार करते हैं, उसके आते के साथ ही बाढ़-भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं मुश्किलों के पहाड़ खड़े कर देती हैं। इससे पहले गर्मियों की लपट इतनी तेज़ थी कि लू से होने वाली मौतों का आंकड़ा थम नहीं रहा था। लू को भी प्राकृतिक आपदा घोषित करने की मांग की जा रही थी। जलवायु परिवर्तन की बातें हमारे आम जीवन में शामिल हो गई हैं। उत्तराखंड के साथ असम, महाराष्ट्र, केरल के प्राकृतिक आपदाओं ने भारी नुकसान किया।

इसके सबक क्या हैं? हमें वापस प्रकृति की ओर लौटना होगा। जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय करने होंगे। हमें अपने ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार कम करनी होगी। नदियों का पानी बचाना होगा। हवा का प्रदूषण दूर करना होगा। पेड़ों को कटने से बचाना होगा। क्या किसी फैक्ट्री या बड़े प्रोजेक्ट को लगाकर ये संभव है? जिसमें हवा साफ की जा सकती है, ग्लेशियर से पिघलती बर्फ़ वापस जमाई जा सकती हो।

इसके लिए हमें प्रकृति का संरक्षण ही करना होगा। जो राज्य प्रकृति के संरक्षण में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं, जो सिर्फ देश को ही नहीं, पूरे विश्व को पर्यावरणीय सेवाएं मुहैया करा रहे हैं, उनकी इस सेवा का मूल्यांकन करना ही होगा। शुद्ध हवा और साफ पानी से ज्यादा कीमती और क्या हो सकता है।

28 जुलाई को मसूरी में हुए हिमालयन कॉनक्लेव में शामिल दस राज्यों ने केंद्र से ग्रीन बोनस की मांग की। ग्रीन बोनस को हम ‘इको सिस्टम सर्विसेज’ का पेमेंट कह सकते हैं। पर्यावरणीय चिंताओं की वजह से ये राज्य बड़ी फैक्ट्रियां या बड़े प्रोजेक्ट नहीं लगा सकते। इसीलिए हिमालयी जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रीन बोनस की मांग कर रहे हैं।

मसूरी में आयोजित हिमालयन कॉनक्लेव में पहली बार 10 हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बाढ़ से जूझ रहे असम को छोड़कर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय के मुख्यमंत्री, अरूणाचल प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, मिजोरम राज्यों के प्रतिनिधि कॉनक्लेव में शामिल हुए। सभी हिमालयी राज्यों ने पर्यावरणीय सेवाओं के बदले ग्रीन बोनस की मांग की। जिससे हिमालयी राज्य की जरूरतों को पूरा किया जा सके।

 

उत्तराखंड से पूरे देश को मिलने वाली पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत क्या होगी। वर्ष 2016 में इसके अध्ययन के लिए भोपाल के इंडियन इंस्ट्टीयूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट से अध्ययन शुरू कराया गया। आईआईएफएम ने इस वर्ष जुलाई में अपनी अध्ययन रिपोर्ट मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को सौंपी। ‘ग्रीन एकाउंटिंग ऑफ फॉरेस्ट रिसोर्स, फ्रेमवर्क फॉर अदर नेचुरल रसोर्स एण्ड इंडेक्स फॉर सस्टेनेबल एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस फॉर उत्तराखण्ड स्टेट’ नाम से ये रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट में राज्य के वन संसाधनों के आर्थिक महत्व को मौद्रिक रूप में मापने का प्रयास किया गया है। राज्य 18 वन सेवाओं का फ्लो वैल्यू  95,112.60 करोड़ और तीन सेवाओं का स्टॉक वैल्यू 14,13,676.20 करोड़ रुपये का आंकलन किया गया।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के मुताबिक, हमें बहुत दिन से फॉरेस्ट रिसोर्स और उसकी अकाउंटिंग की जरूरत थी। राज्य के 70 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल होने के साथ ही ग्लेशियरों, उच्च पर्वत शिखरों तथा गंगा, यमुना एवं अन्य कई नदियों का उद्गम क्षेत्र होने के नाते इससे मिलने वाले पर्यावरणीय और अन्य स्वास्थ्य वर्धक सुविधाओं का लाभ पूरे देश को मिल रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अब हमारे पास एक अध्ययन रिपोर्ट है, जो राज्य की ग्रीन बोनस की मांग के लिए मजबूत आधार हो सकता है।

इससे पहले हिमाचल प्रदेश ने भी वर्ष 2006 में आईआईएफएम-भोपाल से पर्यावरणीय सेवाओं के आंकलन के लिए अध्ययन कराया था। उस समय हिमाचल के जंगल और पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत 13.23 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी।

पेमेंट फॉर इको सिस्टम सर्विसेज यानी पीईएस

पीईएस यानी पेमेंट फॉर इको सिस्टम सर्विसेज़ की मांग पुरानी है। वर्ष 2005 में 12वें वित्त आयोग ने फॉरेस्ट कवर यानी वनावरण के लिए राज्यों को इंसेटिव देना शुरू भी किया था। इसके तहत जंगल के संरक्षण के लिए 1,000 करोड़ रुपये पांच वर्ष के लिए दिए गए। 13वें वित्त आयोग ने वनावरण के आधार पर 5,000 करोड़ की व्यवस्था की। 14वें वित्त आयोग ने रेवेन्यू पर आधारित व्यवस्था बनायी। जिसके तहत जिस राज्य का वन क्षेत्र जितना अधिक होगा, उतनी ही उनकी हिस्सेदारी होगी। जाहिर तौर पर हिमालयी राज्य ही यहां आगे होंगे। जंगल के संरक्षण के लिए वर्ष 2015-16 में 39,300 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई। 19 राज्यों को जिसका फायदा हुआ।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अब पर्यावरणीय वस्तुओं का मूल्यांकन किए जाने को लेकर सकारात्मक बात होने लगी है। हिमालयी राज्य देश के इको सिस्टम को बेहतर बनाए रखने में अपना योगदान दे रहे हैं। उत्तराखंड के 70 फीसदी भूभाग पर जंगल हैं। जो कॉर्बन स्टॉक का प्रबंधन कर रहा है। स्वंय सेवी संस्था सेंट्रल हिमालयन इनवायरमेंट असोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय हिमालयी क्षेत्र 5.4 बिलियन टन (फॉरेस्ट बायोमास और फॉरेस्ट सॉयल) कॉर्बन को जमा कर रहा है। जो एशिया में फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईधन जैसे कोयला) से उत्सर्जित कॉर्बन के बराबर है।

इसके साथ ही हिमालयी राज्य देश के जल स्तंभ भी कहे जाते हैं। गंगा-यमुना समेत करीब एक हज़ार नदियां अकेले उत्तराखंड से निकलती हैं। स्वंय सेवी संस्था सेंट्रल हिमालयन इनवायरमेंट असोसिएशन के मुताबिक 1,200 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी हिमालयी नदियों से प्रवाहित होता है।

हिमालयी राज्य अपनी इन्हीं पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत मांग रहे हैं। इसके बदले में हिमालयी राज्यों को अपनी पर्यावरणीय सेवाओं को सुधारना भी होगा। मसलन, जंगल में आग लगने से जो कार्बन पर्यावरण में मिलता है, उसकी ज़िम्मेदारी उठानी होगी। नदियों पर बड़े बांध बनाने से जो नुकसान और जोखिम उपजता है, उसके विकल्प तलाशने होंगे।

हिमालयी राज्यों के विकास का ‘मसूरी संकल्प’

28 जुलाई को मसूरी में आयोजित हुआ हिमालयन कॉनक्लेव “मसूरी संकल्प” के साथ संपन्न हुआ। साझा भौगोलिक परिस्थितियों और प्राकृतिक संवेदनशीलता से जूझ रहे हिमालयी राज्यों ने एक कॉमन एजेंडा तैयार कर केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सौंपा। हिमालयन कॉन्क्लेव में शामिल राज्यों ने ‘‘मसूरी संकल्प’’ पारित किया। इसमें पर्वतीय राज्यों ने हिमालय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और देश की समृद्धि में योगदान का संकल्प लिया। साथ ही, प्रकृति प्रदत्त जैव विविधता, ग्लेशियर, नदियों, झीलों के संरक्षण का भी प्रण लिया। भावी पीढ़ी के लिए लोककला, हस्तकला, संस्कृति के संरक्षण की बात कही गई। पर्वतीय संस्कृति की आध्यात्मिक परम्परा के संरक्षण और मानवता के लिए कार्य करने का संकल्प लिया गया।

हिमालयी राज्यों के मुद्दे

  • पर्यावरणीय सेवाओं के लिए ग्रीन बोनस
  • देश के जल स्तम्भ हिमालयी राज्य जल शक्ति संचय मिशन में देंगे योगदान
  • नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवीकरण के लिए केन्द्र की योजनाओं में हिमालयी राज्यों को वित्तीय सहयोगनए पर्यटक स्थलों को विकसित करने में केन्द्र सरकार से मिले सहयोग
  • देश की सुरक्षा को देखते हुए पलायन रोकने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को मिले प्राथमिकता
  • हिमालय क्षेत्र के लिए अलग मंत्रालय का गठन

सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा जरूरी

हिमालयन कॉन्क्लेव में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि हिमालयी राज्य भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन सभी राज्यों का विकास केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों से पलायन को रोकने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। इसमें पंचायतीराज संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करा कर ही पलायन को रोका जा सकता है। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोग देश की सुरक्षा में आंख और कान का काम करते हैं। इससे सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि हमें विकास के साथ ही पर्यावरणीय सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा।

हिमालयी राज्यों की चिंताएं

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि हिमालय राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां समान हैं। जल की एक-एक बूंद बचाने के संकल्प में हिमालयी राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने नदियों के पुनर्जीवीकरण के लिए केन्द्रीय स्तर पर अलग से बजटीय प्रावधान की बात कही। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि इको सिस्टम सर्विसेज के लिए हिमालयी राज्यों को और प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन अत्यंत कठिन होता है। यहां की समस्याएं अन्य राज्यों से अलग हैं। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में रेल और हवाई कनैक्टीविटी विकसित किये जाने की आवश्यकता बतायी। छोटे राज्यों के सीमित संसाधनों को देखते हुए केन्द्र से वित्तीय सहायता में प्राथमिकता दिए जाने की मांग की।

सम्मेलन में मौजूद नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि हिमालयी राज्यों में विकास की बहुत संभावनाएं हैं। इसके लिए हमें टारगेट सेट करने की आवश्यकता है। पर्यटन की संभावनाओं की दृष्टि से भी सभी हिमालयन राज्य बहुत ही समृद्ध हैं। अभी यहां घरेलू पर्यटकों की अधिकता है। पर्यटन को और अधिक तेजी से विकास करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित किया जाना बहुत ही जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने वैल्यू एडेड एग्रीकल्चर को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन के माध्यम से सभी हिमालयन राज्य आपसी तालमेल से नई योजनाओं को साझा कर नीति आयोग के समक्ष रख सकते हैं।

मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड कोंगकल संगमा ने कहा कि हिमालयी राज्यों में विकास योजनाओं की लागत अधिक होती है। इसलिए केन्द्र के विभिन्न विकास योजनाओं के मानकों में इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखना, हिमालयी राज्यों की दोहरी जिम्मेदारी होती है। हमें सतत विकास के लिए रिस्पोंसिबल टूरिज्म पर फोकस करना होगा। उन्होंने पर्वतीय राज्यों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान की आवश्यकता जतायी।

नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने सम्मेलन को बेहतर शुरूआत बताते हुए पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका संवर्द्धन व इको सिस्टम के महत्व पर जोर दिया। अरूणाचल के उप मुख्यमंत्री चोवना मेन ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं के विकास पर विषेष ध्यान देना होगा।

मिजोरम के मंत्री टी.जे.लालनुनल्लुंगा ने प्राकृतिक आपदा, जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय लोगो की भागीदारी, डिजीटल कनैक्टीविटी पर जोर दिया।

सचिव, पेयजल एवं स्वच्छता भारत सरकार परमेश्वरमन अय्यर ने जल संरक्षण में स्प्रिंगशेड मैनेजमेंट को प्रभावी ढंग लागू करने की बात कही। इसमें पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक तकनीक का समन्वय उपयोगी सिद्ध होगा। जमीनी स्तर पर पैरा हाइड्रोलॉजिस्ट तैयार किये जाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में ट्रेंच/खांटी के माध्यम से जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों की प्रधानमंत्री ने सराहना की है।

सम्मेलन में नीति आयोग, पन्द्रवां वित्त आयोग और वित्त मंत्रालय ने हिमालयी राज्यों के लिए बजट में अलग से प्लान किये जाने का आश्वासन दिया।

धरती के दो ध्रुवों के बाद हिमालय दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बर्फ़ीला क्षेत्र है। इस क्षेत्र का इको सिस्टम संभालना पूरे विश्व की ज़िम्मेदारी है। साथ ही हिमालयी राज्य दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और प्रकृति के संवेदनशील रुख़ का सामना करते हैं। यहां की नदियां, जंगल, पर्वत ही इनके विकास की प्राकृतिक फैक्ट्री हैं। जिससे पूरा विश्व जुड़ा हुआ है। बदले में यहां के लोगों के बेहतर जीवन के लिए हिमालयी राज्य अपने हक़ की मांग कर रहे हैं। ताकि प्रकृति के संरक्षण का मूल्य इन्हें मिल सके।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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