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अलकनंदा में छोड़ी गईं 7 हजार महाशीर अंगुलिकाएं, नमामि गंगे के तहत जैव-विविधता संरक्षण को मिला नया बल
पहाड़ के गंभीर मरीजों के लिए बंद हो रहे हैं एम्स ऋषिकेश के दरवाजे? रेफर मरीज को लौटाने पर फिर घिरा संस्थान
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एक माह में बना जनविश्वास का मंच: हिल-मेल डिजिटल को पूर्व मुख्यमंत्री एवं हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत का मिला आशीर्वाद
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उत्तराखंड: SIR अभियान में तेजी, तीन दिन में 19 लाख लोगों तक पहुंचे गणनापत्र
उच्च शिक्षा विभाग में बंपर तबादले, 500 से अधिक शिक्षक हुए इधर से उधर

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  • अलकनंदा में छोड़ी गईं 7 हजार महाशीर अंगुलिकाएं, नमामि गंगे के तहत जैव-विविधता संरक्षण को मिला नया बल

    अलकनंदा में छोड़ी गईं 7 हजार महाशीर अंगुलिकाएं, नमामि गंगे के तहत जैव-विविधता संरक्षण को मिला नया बल0

    नमामि गंगे परियोजना के तहत अलकनंदा नदी की जैव-विविधता के संरक्षण और पुनर्जीवन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर कोलकाता, जंतु विज्ञान विभाग, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल के संयुक्त तत्वावधान में धारी देवी के निकट अलकनंदा नदी में 7 हजार महाशीर मछली की अंगुलिकाओं (फिंगरलिंग्स) का प्रवाह किया गया। यह कार्यक्रम नदी के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाने और संकटग्रस्त जलीय प्रजातियों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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  • बूंद-बूंद को तरसते पहाड़: सूखते जल स्रोतों से कैसे बचेगा उत्तराखंड?

    बूंद-बूंद को तरसते पहाड़: सूखते जल स्रोतों से कैसे बचेगा उत्तराखंड?0

    उत्तराखंड को कभी जल स्रोतों की धरती कहा जाता था। यहां के पहाड़ों से निकलने वाले प्राकृतिक नौले, धारे, गदेरे और झरने गांवों की जीवनरेखा थे। लेकिन आज वही जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। राज्य के कई गांवों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गर्मियों के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है और खेती-बाड़ी भी प्रभावित हो रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।

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