Home उत्तराखंड न्यूज़ ऐपण से खिली भारत-इंडोनेशिया की दोस्ती, पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को भेंट की उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला
उत्तराखंड न्यूज़अतुल्य उत्तराखंडदेश-विदेशशिखर पर उत्तराखंडीसरोकार

ऐपण से खिली भारत-इंडोनेशिया की दोस्ती, पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को भेंट की उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला

उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक ऐपण कला अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी अलग पहचान बना रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपनी इंडोनेशिया यात्रा के दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो को उत्तराखंड की प्रसिद्ध ऐपण कला पर आधारित भगवान शिव की कलाकृति भेंट कर दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को नई मजबूती देने का संदेश दिया। इस विशेष उपहार ने न केवल उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को भी विश्व पटल पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छह से आठ जुलाई तक इंडोनेशिया के दौरे पर रहे। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, संसद की अध्यक्ष और अन्य प्रमुख नेताओं को भारत के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कलाओं एवं हस्तशिल्प से जुड़े विशेष उपहार भेंट किए। इन उपहारों में सबसे अधिक चर्चा उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की पारंपरिक ऐपण कला की रही, जिसे प्रधानमंत्री ने भारत और इंडोनेशिया के साझा सांस्कृतिक मूल्यों तथा आध्यात्मिक संबंधों का प्रतीक बताया।

प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति सुबियांतो को भेंट की गई कलाकृति भगवान शिव को समर्पित थी। ऐपण कला में लाल गेरू की पृष्ठभूमि पर चावल के घोल से सफेद रंग की ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती हैं। यह कला उत्तराखंड की धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और प्रकृति से जुड़े जीवन दर्शन को दर्शाती है। भगवान शिव से जुड़ी यह कलाकृति भारत की आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक समृद्धि का संदेश लेकर इंडोनेशिया पहुंची, जहां भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष सम्मान और ऐतिहासिक जुड़ाव पहले से मौजूद है।

क्या है ऐपण कला

ऐपण उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की सदियों पुरानी पारंपरिक लोककला है। इसे मुख्य रूप से महिलाएं दीपावली, हरेला, जन्मोत्सव, विवाह, यज्ञ, नामकरण और अन्य मांगलिक अवसरों पर घरों के आंगन, दीवारों और पूजा स्थलों पर बनाती हैं। इस कला में लाल गेरू से भूमि या दीवार को तैयार किया जाता है और उसके ऊपर चावल के घोल, जिसे स्थानीय भाषा में बिस्वार कहा जाता है, से सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं।

ऐपण की विशेषता इसकी बारीक रेखाएं, ज्यामितीय डिजाइन, धार्मिक प्रतीक और पारंपरिक स्वरूप हैं। इसमें स्वास्तिक, कमल, सूर्य, घंटी, त्रिशूल, चरण चिह्न, अष्टदल, नवग्रह तथा अन्य शुभ प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। माना जाता है कि ऐपण केवल सजावट नहीं, बल्कि शुभता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

वैश्विक मंच पर मिली नई पहचान

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ऐपण कला को राजनयिक उपहार के रूप में चुनना उत्तराखंड की लोककला और स्थानीय शिल्पकारों के लिए गर्व का विषय माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी गया कि भारत अपनी कूटनीति में केवल राजनीतिक और आर्थिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी दुनिया के सामने सम्मानपूर्वक प्रस्तुत कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सांस्कृतिक उपहार देशों के बीच आपसी विश्वास और भावनात्मक संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में भी सांस्कृतिक समानताएं सदियों पुरानी हैं। रामायण, महाभारत और हिंदू-बौद्ध परंपराओं का प्रभाव आज भी इंडोनेशिया की संस्कृति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ऐसे में उत्तराखंड की ऐपण कला का उपहार दोनों देशों के साझा सांस्कृतिक इतिहास का भी प्रतीक बन गया।

अन्य राज्यों की कलाएं भी बनीं उपहार

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो को असम की प्रसिद्ध मनोहारी गोल्ड टी, कश्मीर की पारंपरिक पपीयर माशे बाउल और हाथी एवं पुष्प आकृतियों से सजी रिपूस सिल्वर प्लेट भी भेंट की। वहीं इंडोनेशिया की संसद की अध्यक्ष पुआन महारानी को ओडिशा का प्रसिद्ध इकत हस्तनिर्मित वस्त्र उपहार स्वरूप दिया गया। इन सभी उपहारों के माध्यम से भारत की विविध कला, शिल्प और सांस्कृतिक परंपराओं की झलक प्रस्तुत की गई।

उत्तराखंड के लिए यह अवसर विशेष महत्व रखता है, क्योंकि ऐपण जैसी लोककला को पहली बार इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंच पर प्रमुखता मिली है। इससे न केवल राज्य की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई मिलेगी, बल्कि स्थानीय कलाकारों और पारंपरिक हस्तशिल्प को भी वैश्विक स्तर पर प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री की इस पहल ने एक बार फिर साबित किया है कि भारत की लोककलाएं केवल परंपरा नहीं, बल्कि दुनिया को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति भी हैं।

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

HillMail Magazine – September 2026

HillMail Sep 2026
पत्रिकाओं के सभी अंक देखें

Related Articles

उत्तराखंड में 19 अक्टूबर को महानवमी पर सार्वजनिक अवकाश, मुख्यमंत्री धामी ने दी शुभकामनाएं

उत्तराखंड में शारदीय नवरात्र की महानवमी के अवसर पर सोमवार, 19 अक्टूबर...

उत्तराखंड में दिव्यांग युवाओं के लिए मुफ्त सिविल सेवा कोचिंग योजना शुरू, UPSC-UKPSC की करेंगे तैयारी

उत्तराखंड सरकार ने दिव्यांग युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें प्रशासनिक सेवाओं...