बूंद-बूंद को तरसते पहाड़: सूखते जल स्रोतों से कैसे बचेगा उत्तराखंड?

बूंद-बूंद को तरसते पहाड़: सूखते जल स्रोतों से कैसे बचेगा उत्तराखंड?

उत्तराखंड को कभी जल स्रोतों की धरती कहा जाता था। यहां के पहाड़ों से निकलने वाले प्राकृतिक नौले, धारे, गदेरे और झरने गांवों की जीवनरेखा थे। लेकिन आज वही जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। राज्य के कई गांवों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गर्मियों के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है और खेती-बाड़ी भी प्रभावित हो रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार जल स्रोतों के सूखने के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण जंगलों का लगातार कम होना है। पहाड़ों में चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की जगह चीड़ के जंगल बढ़ गए हैं, जो जमीन में पानी रोकने की क्षमता कम रखते हैं। इसके अलावा अनियोजित निर्माण, सड़कों की कटिंग, अंधाधुंध खनन और बढ़ता शहरीकरण भी जल स्रोतों को नुकसान पहुंचा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल गया है। पहले जहां धीरे-धीरे और लंबे समय तक बारिश होती थी, वहीं अब कम समय में तेज बारिश होती है, जिससे पानी जमीन में समाने के बजाय बह जाता है।

जल स्रोतों के सूखने का असर केवल पेयजल तक सीमित नहीं है। इससे खेती, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी सीधा प्रभाव पड़ रहा है। कई गांवों में खेती छोड़ने की नौबत आ गई है। पानी की कमी के कारण पलायन बढ़ रहा है और लोग रोजगार व बेहतर सुविधाओं की तलाश में शहरों की ओर जा रहे हैं। यह संकट पर्यावरण और सामाजिक संरचना दोनों के लिए चुनौती बन चुका है।

हालांकि इस समस्या का समाधान संभव है, यदि सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें। सबसे पहले जल स्रोतों के संरक्षण को जन आंदोलन बनाना होगा। गांव स्तर पर पारंपरिक जल स्रोतों की सफाई और पुनर्जीवन का कार्य नियमित रूप से होना चाहिए। पुराने नौले-धारों की मरम्मत और उनके आसपास अतिक्रमण रोकना बेहद जरूरी है।

इसके साथ ही बड़े स्तर पर जलागम संरक्षण कार्य किए जाने चाहिए। पहाड़ों में चौड़ी पत्ती वाले पेड़ जैसे बांज, बुरांश और उतीस का रोपण बढ़ाना होगा। ये पेड़ जमीन में नमी बनाए रखने में मदद करते हैं और जल स्रोतों को recharge करते हैं। वर्षा जल संचयन को भी अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। गांवों और शहरों में घरों की छतों से बारिश का पानी संग्रहित कर उसे जमीन में उतारने की व्यवस्था की जा सकती है।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि विकास कार्यों में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देना जरूरी है। सड़क निर्माण और भवन निर्माण के दौरान वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं ताकि जल स्रोतों को नुकसान न पहुंचे। खनन और पेड़ों की कटाई पर सख्त नियंत्रण भी आवश्यक है।

उत्तराखंड में कई स्थानों पर लोगों ने सामूहिक प्रयासों से सूखते जल स्रोतों को फिर से जीवित किया है। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और टिहरी के कई गांव इसके उदाहरण हैं, जहां ग्रामीणों ने श्रमदान कर जल संरक्षण के सफल मॉडल तैयार किए। यह दिखाता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो पहाड़ों का पानी बचाया जा सकता है।

उत्तराखंड का भविष्य उसके जल स्रोतों से जुड़ा है। यदि पानी बचेगा तो गांव बचेंगे, खेती बचेगी और पलायन रुकेगा। इसलिए जरूरत केवल योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि जमीन पर प्रभावी कार्रवाई करने की है। जल संरक्षण को जीवन का हिस्सा बनाकर ही उत्तराखंड को आने वाले जल संकट से बचाया जा सकता है।

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