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22वें अंतरराष्ट्रीय ‘भारत रंग महोत्सव’ में ‘इंद्रसभा’ के मंचन ने छोडी अमिट छाप

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्वाधान में आयोजित हो रहे, 22वें अंतरराष्ट्रीय 'भारत रंग महोत्सव' में पर्वतीय कला केन्द्र दिल्ली के गीतनाट्य 'इंद्रसभा' के मंचन ने दर्शकों व आयोजकों के मध्य अमिट छाप छोड़ अपार ख्याति अर्जित की। उक्त गीतनाट्य का प्रभावशाली नाट्य निर्देशन अमित सक्सेना, नृत्य संरचना दिक्षा व दिव्या उप्रेती द्वारा बखूबी की गई थी। अमानत लखनवी द्वारा रचित तथा स्व. मोहन उप्रेती द्वारा संगीत बद्ध इस गीतनाट्य के संगीत को बबीता पांडे द्वारा असिस्ट किया गया।

सी एम पपनैं

विगत सौ वर्ष पूर्व की लोक परंपराओं पर अमानत लखनवी की रचना में ब्रज व अवध की रामलीला, रासलीला, भडैती इत्यादि में प्रयुक्त राग-रागिनियों की गायन शैली को स्व. मोहन उप्रेती द्वारा तत्कालीन संगीत की धुनों का प्रयोग कर आधुनिक रंगमंच पर नृत्य और संगीत के ताने-बाने का मिश्रण कर मंचित करना, मंचित गीतनाट्य इंद्रसभा की सफलता का मुख्य पैमाना माना जा सकता है।

मंचित गीतनाट्य ‘इंद्रसभा’ का श्रीगणेश राजा इंद्र के दरबार में प्रवेश करने तथा परियों के गीत-नृत्य की फरमाइस से आरंभ होता है। पुखराज परी, नीलम परी व लाल परी के गीतों व नृत्यों का लुफ्त लेकर राजा इंद्र सब्ज परी को सुनना चाहता है। लेकिन निद्रा के कारणवश राजा इंद्र सो जाता है। यह देख सब्ज परी बाग में चली जाती है। काले देव को किसी सहजादे के संग हुई अपनी प्रेम व्यथा से अवगत कराती है। कहती है उस सहजादे को यहां ले कर आओ। काला देव द्वारा उक्त सहजादे को बाग में हाजिर कर दिया जाता है।

यह सहजादा गुलफाम है, जो सब्ज परी के द्वारा किए जा रहे प्यार के इजहार के बावत अवगत होता है। उसे यह भी अवगत होता है यह सुंदर परी इंद्र के दरबार में नाचती गाती है। गुलफाम सब्ज परी से कहता है, उसे इंद्र दरबार में जाकर नाच गाना देखना है। सब्ज परी के मना करने पर भी गुलफाम नहीं मानता है। विवश होकर सब्ज परी गुलफाम को रिश्क लेकर उसकी ख्वाइस पूरी करती है, उसे दरबार के समीप छिपा कर। लाल देव छुपे गुलफाम को देख लेता है। इंद्र देव को परीस्तान मे आदम जाद मौजूद होने की सूचना देता है। राजा इंद्र गुस्से में लाल-पीला होकर गुलफाम को कैद व सब्ज परी के पंख नुचवा कर दरबार से बाहर करवा देता है।

सब्ज परी जोगन वेश रख, गुलफाम को खोजने निकल पडती है। काला देव इंद्र को सूचित करता है परीस्तान मे एक सुंदर जोगन आई है। बखूबी गायन भी करती है। गीतों का रसिया इंद्र जोगन को सभा में बुलाता है। गीत गायन के लिए कहता है। जोगन बनी सब्ज परी इंकार करने के बाद मान जाती है। अपने गीत गायन का प्रभाव इंद्र पर डालती है। इंद्र खुश होकर जोगन को पान, रुमाल, हार उपहार में देने की कोशिश करता है। जोगन हर बार उपहार लेने से मना कर देती है। इंद्र अंत मे मुह मांगा इनाम मांगने को कहता है। जोगन अपने प्यार गुलफाम को इनाम के तहत मांगती है। तब इंद्र को पता चलता है, जोगन सब्ज परी है। इंद्र, की गई गलती पर पछताता है। गुलफाम को सब्ज परी के हवाले कर देता है। सब्ज परी व गुलफाम का दरबार में मिलन होता है। सभी परिया एकत्रित होकर मुबारक गीत गाती हैं। यही पर इस प्रभावशाली गीतनाट्य का देर तक बजती तालियों की गडगड़ाहट के मध्य अंत होता है।

संसार के बहुत से प्रसिद्ध नाटक तत्कालीन समय के किस्से-कहानियों से लिए गए हैं। ’इंद्रसभा’ गीत नाट्य की गाथा जिसमे गीत, गजले, पद्य से लिखे हुए संवाद हैं, हिंदूधर्म की पवित्र पुस्तकों में कथित व वर्णित गाथाओं से लिए गए हैं। ’मसनवी गुलजारे नसीम’ नामक पुस्तक में भी इंद्र की सभा में नाचने-गाने वाली परियों का जिक्र आता है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फलक पर ख्याति प्राप्त, सांस्कृतिक संस्था ’पर्वतीय कला केन्द्र दिल्ली’ द्वारा मंचित गीतनाट्य ’इंद्रसभा’ के किरदारों में महेन्द्र लटवाल-इंद्र, राहुल-गुलफाम, लाल देव-खिला नंद भट्ट, काला देव-जितेन्द्र कुमार तथा सब्ज परी की भूमिका में क्रमशः चंद्रा बिष्ट व स्वेता चांद, पुखराज परी-दीक्षा उप्रेती, लाल परी-दिव्या उप्रेती तथा नीलम परी- पुष्पा जोशी द्वारा प्रभावशाली भूमिकाएं निभाई गयी। अन्य नृत्यकारों व नृत्यंग्नाओं में गोबिंद महतो, नवीन चंद, सावित्री छेत्रि व रितु नायर तथा कोरस गायकों में पंकज कुमार रावत, हर्ष मनु, दीपक राना, जोगिंदर सिंह, सोनिया मनराल जोशी, धनलक्ष्मी महतो, नीमा गुसाईं इत्यादि द्वारा कर्ण प्रिय कोरस गायन कर, गीत नाट्य को सफलता के शिखर पर पहुचाने में सराहनीय प्रयास किया गया।

मंचित गीतनाट्य कलाकारों की रूप सज्जा कार्य हरि खोलिया द्वारा, प्रोपर्टी कार्य भुवन रावत द्वारा, सैट व लाइट डिजाइनिंग श्याम कुमार साहनी द्वारा बेहतरीन तरीके से की गई थी। बबीता पांडे के सानिध्य में संगीत वाद्ययंत्रों हारमोनियम में हेमंत सेकिया, तबला व परकशन मे मनीष कुमार, सितार मे सईद खान, सारंगी मे अनिल मिश्रा तथा ढोलक मे मनीष गंगानी की वाद्ययंत्रों की संगत ने श्रोताओं के मध्य गहरी छाप छोडी।

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