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परीक्षा का बुखार: हर कोई ‘जिंडी’ को लेकर चिंतित!

कक्षा दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के नज़दीक आते ही, पूरा देश मानो परीक्षा-बुखार की चपेट में आ जाता है। वर्षों से फरवरी और मार्च भय, चिंता और भावनात्मक तनाव के चरम महीने बन गए हैं। यह तनाव केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों और पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में ले लेता है।

— देवेंद्र कुमार बुडाकोटी

हर कोई जिंडी को लेकर चिंतित है, जो इस वर्ष कक्षा बारहवीं की बोर्ड परीक्षा देने जा रहा है। उसकी मां, बड़ा भाई, दादी, ताऊजी, ताईजी, उनके बच्चे और यहां तक कि उनके जीवनसाथी भी पूरी तरह सतर्क हैं। यह सामूहिक चिंता भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था की उस गहरी निकटता को दर्शाती है, जहां किसी एक व्यक्ति की शैक्षणिक यात्रा पूरे परिवार की साझा ज़िम्मेदारी बन जाती है। जिंडी के आसपास के लोग उसकी पढ़ाई की समय-सारिणी, पुनरावृत्ति की योजना और यह कि उसने कितना पाठ याद कर लिया है, इन्हीं विषयों पर लगातार चर्चा करते रहते हैं।

यह चिंता केवल कमजोर छात्रों तक सीमित नहीं है। मेधावी और प्रतिभाशाली छात्र और उनके माता-पिता भी इस बुखार से अछूते नहीं हैं। ‘परीक्षा-वायरस’ सर्वव्यापी है। निकट परिवार से आगे बढ़कर पड़ोसी तक इससे संक्रमित हो जाते हैं। कई वयस्कों के लिए यह समय उनकी अपनी परीक्षा-संबंधी पीड़ादायक स्मृतियों को पुनः जीवित कर देता है। अनजाने में हममें से अनेक लोग उस अधूरे तनाव को आज भी ढोते रहते हैं, जो हमारी मानसिक सेहत को प्रभावित करता है और यह तय करता है कि हम बच्चों पर पड़ने वाले दबावों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।

भारत में शिक्षा नीति में अनेक सुधार हुए हैं नवीनतम सुधार व्यापक और महत्वाकांक्षी है। इसके बावजूद शिक्षा व्यवस्था आज भी मुख्यतः परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। दशकों से स्कूली शिक्षा परीक्षाओं, रैंकिंग और सफलता की एक संकीर्ण परिभाषा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यह व्यवस्था रटंत विद्या और पाठ्यपुस्तक आधारित स्मृति को बढ़ावा देती है, जबकि आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और समग्र विकास की उपेक्षा करती है।

हालांकि नई शिक्षा नीति व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास पर ज़ोर देती है, लेकिन ये अवधारणाएं अभी तक विद्यालयी पाठ्यक्रमों और व्यावहारिक प्रशिक्षण ढांचों में ठोस रूप नहीं ले पाई हैं। नृत्य, नाटक, रंगमंच, संगीत, कला और खेल जैसी गतिविधियां आज भी ‘गैर-शैक्षणिक’ या ‘सह-पाठ्यक्रम’ के रूप में देखी जाती हैं, मानो उनका बौद्धिक और मानसिक विकास में कोई गंभीर योगदान न हो। दुर्भाग्यवश, नई पीढ़ी के माता-पिता भी तेजी से शिक्षा की इसी सीमित समझ को आत्मसात कर रहे हैं।

कुछ दशक पहले ट्यूशन कक्षाएं मुख्यतः कमजोर छात्रों के लिए होती थीं। आज ट्यूशन और कोचिंग सामान्य चलन बन चुकी हैं, जिनका उद्देश्य केवल अधिकतम अंक और बेहतर ग्रेड हासिल करना है। छात्रों को एक के बाद एक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। पहले स्कूल में, फिर प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए। राहत की कोई गुंजाइश नहीं बचती। जो छुट्टियां ट्रेकिंग, कैंपिंग, साइक्लिंग, यात्रा या ग्रामीण जीवन को समझने में बिताई जा सकती थीं, वे अब कोचिंग और पुनरावृत्ति कक्षाओं में खप जाती हैं। प्रतिस्पर्धी दबावों के चलते बचपन और किशोरावस्था महज़ ‘तैयारी का दौर’ बनकर रह जाते हैं।

नई शिक्षा नीति के आलोक में सरकार को गुरुकुल आधारित शिक्षा, वैकल्पिक शिक्षण मॉडल और होम-स्कूलिंग को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए। ऐसी व्यवस्था विकसित होनी चाहिए कि 17 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका कोई भी छात्र किसी भी राज्य या केंद्रीय बोर्ड के अंतर्गत सीधे कक्षा बारहवीं की परीक्षा में सम्मिलित हो सके। छात्रों को नृत्य, नाटक, संगीत, कला, खेल और व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे विषय चुनने का विकल्प मिलना चाहिए, जिनका समुचित मूल्यांकन और ग्रेडिंग हो, ताकि वे सम्मानजनक और सार्थक करियर मार्ग अपना सकें।

यह अत्यंत चिंताजनक है कि ज्ञान और कौशल प्रदान करने के लिए बनाई गई शिक्षा प्रणाली छात्रों में भय, चिंता और अवसाद उत्पन्न कर रही है, जो आगे चलकर आजीवन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है। भारत में बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य संकट की जड़ों को कौन संबोधित करेगा? नीति-निर्माताओं और निर्णयकर्ताओं को इस पर गंभीर आत्ममंथन करना होगा, ताकि हम ऐसे नागरिकों का निर्माण कर सकें जो भय से नहीं, जिज्ञासा से सीखें, और एक प्रगतिशील, विकसित राष्ट्र की मज़बूत नींव रखें।

लेखक समाजशास्त्री हैं।

HillMail Magazine – September 2026

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