गौ माता को राष्ट्र माता का दर्ज दिलाने के लिए देश भर में अभियान चला रहे गोपाल मणि महाराज का मानना है कि गायों को सुरक्षा के नाम पर गौशाला में छोड़ दिया जाना, महज एक इमरजेंसी व्यवस्था है। जरूरत इस बात की है कि लोगों को गाय के प्रति संवेदनशील बनाया जाए। उन्हें गाय के आर्थिक और सामाजिक महत्व को लेकर जागरुक किया जाए…। गोपाल मणि महाराज का हिल-मेल को दिये गये साक्षात्कार के मुख्य अंश:
गौमाता-राष्ट्रमाता अभियान क्या है?
भारत की जो संस्कृति है वह गाय पर आधारित है। इस देश में गायत्री समझकर उपासना की जाती थी। लेकिन आज पशु समझकर उस गाय का तिरस्कार इस देश में हो रहा है। इसलिए गौमाता को राष्ट्रमाता का सम्मान मिलना चाहिए, इसी प्रमुख मांग के साथ गौमाता-राष्ट्रमाता अभियान शुरू किया गया है। इस अभियान का मंत्र है, अभी नहीं तो कभी नहीं। यानी अब जागिए और गौमाता को उसका सम्मान दिलाइये। इसमें हमारा प्रयास युवाओं को बड़ी संख्या में जोड़ने का है।
गाय के महत्व पर प्रकाश डालिए?
गाय भारतीय संस्कृति की मूल है। हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों में गाय को माता का उपनाम दिया गया है। इस देश की संस्कृति का मूल आधार गाय है। हमारे यहां ऋषियों-मुनियों ने गाय को ही गायत्री कहा है। जब तक भारत में गाय को माता के रूप में देखा गया, तब तक भारत विश्वगुरु था, तब तक भारत आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थिति से विश्व का सिरमौर था। लेकिन बाद में अंग्रेजों के प्रभाव में हमारे यहां गाय को पालतू पशु के रूप में देखा जाने लगा। समस्या तभी से शुरू हुई, जबसे गाय को पशु के रूप में देखा गया। उत्तराखंड में तो गाय का विशेष महत्व है। यहां भगवान नारायण खुद बदरी गाय की रक्षा के लिए बदरीनाथ के रूप में इस धरा पर आए। गाय देवत्व प्रदान करने वाली है। इसलिए उसे सुरभि कहा गया है। गाय को हटा दें तो देवत्व नहीं रहेगा और आसुरीपन समाज में छा जाएगा। जिस गाय के लिए भगवान ने 24 अवतार लिए, जिसे चराने के लिए भगवान श्रीकृष्ण नंगे पैर जंगल चले गए, वही गाय आज सड़कों पर प्लास्टिक, कचरा खाती दिख रही है। देवत्व कैसे आएगा।
क्या गौरक्षा केवल एक धार्मिक बिंदु है?
देखिए, गाय आस्था का विषय है और उसका अपना महत्व भी है। जैसे आज हमारे देश में तीन चीजें मंगाई जा रही हैं –खाद, रसोई गैस, डीजल पेट्रोल। लेकिन इन सबका विकल्प गाय है। गाय का गोबर इनका सर्वोत्तम विकल्प है। वैज्ञानिकों ने भी कहा है कि गोबर की खाद दुनिया की सर्वोत्तम खाद है। गोबर गैस ईंधन का एक बड़ा विकल्प बन सकता है। हम आर्थिक रूप से भी गाय तो देखें तो गाय का गोबर हर लिहाज से उपयोगी है।
गाय के नाम पर राजनीति और हिंसा बहुत हो रही है?
यह सब अज्ञान के कारण हो रहा है। जानकारी न होने के कारण ऐसी चीजें हो रही हैं। किसी धर्म में गाय की कुर्बानी की बात नहीं है। मुस्लिम धर्म में भी नहीं। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने तो गौमाता की सेवा का संकल्प लिया ता। ‘चण्डी दो बार’ में वह लिखते हैं :-
यही देहु आज्ञा तुर्क गाहै पाऊं।
गऊ घात का दोष जग सिऊ मिटाऊं।।
दरअसल, यह हमारा आपसी बैर है। अगर हम किसी बात में आपसे सहमत नहीं हैं, तो आप जो करेंगे उसका उल्टा करेंगे। इसलिए हमें गाय की आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोम को समझना होगा। इससे सामुदायिक द्वेष स्वतः ही खत्म हो जाएगा। कहते हैं, जिस परिवार में गाय बंधी होती है, वह परिवार भी बंधा रहता है। आज भी जो परिवार गाय पालते हैं, मिलकर रहते हैं। हमारे यहां भागवत में एक प्रसंग है, कृष्ण को यशोदा जी ने बांध दिया, कौन सी रस्सी से बांधा, इस पर किसी ने कभी गौर नहीं किया। वास्तव में वह रस्सी दांव है। हमारे पहाड़ में उस रस्सी को दांव कहते हैं। जिस रस्सी से आप गाय को बांधते हैं, उस रस्सी से परिवार, समाज, देश, विश्व को बांधने की बात छोड़ो, उससे तो आप भगवान को भी बांध सकते हैं, तो गाय कैसे समाज को बांट सकती है।
गायों के संरक्षण के लिए गौशालाएं तो बना दी जाती हैं, लेकिन हाल में जो खबरें आईं हैं, वह काफी विचलित करने वाली हैं, गाय कैसे बचेगी?
हमसे लोग सवाल करते हैं कि गौशाला क्या है, इसे बनाने का पुण्य कितना मिलता है। इस पर हमारा एक ही उत्तर है कि जिस प्रकार माता-पिता के लिए वृद्धाश्रम बनाना, उन्हें वहां भेजने पर जो स्थिति होती है, वही स्थिति गाय को भी ऐसी गौशालाओँ में भेजने पर भी होती है। अब वह पुण्य देता है या पाप का भागी बनाता है, वह समाज खुद तय करे। गौशाला एक इमरजेंसी व्यवस्था है, हकीकत यह है कि इस देश में हर घर में गाय होती थी। हर आंगन में गाय बंधी होती थी। गौशाला तो थी ही नहीं। खासकर सरकारी। वहां गाय की सही सेवा नहीं हो सकती। हालांकि कुछ लोग गौशाला में गाय की सेवा बड़े दिल से करते हैं, लेकिन लोगों को जागृत करना होगा, ताकि वे गाय पालने अथवा उसके संरक्षण केलिए आगे आएं।


Leave a comment