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पलायन की पीड़ा कुरेद गया चुनाव

वर्षा सिंह, देहरादून

उत्तराखंड में भले ही लोकतंत्र का उत्सव खत्म हो गया हो, लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद उत्तराखंड में मतदान प्रतिशत पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में बढ़ नहीं सका। निर्वाचन आयोग के लिए ये आंकड़ें निराशा देने वाले हैं। क्या राज्य की जनता मतदान के प्रति इतनी उदासीन है, मतदान के लिए लोगों ने उत्साह क्यों नहीं दिखाया, स्वीप कार्यक्रम के तहत पिछले एक वर्ष से चलाए जा रहे मतदादाता जागरुकता के कार्यक्रम क्यों सफल नहीं हुए, अब इन सब सवालों की पड़ताल की जा रही है। आंकड़े साफ करते हैं कि पलायन का असर मतदान पर स्पष्ट तौर पर पड़ा है। ये आंकड़े एक किस्म की चेतावनी भी हैं कि यदि हमने पलायन रोकने के लिए तत्काल और त्वरित तौर पर कार्रवाई नहीं की, तो आने वाले समय में स्थिति और मुश्किल होती जाएगी।

पलायन की वजह से पहाड़ में मतदान कम

हालांकि इस बार के चुनावों में मैदानी और पर्वतीय सभी जिलों में पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदान प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है। पहले भी चुनावों में मैदानी क्षेत्रों के मुकाबले पर्वतीय क्षेत्रों में मतदान कम होता रहा है। पौड़ी और अल्मोड़ा में अन्य ज़िलों की तुलना में मतदान प्रतिशत कम रहा, यही दो ज़िले पलायन से सर्वाधिक प्रभावित हैं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक गढ़वाल, अल्मोड़ा और टिहरी संसदीय क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों में मैदानी जिलों की तुलना में 14 फीसदी कम मतदान हुआ है। पिछले लोकसभा चुनावों में भी मतदान की यही स्थिति रही। निर्वाचन आयोग के मुताबिक जो लोग नौकरी-रोजगार या अन्य वजहों से अपना घर छोड़कर चले गए हैं, वे सिर्फ वोट देने के लिए वापस नहीं आए।

केंद्रीय निर्वाचन आयोग के निर्देश पर राज्य में पिछले एक वर्ष से स्वीप (सिस्टमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिशिपेशन) कार्यक्रम चलाया जा रहा था। इस कार्यक्रम में तहत स्कूल-कॉलेजों को ख़ासतौर पर फ़ोकस किया गया था। नुक्कड़ नाटक, स्कूली बच्चों की रैली, मतदाता जागरुकता मेला और विभिन्न प्रतियोगिताओं के ज़रिये मतदान के प्रति लोगों का रुझान बढ़ाने की कवायद की गई। लेकिन चुनाव के नतीजे बताते हैं कि ये कोशिश काफी नहीं थी।

पहाड़ और मैदान में मत प्रतिशत का अंतर

देहरादून स्थित संस्था गति फाउंडेशन ने चुनाव को लेकर डेमोक्रेसी एंड सिटीजन इंगेजमेंट प्रोग्राम चलाया। लोगों को मतदान के प्रति जागरुक करने के साथ ही मतदान के बाद मिले आंकड़ों का विश्लेषण भी किया। गति फाउंडेशन के मुताबिक राज्य बनने के बाद चारों लोकसभा चुनाव में लगातार पहाड़ और मैदान के बीच मत प्रतिशत का अंतर बढ़ा है।

वर्ष मत प्रतिशत का अंतर(पर्वतीय क्षेत्र-मैदानी क्षेत्र)
2004 4 प्रतिशत
2009 12 प्रतिशत
2014 15 प्रतिशत
2019 14 प्रतिशत

संस्था ने अपने विश्लेषण में पाया कि सल्ट, चौबट्टाखाल, लैंसडौन, प्रतापनगर, घनसाली, रानीखेत, द्वाराहाट, देवप्रयाग, टिहरी, जागेश्वर और पौड़ी विधानसभा क्षेत्र में मतदान प्रतिशत 50 फीसदी से भी कम रहा है।

चारधाम में बढ़ा मतदान

हालांकि चारों धाम के विधानसभा क्षेत्रों ने पर्वतीय जिलों की लाज बचायी है। यहां मत प्रतिशत अपेक्षाकृत ठीक रहा। केदारनाध धाम विधानसभा क्षेत्र का मत प्रतिशत तो राज्य के औसत से बेहतर रहा।

चार धाम मतदान प्रतिशत
केदारनाथ 62.71
बदरीनाथ 58.48
गंगोत्री 58.75
यमुनोत्री 58.87

ऑनलाइन वोटिंग व्यवस्था हो तो

उत्तरकाशी के रहने वाले विशाल रावत (बदला हुआ नाम) परिवार समेत दिल्ली में नौकरी करते हैं। मतदान के दिन उनका मन तो अपने गांव में अटका हुआ था। लोकतंत्र के महापर्व में वे खुद शामिल नहीं हो पाए, न ही उनका परिवार। जहां एक-एक वोट बेहद कीमती है, उनके परिवार के चार वोट खाली चले गए। विशाल को इसका अफसोस है। लेकिन दिल्ली में रहते हुए, अपने बजट और नौकरी को देखते हुए, वे मतदान नहीं कर पाए। उन्होंने अपने वोटर कार्ड में पता भी नहीं बदलवाया था। विशाल जैसे कितने ही लोग हैं, जो इस तरह की वजहों से मतदान नहीं कर पाए। मतदान प्रतिशत बढ़ाया जा सके और विशाल जैसे लोगों को मतदान प्रक्रिया में शामिल किया जा सके, क्या इसके लिए ऑन लाइन वोटिंग जैसी कोई व्यवस्था संभव है।

विश्व में कुछ देशों ने ऑन लाइन वोटिंग प्रक्रिया अपनायी है या इसके लिए कोशिश की है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरलैंड, फिनलैंड, फ्रांस, यूएसए जैसे कुछ देश कुछ चुनावों में ऑन लाइन वोटिंग प्रक्रिया में गए। लेकिन इसे लेकर मतभेद, बहस और अदालतों के हस्तक्षेप के चलते अभी इस मुद्दे पर पक्के तौर पर कुछ नहीं किया जा सका है। कुछ देशों में सेना के जवानों और देश से बाहर रहने वाले लोगों के लिए ऑन लाइन वोटिंग व्यवस्था अपनायी गई है।

पलायन का इलाज जरूरी

पलायन की वजह से उत्तराखंड की स्थिति चिंतनीय है। राज्य के सैंकड़ों गांव भूतहा घोषित किये जा चुके हैं। सैंकड़ों गांवों से 50 फीसदी लोग बेहतर जीवन के लिए पलायन कर चुके हैं। इस बार के चुनावों में भी कई गांवों ने मतदान का बहिष्कार करने का एलान कर दिया था, क्योंकि उनके गांव में सड़क नहीं पहुंची। दुर्गम क्षेत्रों में मतदान के लिए आवाजाही अपने आप में मुश्किल भरा काम है। राज्य के पर्वतीय ज़िले सचमुच के विकास का इंतज़ार कर रहे हैं। गांव में सड़क का, रोजगार का, बिजली-पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। यदि यहां हालात नहीं सुधरे तो बची-खुची आबादी भी धीरे-धीरे अपने गांव-घरों से कूच करती रहेगी और हालात सिर्फ मतदान के लिहाज़ से चिंताजनक नहीं होंगे, बल्कि देश की सुरक्षा के लिहाज़ से भी। लोकसभा चुनाव के नतीजों में पहाड़ के इस दर्द को समझा जा सकता है।

पलायन उत्तराखंड की स्याह हकीकत

पलायन उत्तराखंड की सबसे प्रमुख समस्या है। जो गांव के गांव खाली कर रही है। पलायन की जो वजहें हैं वो सीधे तौर पर राज्य के विकास से जुड़ती हैं। पिछले साल ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग ने उत्तराखंडके गांवों में पलायन की स्थिति पर एक अंतरिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। जनवरी- फरवरी, 2018 में उत्तराखंड की 7,950 ग्राम पंचायतों का सर्वेक्षण ग्राम्य विकास विभाग के माध्यम से कराया गया था। चूंकि 2011 की जनगणना के बाद पलायन पर राज्यव्यापी तथ्य एवं आकंड़ों की कमी थी इसलिए आयोग ने राज्य के सभी जिलों की ग्राम पंचायतों का व्यापक सर्वेक्षण कराया। ग्राम पंचायतों से पलायन के विभिन्न पहलुओं पर हासिल तथ्यों एवं आकड़ों का आंकलन किया। पलायन आयोग की ये अंतरिम रिपोर्ट राज्य में सामाजिक-आर्थिक स्थिति और मौजूदा पलायन से संबंधित आंकड़ों को दर्शाती है। इस रिपोर्ट में ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों ने पूरे राज्य में किए गए सर्वेक्षण से पलायन से संबंधित आंकड़ो का विश्लेषण किया। यह रिपोर्ट पहाड़ की स्याह हकीकत को बयां करती है।


एक दशक में जो छोड़ गए अपने घर, अपना गांव

• सर्वेक्षण के अनुसार ग्राम पंचायत स्तर पर मुख्य व्यवसाय कृषि 43 प्रतिशत एवं मजदूरी 33 प्रतिशत है।
• पिछले 10 वर्षों में 6,338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 व्यक्ति अस्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। यह लोग घर में आते-जाते रहते हैं, लेकिन अस्थायी रूप से रोजगार के लिये बाहर रहते हैं।
• इसी अवधि में 3,946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं।
• ग्राम पंचायतों से 50 प्रतिशत लोगों ने आजीविका एवं रोजगार की समस्या के कारण, 15 प्रतिशत ने शिक्षा की सुविधा एवं 8 प्रतिशत ने चिकित्सा सुविधा के अभाव के कारण पलायन किया है।

• ग्राम पंचायतों से पलायन करने वालों की आयु 26 से 35 वर्ष वर्ग में 42 प्रतिशत, 35 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 29 प्रतिशत तथा 25 वर्ष से कम आयु वर्ग में 28 प्रतिशत है।
• ग्राम पंचायतों से 70 प्रतिशत लोग प्रवासित होकर राज्य के अन्य स्थानों पर गए तथा 29 प्रतिशत राज्य से बाहर एवं लगभग 01 प्रतिशत देश से बाहर गए।


सीमा के गांव हुए खाली, कुछ जगहों पर रिवर्स माइग्रेशन भी

पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा से सटे गांवों में आबादी तेज़ी से घट रही है। जबकि कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां स्वरोजगार के ज़रिये लोगों ने रिवर्स माइग्रेशन किया है। राज्य में लगभग 734 राजस्व ग्राम/तोक/मजरा 2011 की जनगणना के बाद गैर आबाद हो गए हैं। इनमें से 14 अंतर्राष्ट्रीय सीमा से हवाई दूरी के 5 किमी के भीतर हैं। राज्य में 850 ऐसे गांव हैं, जहां पिछले 10 वर्षों में अन्य गांव/शहर/कस्बों से पलायन कर उस गांव में आकर लोग बसे हैं। राज्य में 565 ऐसे राजस्व ग्राम/तोक/मजरा हैं, जिनकी आबादी 2011 के बाद50 प्रतिशत घटी है। इनमें से 6 गांव अंतर्राष्ट्रीय सीमा से हवाई दूरी के 5 किमी के भीतर है।


उत्तराखंड में अब 1668 घोस्ट विलेज

पलायन के चलते राज्य में घोस्ट विलेज यानी भुतहा गांवों की संख्या बढ़कर 1668 पहुंच गई है। सात सालमें 700 गांव वीरान हो गए। इससे पहले वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में भुतहा गांवों की संख्या 968थी। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के पांच पहाड़ी जिलों रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा में सबसे अधिक पलायन हुआ है। यहां के गांवों में पलायन राज्य औसत से अधिक है। हालांकि पहाड़ के गांवों से 70 फीसद लोगों का पलायन राज्य में ही हुआ है। 29 फीसद ने राज्य से बाहर और एक फीसद ने विदेश में पलायन किया है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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