बहुत बुरा लग रहा है मुझे ये बात उठाते उठाते ज़माना बीत गया। शायद 2012 में एक प्रसिद्ध इंजीनियर कॉन्क्लेव में विज्ञान भवन में मैंने ये बिंदु उठाया था, जब सभी से पूछा गया था कि अगला इंजीनियर कॉन्क्लेव का विषय क्या हो, तो मैंने हाथ उठाकर माइक पर सैकड़ों इंजीनियरों की भीड़ में बोला था कि अगला विषय पहाड़ों में बनाए जाने वाली सड़कों को कैसे अल्पतम पर्यावरणीय छेड़छाड़ के बिना बनाया जाए, विस्फोटक कैसे अल्पतम प्रयोग में लाए जाएं ताकि हिमालयी पर्यावरण को कम से कम नुक़सान हो। बड़े पावर प्रोजेक्ट के अलावा छोटे छोटे माइक्रो या मिनी हाइडेल पावर प्रोजेक्ट लगाए जाएं, आदि आदि। लेकिन मेरी इन बातों को ध्यान नहीं दिया गया।

खैर जो हो उसके बाद भी अपने स्तर पर मौक़े बेमौके ये बात उठाता रहा और हिम, अवधाव, पहाड़ी मौसम का रुचि अनुसार अल्प जानकार होने के नाते मैं समय समय पर इस बात पर बल देता रहा। आपदा की स्थितियों को केदार त्रासदी के समय पर समझा और तपोवन त्रासदी के समय मेरा कार्यालय क़रीब 15 दिन तक 24ग्7 घंटे चलता रहा, तब इस बात को और आगे बढ़ाया। इन सभी बातों को एक लेख के रूप में जनसामान्य तक भी पहुंचाया। लेकिन हम सभी आम ओ ख़ास को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता जब तक कि बात उन्हीं के घर पर तक न पहुंचे।
अब भी उत्तराखंड सरकार को इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। उत्तराखंड के पहाड़ पूरे हिमालय में सबसे कमजोर पहाड़ हैं, वैज्ञानिक और भूगर्भीय कारण हैं, तथ्यपरक हैं। सो नहीं पा रहा पहाड़ के दर्द और दर्द से उपजी दरारों को देखकर। अब मैं कविता के माध्यम से अपनी बात आपसे साझा करना चाहता हूं :-
“जोशीमठ”
मैं पहाड़ हूं, विश्वास का और समझदारी का
मैं दिलाता हूं अहसास ऊंचाई और विस्तार का
और दिलाता हूं अहसास ज़िम्मेदारियों का भी
जिम्मेदारियां तेरी सारी मानव जात की
प्रकृति को बनाए-बचाए रखने की
ज़िम्मेदारी ताकि तुम ज़िंदा रहो।।
मैं तुम्हारा आदि मैं ही तुम्हारा अंत हूं
मैं ही शिव मैं प्रकृतिपति मैं ही अनंत हूं
जब देनी हो तुझे दिशा तो
मैं ही तुम्हारा अध्यात्म और मैं ही संत हूं।।
प्रकृति रूपी पार्वती को क्यूं नष्ट भ्रष्ट कर रहा
क्यूं तुझे मेरे तीसरे नेत्र का डर नहीं रहा
मौसम, भूकंप, ज्वालामुखी, सब मुझमें हैं
सारे सागर, सारे जंगल, सारे खग-मृग मुझमें हैं
सारे हीरे, सारे मोती, सोना-चांदी सब मुझमें हैं
समस्त रस और समस्त तत्व सब मुझमें हैं
फिर तू किसलिए प्रकृति को यूं दोह रहा
क्या तुझे मेरे तीसरे नेत्र का अब डर नहीं रहा।।
दिखाया शिव रूप तुझे इकबार केदार की घाटी में
दोबारा बोला बस कर, तपोवन में तांडव कर कर
नासमझ न छेड़ मुझे तू उत्तराखंड की माटी में
बोलूंगा फिर ज्यूं बोला जोशीमठ से फट-फट कर।।
समझ, यहां की धरती वैसे ही कच्ची है
बात कि मुझमें लावे का गरम समंदर, सच्ची है
फिर क्यूं तोड़ रहा और फ़ोड़ रहा मेरे शरीर को
कुल्हाड़ी क्यूं रहा पैरों में मार अकल क्या तेरी कच्ची है।।
मान मेरी तू मुझ पर यूं अत्याचार न कर
मेरी प्रकृति में जी ले उसका नाश न कर
याद कर प्रकृतिपति शिव का नेत्र तीसरा
भूला यदि जोशीमठ तो फिर सब क़ुछ बिसरा।।
डॉ संजीव कुमार जोशी “उत्तराखंडी”


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