एक सच्चे पहाड़ी सपूत प्रो. पुरोहित का दृढ साहस बहुत मजबूत रहा है। उन्होंने जीवन के सही मानदंडों तथा आचार-विचार से कभी समझौता नहीं किया। इसके उदाहरण हैंः मेसमोर कोलेज और भारतीय वन संस्थान में संबन्धित व्यक्तियों से मतभेदों के कारण इस्तीफा देना, पंजाब विश्वविद्यालय में प्रवक्ता के साक्षात्कार बोर्ड में एक सदस्य की आलू अनुसंधान पर लिखी किताब में फीजियोलोजी की कमियों को उन्ही के सामने धड़ाल्ले से टिप्पणी कर गलत बताना, आई.सी.ए.आर. डायरेक्टरों के सम्मेलन में ‘केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र’ पर महानिदेशक की अनावश्यक टिप्पणी पर भरी सभा में उन्हें संस्थान के सही कार्यों पर स्पष्टीकरण और फिर इस्तीफा देना, आदि प्रमुख हैं।
प्रो. पुरोहित का शैक्षिक और प्रोफेशनल ज्ञान इतना प्रबल था कि हर वैज्ञानिक संस्थान को उनकी जरूरत थी। हां, प्रभु अनुकम्पा भी हमेशा उन पर बनी रही और इस प्रकार उच्च शिक्षा, सही जॉब प्रोफाइल, टेक्निकल और प्रशासनिक प्रबंधन में उनका मार्ग प्रशस्त होता गया। इस सफर में उन्हें डॉ नंदा का मार्गदर्शन और योगदान भी सराहनीय रहा है, जिन्हें उन्होंने अपना गुरु, आदर्श व्यक्ति और मार्गदर्शक के रूप में चरितार्थ किया है।
प्रो. पुरोहित का भारत और विदेशों में कार्यकाल के धरातलीय अनुभव, विश्वविख्यात शिक्षाविदों तथा वैज्ञानिकों के सानिध्य ने उन्हें प्लांट फीजियोलॉजी क्षेत्र की विशेषज्ञता से, नई सोच के साथ अनुसंधान करने के अवसर प्रदान किये। अपने पिता और ससुर जी के सुझाव और मातृ-भूमि के प्रति संवेदना और मानकों के अनुरूप सर्वोत्तम स्थान की पृष्ठभूमि में प्रो. पुरोहित ने 13000 फुट की ऊंचाई पर तुंगनाथ में ‘हाई टेक्नोलॉजी प्लांट फिजियोलोजी रिसर्च केंद्र’ की स्थापना कर बहुमूल्य योगदान दिया। हालांकि, गढ़वाल विश्वविध्यालय में उनका समय काफी चुनौतीपूर्ण रहा, जिनका उन्होंने बड़ी सूझबूझ से सामना किया और प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन और प्रो. एम.जी.के. मेनन के सानिध्य में पर्वतीय वृक्षों और औषधीय पौधों पर अनुसंधान करते हुए कई नये कीर्तिमान स्थापित किये।
इस प्रकार ‘हाई टेक्नोलॉजी प्लांट फिजियोलॉजी रिसर्च केंद्र’ और ‘गढ़वाल विश्वविध्यालय’ में अपने उत्कृष्ट कार्यों से तथा उच्च कोटी के विद्यार्थीयों एवं संसाधन विकसित कर, प्रो. मेंनन (तत्कालीन विज्ञान और तकनीकि मंत्री) ने उन्हे अल्मोड़ा में ‘गोविंद बल्लभ पंत इंस्टिट्यूट आफ हिमालयन इनवायरनमेंट एण्ड डेवेलोपमेंट’ को स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी, जिसे प्रो. पुरोहित ने वर्ष 1990-1995 के दौरान कई विषम परिस्थितियों के बावजूद, शुरुआत से सही दिशा निर्देशों, मेहनत, इमानदारी और प्रोफेशनल कुशाग्रता से स्थापित किया।
प्रो. पुरोहित के उच्च कोटि के अनुसंधान और राष्ट्र हित में किये गये योगदानों के लिए उन्हें 1998 में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस प्रकार, प्रो. पुरोहित एक प्रवक्ता, अनुसंधान सहायक, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, डायरेक्टर और कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के सदस्य रह कर, अॅन्ततः ‘गढ़वाल विश्वविद्यालय’ के ‘कुलपति’ के पद से जून 2002 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद भी प्रो पुरोहित के शैक्षणिक और वैज्ञानिक अनुभवों का उत्तराखंड राज्य के लिये बहुत योगदान रहा। इनमें से प्रमुख हैं; सुगंध पौधा केंद्र, उत्तराखंड विज्ञान और तकनीकि परिषद, राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी उत्तराखंड कार्यालय देहरादून और उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान परिषद् की स्थापना।
प्रो. पुरोहित की जीवनयात्रा में माता-पिता और गुरुजनों से प्राप्त शिक्षा और संस्कारों ने उन्हें दिशागत भविष्य की ओर प्रेरित किया। सेवाकाल में उनकी पत्नी का एक सफल गृहणी, मां, दोस्त और सलाहकार के रूप में उत्तम सानिध्य रहा, जो प्रो. पुरिहित को नई सोच, सही दिशा और महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिये बिंदास प्रेरित करती रही। उनके विचार से पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को विज्ञान से जोड़े बिना, कोई भी राजनीतिक व्यवस्था कामयाब नही हो सकती। साथ ही उन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरुकता तथा आदर्श एवं कर्मठ व्यक्तियों की भागेदारी पर भी बल दिया है और मै उनके विचारों से पूर्णरूपेण सहमति रखता हूं।
कुल मिलाकर प्रो. पुरोहित की पुस्तक अपनी कहानी ‘अनजानी यात्रा पर’ उनके उत्तम व्यक्तित्व, कर्मयोगी, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद् और वैज्ञानिक की उत्तम तस्वीर प्रस्तुत करती है। उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान है अपनी शिक्षा तथा अनुसंधान को अन्ततः समाज के उपयोग हेतु धरातल पर उतारना। देश और उत्तराखंड राज्य के लिये बहुआयामी योगदानों से उनका देश प्रेम और मातृ-भूमि से लगाव बिलकुल साफ झलकता है और मैं यह समझता हूँ कि यह उनके जीवन यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू है।
प्रो आदित्य नारायण पुरोहित, पद्मश्री की इस पुस्तक को मैं, उनके द्वारा हम सबके लिये ंएक अति उत्तम भेंट के रूप में मानता हूं और मुझे विश्वास है कि आने वाली पीढ़ियों के छात्र, शिक्षक, शोधकर्ता और जन साधारण उनके आदर्शों से अपने-अपने प्रगति पथ को संवारने हेतु प्रेरणा लेंगे और उनके कार्यों को नये आयामों तक पहुंचाएंगे। मैं, प्रो. पुरोहित सर के सुखद स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता हूं ताकि उनका आशीर्वाद, सानिध्य और मार्गदर्शन हमें मिलता रहे।
(रियर एडमिरल ओम प्रकाश राणा, (से.नि.) भूतपूर्व डायरेक्टर जनरल नौ सेना आयुध निरीक्षण – महाप्रबंधक ब्रह्मोश एयरोस्पेस)


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