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पेशावर कांड की 93वीं बरसी पर पूरा देश वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को कर रहा है नमन

देश के वीर नायकों का जब नाम लिया जाता है उसमें एक नाम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का भी आता है उन्होंने आजादी से पहले अंग्रेजों के सामने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने से मना कर दिया था और इसके बाद उन्हें सजा भी दी गई। आज पेशावर कांड की 93वीं बरसी है इस अवसर पर पूरा देश वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को याद कर रहा है।

पेशावर कांड की आज 93वीं बरसी है इस अवसर पर आज पूरा देश वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके अन्य साथियों को याद कर रहा है। जिन्होंने अंग्रेजो के सामने निहत्थे लोगों पर हथियार चलाने से मना कर दिया था। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए चंद्र सिंह के नेतृत्व में गढ़वाल रायफल्स को भेजा। 23 अप्रैल 1930 को स्वाधीनता आंदोलन के दौरान पेशावर में जब पठान लोग आंदोलन कर रहे थे तब अंग्रेज अफसर रिकेट ने हुक्म दिया, “गढ़वाली श्री राउंड फायर”, अर्थात् गढ़वाली तीन राउंड गोली चलाओ। हवलदार चन्द्र सिंह रिकेट की बायीं ओर खड़े थे। उन्होंने रिकेट के हुक्म के तुरन्त बाद हुक्म दिया, ‘गढ़वाली सीज फायर’ अर्थात् गढ़वाली गोली मत चलाओ। सैनिकों ने चन्द्र सिंह का ही हुक्म माना और जुलूस की ओर बन्दूकें नीचे जमीन पर खड़ी कर दी। चन्द्र सिंह ने रिकेट से कहा ‘हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते।’

इस घटना से अंग्रेज अधिकारियों में हड़कंप मच गया। वीर चंद्र सिंह की पूरी पल्टन नजरबंद कर ली गई। इन पर राजद्रोह का मुकदमा चला। गढ़वाली सैनिकों की ओर से मुकुंदीलाल ने मुकदमें की पैरवी की, पैरवी के चलते वीर चंद्र सिंह को मृत्युदंड की जगह उम्र कैद की सजा दी गई। अंग्रेजी हुकूमत ने वीर चंद्र सिंह की सारी संपत्ति जब्त कर ली। पेशावर कांड ने वीर चंद्र सिंह और गढ़वाल बटालियन को ऊंचा दर्जा दिलाया। चारों तरफ वीर चंद्र सिंह की चर्चा होने लगी। इसके बाद इन्हें वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम से जाना जाने लगा।

11 वर्ष तक देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहने के बाद 1941 में उन्हें रिहा किया गया। इसके बाद वह आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इलाहाबाद में आजादी के मतवाले नवयुवकों ने उन्हें कमांडर इन चीफ चुन लिया। इसके बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें सात साल की सजा हुई।

पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसम्बर, 1891 में पीठसैंण के निकट रोणैसेर ग्राम (पौड़ी गढ़वाल) के एक साधारण कृषक जथली सिंह के घर में हुआ था। उन्होंनें प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव के आस-पास के गांवों में ही अर्जित की और 11 सितम्बर 1914 को लैंसडौन छावनी में 2/36 गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गये। सन् 1926 में महात्मा गांधी के कुमाऊं में आगमन पर वह महात्मा गांधी से मिलने बागेश्वर गये और गांधी जी के हाथ से टोपी लेकर पहनी और उसकी कीमत चुकाने का प्रण किया।

इसके पश्चात् साठ गढ़वालियों पर बगावत का आरोप लगाया गया। 12 जून, 1930 की रात को चन्द्र सिंह एवटाबाद जेल में भेज दिये गये। जेल से रिहा होने के पश्चात गढ़वाली स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। 1948 में उन्होंनें टिहरी आन्दोलन का नेतृत्व किया। 1 अक्टूबर 1979 को चन्द्र सिंह गढ़वाली का लम्बी बीमारी के बाद देहान्त हो गया।

पेशावर कांड की 93वीं बरसी पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों को शत् शत् नमन।

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Hill Mail

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