पुण्यतिथि पर विशेष आलेख – कबूतरी देवी : पहाड़ की पहली लोकगायिका

पुण्यतिथि पर विशेष आलेख – कबूतरी देवी : पहाड़ की पहली लोकगायिका

लोकगायिका कबूतरी देवी ने अपनी सुरीली आवाज से सबके मन को मंत्र मुग्ध कर देती थी। कबूतरी देवी का प्रसिद्ध गीत स्टेशन जूं ला, टिकट लयूं ला, गाड़ी मैं बैज्यूंला.. अब नई पीढ़ी की जुबां पर है।

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

एक मायने में सारा हिमालय एक गांव है। शांत वादियों और ऊंची चोटियों वाला गांव। पूरा गांव पेड़-पौधों की हरियाली से ढका हुआ है। यहां शांति है और इसके एक हिस्से को हम उत्तराखंड कहते हैं। जहां पर पसरी हुई चुप्पी को लोक गायन भेदता है। ऐसी ही एक लोकगायिका का नाम है कबूतरी देवी। अपनी सुरीली आवाज से सबके मन को मंत्र मुग्ध कर देने वाली कबूतरी देवी का जीवन एक गीतात्मक गाथा है, जिसमें परिस्थितियों के कारण हमेशा से उतार-चढ़ाव बने रहे हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे हिमालय की शृंखलाओं में दिखते हैं। अपने गीतों में पहाड़ का पूरा सांस्कृतिक दर्शन दिखाने वाली कबूतरी देवी को उत्तराखंड की पहली लोकगायिका कहा जाता हैं।

कबूतरी देवी का उत्तराखंड और हिमालयी इलाके के लोक संगीत में एक बहुत बड़ा नाम रहा है। मधुर और खनकती आवाज की धनी कबूतरी देवी को लोग पहाड़ की तीजन बाई के नाम से भी जानते हैं। आज से तीन-चार दशक पूर्व लखनऊ और नजीबाबाद के आकाशवाणी केन्द्रों से ‘उत्तरायण‘ व अन्य कार्यक्रमों से जब उनके गीत प्रसारित हुए तो लोक संगीत की दुनिया में उनकी एक खास और अलग पहचान बनी। पारिवारिक विरासत में मिली लोक गायन की मामूली शिक्षा-दीक्षा के बावजूद भी कबूतरी देवी के गायन शैली में कई विशेषताएं मिलती है। उनके गायन शैली में पिथौरागढ़ की सौर्याली और काली पार डोटी अंचल की जो साझी झलक मिलती है वह बहुत ही विशिष्ट और अद्भुत है। ठेठ पहाड़ी राग में उनके कण्ठ से जब गीतों के स्वर फूटने लगते हैं तो हर श्रोता उनके गीतों का खुद-ब-खुद मुरीदबन जाता है। आकाशवाणी से प्रसारित उनके कई गीत बहुत ही लोकप्रिय हुए, इनमें यह गीत तो लोगों के बीच में बेहद लोकप्रिय रहा, जिसमें रोजी रोटी के लिए पहाड़ से परदेश जा रहे व्यक्ति ने अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए अपने साथी से अनुरोध पूर्वक कहता है कि मुझे बस-स्टेशन तक पहुंचा कर विदा कर दो, दो-चार दिनों में ही मेरा अपना गांव मुझसे दूर हो जायेगा और मैं परदेश में विरान (अनजान) हो जाऊंगा।

आज पनि जांऊ जांऊ,
भोल पनि जांऊ जांऊ,
पोरखिन कै न्हैं जोंला।
स्टेशन सम्म पुजाई दे मनलाई,
पछिल विरान होये जौंला।
स्टेशन जौंला टिकट ल्यौंला,
गाड़ी में भैटि जौंलां,
स्टेशन सम्म पुजाई दे मनलाई,
पछिल विरान होये जौंला।

आज से सात दशक पूर्व कबूतरी देवी का जन्म 1945 में चम्पावत के लेटी गांव के मिरासी परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम श्री देवी राम और माता का नाम श्रीमती देवकी था। पिता देवीराम को गाने-बजाने में महारत हासिल थी। वे हुड़का और सारंगी के साथ ही तबला व हारमोनियम बहुत अच्छा बजाते थे। कबूतरी देवी की मां भी लोक गायन में निपुण थीं। स्थानीय इलाके में उस समय इनका खूब नाम था। परिवार में नौ बहिनें और एक भाई था। घर की गुजर-बसर छुटपुट खेती बाड़ी और अन्य कामों से किसी तरह चल ही जाती थी। स्कूल दूर होने के कारण गांव के लड़के बमुश्किल पांचवी तक ही पढ़ पाते थे। उस समय लड़कियों की पढ़ाई बहुत दूर की बात समझी जाती थी सो अन्य लड़कियों की तरह कबूतरी देवी की भी स्कूली पढ़ाई नहीं हो सकी। परिवार में गीत-संगीत का भरपूर माहौल था। इसका फायदा कबूतरी देवी को अवश्य मिला और वे बालपन से ही वे गाने-बजाने में पारंगत हो गयी।

माता-पिता द्वारा मात्र चौदह साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गयी और वे पिथौरागढ़ जिले में मूनाकोट के नजदीक क्वीतड़ गांव के दीवानी राम के साथ वैवाहिक जीवन व्यतीत करने लगीं। उस समय इलाके में यातायात की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं थी। लोग-बाग पैदल ही चलते थे। कबूतरी देवी जब भी ससुराल (क्वीतड़) से मायके (लेटी) आती तो उन्हें पैदल पहुंचने में कम से कम डेढ़-दो दिन लग जाते। ससुराल के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे। पति दीवानी राम अपने फक्कड़ मिजाजी के चलते घर की जिम्मेदारियों की तरफ बहुत अधिक ध्यान नहीं दे पाते थे। गुजर-बसर के लिए परिवार के पास खेती की जमीन थी नहीं सो कबूतरी देवी दूसरों के खेतों में काम-धाम करके और किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके घर-परिवार का खर्च चलाती रहीं। पारिवारिक जीवन का सिलसिला कुछ इसी तरह चल ही रहा था कि 1984 में अचानक पति दीवानी राम की भी मृत्यु हो गयी।

पति की असमय मौत के बाद अब घर की पूरी जिम्मेदारी कबूतरी देवी सिर पर आ गयी। पारिवारिक जीवन पहले से कहीं अधिक कष्टप्रद तरीके से बीतने लगा। जैसे-तैसे अपनी दो लड़कियों और एक लड़के की परवरिश की। बाद में लड़कियों की भी शादी कर दी। गुजर-बसर के सिलसिले में जब उनका लड़का मुम्बई चला गया तो कबूतरी देवी के गायन और संगीत का क्रम भी कुछ सालों तक छूट सा गया। आर्थिक अभाव के चलते मानसिक तौर पर परेशान रहने के कारण वे तकरीबन 10-12 सालों से अधिक समय तक गुमनामी के अधेंरे में जीती रहीं। बाद में पिथौरागढ़ के संस्कृति कर्मी हेमराज बिष्ट ने अपने खुद के प्रयासों से उनको फिर से गीत-संगीत के प्रति प्रोत्साहित किया तथा साथ ही आर्थिक सम्बल प्रदान करने के लिए संस्कृति विभाग से आर्थिक सहायता और पेंशन दिलाने के लिए समय-समय पर दौड़-धूप की।

पिथौरागढ़ के सांस्कृतिक मेले में जब कबूतरी देवी के कार्यक्रमों की प्रस्तुति हुई तो लोग उनके गीतों के फिर से मुरीद बनने लग गये। इस तरह गीत-संगीत की दुनिया में उनका एक तरह से दुबारा जन्म सम्भव हुआ। बाद में पति की मौत हो गई तो उन्होंने आकाशवाणी और कार्यक्रमों में गाना बंद कर दिया था। उन्होंने अपने जीवन के कई साल अभावों में गुजारे। साल 2002 में, पिथौरागढ़ के नवोदय पर्वतीय कला केन्द्र ने उन्हें छोलिया महोत्सव में बुलाकर सम्मानित किया था। इंडियन आइडल में धूम मचा रहे पवनदीप राजन को अल्मोड़ा के लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति ने भी सम्मानित किया। गायिका कबूतरी देवी की बहन लक्ष्मी देवी पवनदीप की नानी हैं।

पहाड़ की पहली लोकगायिका कबूतरी देवी का प्रसिद्ध गीत स्टेशन जूं ला, टिकट लयूं ला, गाड़ी मैं बैज्यूंला.. अब नई पीढ़ी की जुबां पर है। इसे स्वर दिया है उभरते गायक और इंडियन आइडल में धूम मचा रहे पवनदीप राजन ने। बहुत कम लोग जानते हैं कि गायिका कबूतरी देवी की बहन लक्ष्मी देवी पवनदीप की नानी हैं। चम्पावत जिले के पंचेश्वर क्षेत्र में वलचूड़ा निवासी लोक कलाकार सुरेश राजन के पुत्र पवनदीप का जन्म 1995 में हुआ था। उन्होंने काफी मुश्किलों भरा जीवन जिया और तमाम परेशानियों के साथ पहाड़ी संगीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सरकार की तरफ़ से भी उन्हें वह आर्थिक सहायता नहीं दी गई जिसकी यह गायिका हकदार थीं। उनके जरिए गाए हुए गीतों का कोई संरक्षित रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन कुछ गीत आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं। कबूतरी देवी को अपने संगीत क्षेत्र में ‘कुमाऊं कोकिला’ के नाम से भी नवाजा जाता है।

लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और वह दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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