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किसानों की आय दोगुनी करने का उत्तराखंडी मॉडल

वर्षा सिंह, देहरादून

किसानों की कर्ज़ माफ़ी, सस्ती ब्याज़ दरों पर ऋण, किसान आंदोलन, किसान आत्महत्या, सिंचाई की समस्या, सूखे की समस्या…देश के लिए खाद्यान्न भंडार जुटाने वाला किसान अक्सर ही किसी न किसी समस्या से परेशान होता है। किसानों की किस्मत संवारने के लिए ही केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 तक आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा। किसानों को केंद्र में रखकर बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन ज्यादातर किसान अपनी फसल और उसकी कीमत को लेकर, अनिश्चितता और आशंकाओं में घिरे रहते हैं।

इस सबके बीच देहरादून के नकरौंदा गांव के किसान दीपक उपाध्याय की खेती का मॉडल एक आदर्श उदाहरण साबित हो सकता है। उनका कृषि मॉडल बताता है कि किस तरह ज़ीरो बजट कृषि को अपनाकर और इंटीग्रेटेड फार्मिंग यानी एकीकृत कृषि के ज़रिये किसान की आय सचमुच दोगुनी की जा सकती है।

दीपक उपाध्याय की इंटिग्रेटेड फार्मिंग के फॉर्मुले को समझने के लिए जब मैं नकरौंदा गांव पहुंची, तो वहां पहले से ही काफी सारे किसान और ग्रामीण मौजूद थे। पता चला कि पौड़ी से जलागम विभाग की टीम के साथ कुछ किसान उनकी खेती के मॉडल को देखने के लिए आए हैं। दीपक उऩ्हें खेती के अपने तरीके के बारे में समझा रहे थे।

प्रगतिशील किसान दीपक उपाध्याय के पास करीब चार एकड़ भूमि है। जिसका कुछ हिस्सा उन्होंने जोत रखा है। एक हिस्से में पॉली हाउस बनाया, जिसमें बेमौसमी सब्जियां भी उगायी जा सकती हैं। यहीं पर एक छोटी सी गौशाला बनायी है, जिसमें चार गायें हैं, और एक छोटा बछड़ा भी बंधा हुआ है। गायों के गोबर को ही खाद बनाने के लिए सुखाकर, ज़मीन पर एक तरफ उड़ेल दिया गया था। जिसके उपर मुर्गे-मुर्गियां भाग रहे थे। यहीं पर गोबर-गैस का एक छोटा सा सयंत्र भी लगा हुआ था। जिसकी पाइप को उन्होंने रसोई से जोड़ रखा था। दीपक बताते हैं कि इससे बननेवाली बायो गैस से रसोई का ज्यादातर काम हो जाता है।

गौशाला की दूसरी तरफ उन्होंने मुर्गे-मुर्गियों का बाड़ा बनाया हुआ था। जिसके अंदर से झक-सफ़ेद मुर्गे-मुर्गियां अपनी गर्दन अकड़ाकर बाहर की ओर झांक रहे थे। कमरे की खिड़की के बाहर से किसान भाई-बहन उन मुर्गे-मुर्गियों को उत्सुकता से निहार रहे थे। मुर्गियों के इस कमरे की एक दीवार पानी के उस बड़े से तालाब से लगती हुई ही, जिसमें दीपक ने मछलियां पाली हुई हैं। ये तालाब रेन वाटर हार्वेस्टिंग के ज़रिये हर समय पानी से लबालब रहता है। दीपक बताते हैं कि मुर्गे-मुर्गियों की बीट मछली का आहार बन जाती है। यानी दीपक के इस फॉर्म में कुछ भी बर्बाद नहीं होता। हर चीज एक दूसरी चीज की पूरक है, साथ ही उससे जुड़ी हुई है। यहां प्रशिक्षण के लिए आए हुए कुछ किसानों ने उनसे मछलियां खरीदने की भी जिज्ञासा जतायी, लेकिन दीपक ने उस समय सादगी से मना कर दिया। इस तालाब के एक छोर पर बत्तख का एक जोड़ा घूम रहा था। दूसरे छोर पर दूसरा जोड़ा। अगर आपके पास फुर्सत के कुछ पल हों तो उन्हें इस तालाब के किनारे बैठकर, बत्तखों के जोड़े को निहारते हुए गुजारा जा सकता है।

अब दीपक अपने मेहमानों को मशरूम की झोपड़ी की ओर ले जा रहे थे। लेकिन इस बीच चाय तैयार हो गई। वहीं प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठकर सभी चाय की चुस्कियां लगाने लगे। कुछ लोग जो चाय नहीं पीते थे, उनके लिए दीपक ने चाय की प्यालियों में दूध मंगाया। चाय का दौर समाप्त होते ही उन्होंने मशरूम की खेती के बारे में बताना शुरू किया। दीपक ने ऑयस्टर मशरूम उगाये थे, जिसे पहाड़ों में ढींगरी भी कहा जाता है। जो पूरी तरह जैविक होते हैं। मशरूम के लिए अगर बीज छोड़ दें तो जिन थैलों में इन्हें उगाया जाता है, उसके लिए खाद-भूसा सब दीपक के इस फॉर्म पर मौजूद है। यहीं उन्होंने पानी स्टोर करने के लिए एक कंटेनर भी बना रखा है। जिसका इस्तेमाल मशरूम उत्पादन के लिए होता है।

अब दीपक प्रशिक्षण के लिए आए किसानों को गौ-मूत्र और गाय के गोबर से बनने वाले अगरबत्ती जैसे उत्पाद के बारे में बता रहे हैं। दीपक के साथ इस सब कार्य में उनका बेटा भी हाथ बंटाता है, जो इस समय बायो-साइंस से ग्रेजुएशन का छात्र है। ये पूछने पर कि क्या वो भी भविष्य में पिता के इस काम को ही आगे बढ़ाएगा, जवाब में उसके पिता हंस देते हैं और कहते हैं कि इसके पास तो और भी आइडियाज़ हैं।

दीपक बताते हैं कि दरअसल खेती को ज़ीरो बजट पर लाना होगा, यानी उसमें होने वाले निवेश को कम से कम पर लाना होगा। बीज के अलावा किसानों को खाद, सिंचाई, कीटनाशक जैसे कार्यों के लिए पैसे लगाने पड़ते हैं। दीपक कहते हैं कि यदि हम गाय को केंद्र में रखकर खेती करें, तो हमारी बहुत सी मुश्किलें हल होती हैं। वे खेती और पशुपालन को जोड़ने की बात कहते हैं। उनका कहना है कि पहले किसान खेती के साथ पशुपालन भी करता था। तो खाद के लिए उसे अपनी जेब से पैसे नहीं खर्च करने पड़ते थे। अब किसानों ने पशुपालन छोड़ दिया है। तो उनकी मुश्किल बढ़ गई है। उनके मुताबिक इंटीग्रेटेड फार्मिंग के ज़रिये ही हम किसानों की आय को दोगुनी करने का फॉर्मुला हासिल कर सकते हैं।

दीपके के फॉर्म में उगाई गई सारी चीजें जैविक हैं। वे इस देहरादून में दो अलग जगहों पर लगने वाले साप्ताहिक जैविक हाट में बिक्री के लिए ले जाते हैं। उनके मुताबिक जैविक सब्जियों का उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन बाजार में मिलने वाली सब्जियों की तुलना में जैविक सब्जियों की कीमत कुछ अधिक होती है, तो इस तरह भरपाई हो जाती है।

पौड़ी से आई जलागम की टीम के अधिकारी संतोष कुकरेती ने कहा कि वे अक्सर किसानों को दीपक उपाध्याय का कृषि मॉडल दिखाने के लिए लाते हैं। यहां उन्हें प्रैक्टिकली ऐसी चीजें देखने को मिल जाती हैं, जिसे यदि वे अपनाएं तो खेती से उनकी आजीविका अच्छी तरह चल सकती है।

टीम के साथ आईं रेखा बंदुणी कहती हैं कि हमारे गांव में तो खेत के खेत बंजर हो रहे हैं। लोग अब खेती कर ही नहीं रहे। महिलाएं ही थोड़ी बहुत सब्जियां उगा रही हैं। जलागम विभाग की इस योजना के तहत उन्हें देहरादून आकर अच्छा तो लगा ही, बल्कि सीखने को भी बहुत मिल रहा है। वे उम्मीद जताती हैं कि गांव जाकर दूसरी महिलाओं के साथ मिलकर कुछ ऐसा करने का प्रयत्न करेंगी।

दीपक कहते हैं कि पशुपालन के साथ की गई खेती ही किसानों की आय दोगुनी करने का मॉडल बन सकती है। दीपक का ये एग्रीकल्चर फॉर्म पंडित दीन दयाल उपाध्याय उन्नत कृषि शिक्षा योजना के तहत देशभर में चयनित सौ प्रशिक्षण केंद्रों में से एक है।

नकरौंदा में जिस जगह दीपक का खेत है, उसके चारों ओर की कृषि योग्य भूमि अब रिहायशी इलाकों में तब्दील होती नज़र आ रही है। जिस पर बहुमंज़िला इमारतें बनी हुई हैं और कुछ निर्माणाधीन भी हैं। वो बताते हैं कि इन ज़मीन के मालिकों ने बहुत कम कीमत पर प्रॉपर्टी डीलर्स को ये ज़मीन बेच दी, जिसमें उनके अपने रिश्तेदार भी शामिल थे। उस समय उन पर भी ज़मीन बेचने का बहुत दबाव था। लेकिन उन्होंने अपनी ज़मीन को खेती का उत्कृष्ट मॉडल बना दिया। वे हंसते हैं कि सारी दुनिया की दौड़ लगाने के बाद लोगों को एक बार फिर ज़मीन से ही जुड़ना होगा, खेती करनी होगी, इसके बिना क्या जीवन चल सकता है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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