उत्तराखंड नारी शक्ति वाला राज्य माना जाता है। यहां की आर्थिकी की रीढ़ महिलाएं ही मानी जाती हैं। पीठ पर लकड़ियों का गठ्ठर लादकर पहाड़ चढ़ती महिलाएं, जरूरत पड़ने पर आंदोलन और मोर्चों में भी अगली कतार में नज़र आती हैं। राज्य आंदोलन में महिलाओं की अहम भागीदारी रही। चिपको आंदोलन इस राज्य के लिए एक मिसाल है। इन सारी बातों को इस वर्ष जनवरी में जारी मानव विकास सूचकांक के परिप्रेक्ष्य में रखें, तो राज्य में महिलाओं की स्थिति को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
अलग राज्य बनने के बाद पहली बार राज्य की मानव विकास रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट से राज्य के तेरह ज़िलों के सामाजिक जीवन को समझने में मदद मिलती है।
अमीर मैदानी ज़िलों की तुलना में ग़रीब पहाड़ी ज़िलों की स्थिति बेहतर

मानव विकास रिपोर्ट का लैंगिक विकास सूचकांक ( Gender Development Index ) बताता है कि उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाग और बागेश्वर इस सूची में पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं, जबकि ऊधमसिंहनगर, देहरादून और हरिद्वार क्रमशः 11वें, 12वें और 13वें स्थान है। सूची में आखिरी पायदान पर खड़े ये तीनों ज़िले राज्य में औद्योगिक विकास का केंद्र हैं। यहां सबसे अधिक उद्योग धंधे हैं। यानी इन तीन ज़िलों की आर्थिकी सबसे अधिक मज़बूत है। इस सबके साथ ही लड़कियों को पैदा न होने देने के मामले में भी ये तीन ज़िले ही सबसे आगे हैं। ये रिपोर्ट बताती है कि अपेक्षाकृत कम पैसे वाले लोग फिर भी बेटियों को बोझ नहीं समझ रहे, लेकिन जहां विकास ज्यादा हुआ, जहां पैसा ज्यादा आया, वहां बेटियां बोझ मानी जा रही हैं। तो ये सोच का फर्क है।
देहरादून में महिला सामाख्या की निदेशक रह चुकी गीता गैरोला मानव विकास रिपोर्ट को लेकर कुछ संशय जताती हैं। इससे पहले वर्ष 2001 में उत्तराखंड में प्रति हजार बालकों पर 908 बालिकाएं थी। जो दस सालों में घटकर 890पर पहुंच गई। इसी तरह पिथौरागढ़ जिले में प्रति हजार बालकों पर 902 बालिकाएं थी, जो 2011 में घटकर 816 पर पहुंच गई। पिथौरागढ़ की ये स्थिति चिंताजनक थी। ये राष्ट्रीय औसत से तो कम था ही, साथ ही राज्य में भी खराब लिंगानुपात के मामले में पिथौरागढ़ नंबर एक पर आ गया था। इसलिए गीता गैरोला के मुताबिक मानव विकास रिपोर्ट सरकारी स्कूलों और अस्पतालों के आंकड़ों पर तैयार किया गया है। जहां ज्यादातर लड़कियां पढ़ती हैं और लड़कों को मां-बाप अंग्रेजी स्कूलों में डालते हैं।

उत्तराखंड में लिंगानुपात की चिंतनीय स्थिति के बाद राज्य सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं के ज़रिये पिछले वर्ष सर्वेक्षण कराया। जिसके आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने लिंगानुपात बढऩे का दावा किया। इसमें 0-6 आयुवर्ग में लिंगानुपात 934 निकला। जो कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य 5449मिशन के चौथे सर्वे के आंकड़ों से अधिक है। इन आंकड़ों के मुतबाबिक बागेश्वर जिले मेंबालिकाओं की संख्या अधिक है। यहां लिंगानुपात 1036 है।
लिंगानुपात को लेकर देहरादून के गवर्मेंट पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर मधु थपलियाल कहती हैं कि शहरों में अल्ट्रासाउंड सेंटर्स बहुत सारे हैं, शहरी लोगों को ऐसे मामलों की जानकारी है, इसलिए पर्वतीय जिलों या ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्र में कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामले अधिक होते हैं।
इसके साथ ही वे लड़कियों को लेकर सामाजिक असुरक्षा पर भी विशेष ज़ोर देती हैं। मधु कहती हैं कि लड़कियों के साथ होने वाले अपराध इतने अधिक हो गये हैं कि लोगों में बेटी पैदा होने पर भय की स्थिति आ गयी है। इससे बचने के लिए शहर में कन्या भ्रूण हत्या के मामले अधिक होते हैं।
असोसिएट प्रोफेसर मधु थपलियाल कहती हैं कि कन्या भ्रूण हत्या को लेकर उन्होंने उत्तरकाशी के कुछ गांवों और देहरादून में वर्कशॉप भी करायीं। वे अपना अनुभव बताती हैं कि शहरों में लोगों को इस सब की पूरी जानकारी होती है, जबकि गांव के लोग अब भी लड़का-लड़की को लेकर इतना नहीं सोचते। वे कहती हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में गांव की महिला का जीवन इतना व्यस्त होता है कि उनके पास इस सबके लिए समय नहीं होता।
मानव विकास रिपोर्ट में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर के आधार पर बहुआयामी गरीबी सूचकांक तैयार किया गया है। इसके आंकलन के लिए जीवन स्तर, सम्पत्ति, आवास, घरेलू ईधन,स्वच्छता, पेयजल, बिजली, संस्थागत प्रसव, शिक्षा, विद्यालयी उपस्थिति और विद्यालयी उपलब्धता संबंधी सूचनायें इकट्ठा की गईं। बहुआयामी गरीबी सूचकांक में चमोली, चम्पावत और पिथौरागढ क्रमशः पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। जबकि हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर और देहरादून क्रमशः 11वें, 12वें तथा 13वें स्थान पर रहे।
यानी जिन जगहों पर प्रसव के लिए अपेक्षाकृत अच्छे अस्पताल नहीं, शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल नहीं, जहां बिजली-पानी की दिक्कत अधिक है, संपत्ति जहां अपेक्षाकृत कम है, उस जगह के लोग लड़कियों के लिए उतना भेदभाव नहीं करते, जबकि संपन्न जिलों में सोच की गरीबी ज्यादा है।
मानव विकास में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़े मानकों के आधार पर राज्य का मानव विकास सूचकांक तैयार किया गया। इसके अनुसार मानव विकास में देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर क्रमशः पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। जबकि रूद्रप्रयाग, चम्पावत और टिहरी गढवाल क्रमशः 11वें, 12वें तथा 13वें स्थान पर हैं। देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर की अच्छी रैंकिंग का मुख्य कारण वहां की उच्च प्रति व्यक्ति आय मानी गई।
राज्य की पहली मानव विकास रिपोर्ट पर वित्त मंत्री प्रकाश पंत का कहना है कि मानव विकास रिपोर्ट को ध्यान में रखकर विज़न 2030 तैयार करना होगा, ताकि हमें अपेक्षित नतीजे हासिल हो सकें। वित्त मंत्री का कहना है कि इसके लिए सभी विभाग द्वारा मांगी जाने वाली बजट के मुताबिक आउटकम बजट की स्थिति को नियमित रूप से देखा जाना होगा ताकि विभागों को उपलब्ध कराये जा रहे बजट का प्रभावी इस्तेमाल किया जा सके। इस रिपोर्ट के आने के बाद उन्होंने चिकित्सा और स्वास्थ्य के प्रमुख इंडीकेटर जैसे संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, शिशु मृत्यु दर और माध्यमिक शिक्षा में नामंकन की स्थिति में सुधार लाने के लिए मिशन मोड में कार्य करने के निर्देश दिये।


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