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लोककला और आस्था का संगम, भतरौंजखान में भीमताली रामलीला

सी एम पपनैं, नैनीताल 

रामलीला उत्तराखंड के लोगों की आस्था का सबसे बड़ा सम्बल रहा है। जिसको मंचित करना, देखना, सुनना और जीवन में उतारना उत्तराखंडी लोगों की मानसिकता का आदर्श है। इसी आदर्श स्वरूप चार दशक पूर्व गठित व विगत अठारह वर्षों से निरंतर नैनीताल और अल्मोड़ा जिले के सीमांत पर बसे छोटे से कस्बे भतरौंजखान में नवरात्रों के अवसर पर रामलीला कमेटी भतरौंजखान द्वारा मंचित की जाने वाली सुप्रसिद्ध रामलीला इस वर्ष कुछ विलंब से विगत 4 अक्टूबर से आगामी 17 अक्टूबर तक उक्त कस्बे के करीब बाईस गांवों के जनमानस की उपस्थित में हरीश भट्ट की अध्यक्षता तथा दीपक छिमवाल के प्रभावशाली निर्देशन में आयोजित की जा रही है।

दस दिनी भीमताली शैली रामलीला की गायन शैली व रागों की महत्ता को देखते हुए, जो प्रत्येक उत्तराखंडी में आत्मसात है, इस पारंपरिक शैली की रामलीला को रात्रि 8 बजे से रात्रि के 1 बजे तक अत्यधिक ठंड प्रकोप के बावजूद आत्मिक भक्ति भावना और भव्य रूप में दूरदराज के करीब बाईस ग्रामीण इलाकों के जनमानस के आर्थिक सहयोग व अपार दर्शकों की प्रभावी उपस्थिति में मंचित करना आयोजकों के हिम्मत हौसले, भक्ति भावना व अंचल की लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का परिचायक है।

रामलीला कमेटी भतरौंजखान द्वारा मंचित की जा रही इस रामलीला का श्रीगणेश 4 अक्टूबर को स्थानीय कस्बे के प्रबुद्ध जनों में प्रमुख हरीश खुल्बे, जगदीश शर्मा, भगवत वर्मा, डॉ. रघुवीर पंत, प्रदीप पंत, केवल जोशी, विक्की पंत इत्यादि इत्यादि के प्रभावी सहयोग से किया जा रहा है।

मंचित की जा रही रामलीला में मानस की चौपाइयों व दोहों के गायन के साथ-साथ संवाद व संगीत की प्रधानता है। दर्शाए जा रहे अनेकों दृश्यों ने दर्शकों को काफी प्रभावित किया है। सीता स्वयंवर में सीता की विदाई दृश्य ने श्रोताओं को जहां भाव विभोर करने का काम किया वहीं परशुराम-लक्ष्मण संवाद व अंगद-रावण संवाद ने दर्शकों को बहुत प्रभावित किया।

राम, लक्ष्मण और सीता की भूमिका में क्रमशः कृष्ण पंत, कृष्ण भट्ट व दीपांशु पंत, हनुमान की भूमिका में भगवत बर्मा, रावण चंदन कड़ाकोटी, परशुराम प्रकाश पंत, कुंभकरण प्रदीप पंत व शबरी राजेंद्र पांडे ने अपने प्रभावशाली अभिनय व मधुर गायन से दर्शकों को आत्मविभोर किया। पात्रों की वस्त्र सज्जा व श्रृंगार रामकथा के अनुकूल व प्रभावशाली था।

पारंपरिक गीत नाट्य शैली की रामलीला की संरचना में जो रागों की विविधता है, जिसे सभी पात्र गाकर चरित्रों का विकास करते हैं। भीमताली शैली की रामलीला की मुख्य पहचान है। इस विधा को कुमाऊं अंचल में मंचित होने वाली रामलीलाओं के साथ-साथ भतरौंजखान की रामलीला कमेटी ने भी पारंपरिक रूप में कायम रखा है जो सकून देता नजर आता है।

रामलीला कमेटी भतरौंजखान के अध्यक्ष हरीश भट्ट का कहना है। अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में मंचित की जा रही रामलीलाओं में वादकों का अभाव झलकने लगा है। हारमोनियम मास्टर बड़ी मुश्किल से मिल पाते हैं। रामलीला में प्रतिभाग करवाने हेतु छोटे-छोटे नौनिहालों को तैयार कर मंच प्रदान किया जाता है। अवगत कराया गया उनकी कमेटी द्वारा मंचित की जा रही रामलीला में राम, लक्ष्मण व सीता तीनों बारह-तेरह वर्ष के हैं। बीस-बाईस वर्ष के हो जाने पर ये तैयार किए गए पात्र भी उच्च शिक्षा या रोजगार की तलाश में क्षेत्र से पलायन कर जायेंगे। अवगत कराया गया मंचित की जाने वाली रामलीला की चौपाइयां, दृश्य, अभिनय, संगीत की धुनें इत्यादि अंचल के लोगों में आत्मसात होती हैं। रामलीला मंचन में किसी भी पात्र की कमी को कोई भी उत्साही व्यक्ति भली भांति निभा देता है।

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Hill Mail

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