उत्तराखंड सरकार ने वर्षों पहले राज्य में डॉक्टरों की कमी दूर करने और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से मेडिकल कॉलेजों में बॉन्ड व्यवस्था लागू की थी। इस व्यवस्था के तहत छात्रों को मात्र ₹50 हजार सालाना फीस पर एमबीबीएस की पढ़ाई कराई जाती थी। बदले में उन्हें डिग्री पूरी करने के बाद निर्धारित अवधि तक पहाड़ के सरकारी अस्पतालों में सेवा देना अनिवार्य था।
शुरुआत में बॉन्ड के तहत डॉक्टरों को पांच वर्ष तक पर्वतीय क्षेत्रों में सेवाएं देनी होती थीं। हालांकि, बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने इस व्यवस्था में रुचि नहीं दिखाई। कई डॉक्टरों ने बॉन्ड तोड़ने का विकल्प चुना या अन्य रास्ते अपनाए। इसके बाद सरकार ने सेवा अवधि को घटाकर तीन वर्ष कर दिया, लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। बाद में मैदानी मेडिकल कॉलेजों में बॉन्ड व्यवस्था समाप्त कर दी गई और पर्वतीय क्षेत्रों में भी इसे वैकल्पिक बनाया गया। अब सरकार इसे पूरी तरह समाप्त करने पर विचार कर रही है।
यदि एमबीबीएस स्तर पर बॉन्ड व्यवस्था खत्म होती है तो छात्रों को वर्तमान की तुलना में अधिक फीस देनी होगी। अभी बॉन्ड के तहत छात्र ₹50 हजार सालाना फीस देकर पढ़ाई करते हैं, जबकि व्यवस्था समाप्त होने पर उन्हें करीब ₹1.5 लाख सालाना शुल्क देना पड़ सकता है। यानी छात्रों को कम फीस के बदले अनिवार्य सरकारी सेवा की बाध्यता नहीं रहेगी।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के अनुसार, राज्य में मेडिकल शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। नए सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेज खुलने के बाद अब उत्तराखंड में हर वर्ष 1,200 से अधिक एमबीबीएस डॉक्टर तैयार होकर निकल रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य में मेडिकल अधिकारियों के कुल करीब दो हजार पद हैं, जिनमें अधिकांश पहले ही भरे जा चुके हैं। ऐसे में हर साल बड़ी संख्या में नए डॉक्टरों को बॉन्ड के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में नियुक्त करने के लिए पर्याप्त पद उपलब्ध नहीं हैं।
चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ. सुबोध उनियाल ने कहा कि राज्य में हर वर्ष बड़ी संख्या में एमबीबीएस डॉक्टर तैयार हो रहे हैं। ऐसे में धीरे-धीरे उनके लिए बॉन्ड के तहत तैनाती के स्थान सीमित होते जा रहे हैं। इसी कारण सरकार एमबीबीएस स्तर पर बॉन्ड व्यवस्था समाप्त करने की संभावना पर विचार कर रही है।
हालांकि, पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) मेडिकल पाठ्यक्रमों में फिलहाल बॉन्ड व्यवस्था जारी रहेगी। इसकी मुख्य वजह यह है कि राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की अब भी भारी कमी बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सकों के लगभग 50 प्रतिशत पद खाली हैं। ऐसे में सरकार का मानना है कि पीजी डॉक्टरों के लिए बॉन्ड व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जिला अस्पतालों और पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बॉन्ड व्यवस्था से डॉक्टरों को पहाड़ों में लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। इसके लिए बेहतर वेतन, आधुनिक चिकित्सा उपकरण, आवास, बच्चों की शिक्षा, सुरक्षित कार्य वातावरण और करियर में उन्नति जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं। यदि इन मूलभूत समस्याओं का समाधान किया जाता है तो डॉक्टर स्वेच्छा से पर्वतीय क्षेत्रों में सेवाएं देने के लिए अधिक तैयार होंगे।
यदि सरकार एमबीबीएस स्तर पर बॉन्ड व्यवस्था समाप्त करने का अंतिम निर्णय लेती है तो यह उत्तराखंड की चिकित्सा शिक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव होगा। इससे मेडिकल छात्रों को राहत मिलेगी, लेकिन सरकार के सामने यह चुनौती भी रहेगी कि दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित की जाए। इसलिए आने वाले समय में स्वास्थ्य विभाग को ऐसी नई नीति तैयार करनी होगी, जो मेडिकल छात्रों के हितों और पहाड़ के लोगों की स्वास्थ्य जरूरतों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित कर सके।


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