यह अनुसंधान कार्यक्रम वर्ष 2023 में तत्कालीन कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान की पहल और नेतृत्व में पंतनगर विश्वविद्यालय तथा एनडीआरआई, करनाल के बीच वैज्ञानिक सहयोग से शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य आधुनिक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से बद्री नस्ल के श्रेष्ठ आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनका तीव्र गुणन करना है। तीन वर्षों के वैज्ञानिक प्रयासों के बाद मिली इस सफलता को परियोजना की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
परियोजना पिछले तीन वर्षों से उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी के वित्तीय सहयोग से संचालित हो रही है। इसमें पंतनगर विश्वविद्यालय के डॉ. शिव प्रसाद, डॉ. सुनील कुमार और डॉ. मृदुला शर्मा तथा एनडीआरआई, करनाल के डॉ. नरेश एल. सेलोकर और डॉ. एम.के. सिंह का प्रमुख योगदान रहा है। उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक डॉ. संजय शर्मा ने भी परियोजना को महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत श्रेष्ठ और अधिक उपयोगी बद्री गायों से ओपीयू तकनीक के जरिए अंडाणु प्राप्त किए गए। इन अंडाणुओं को प्रयोगशाला में परिपक्व करने के बाद श्रेष्ठ बद्री सांड के वीर्य से आईवीएफ के माध्यम से भ्रूण तैयार किए गए। तैयार भ्रूणों को साहीवाल और क्रॉसब्रेड गायों में प्रत्यारोपित किया गया। साहीवाल गाय से बद्री बछिया का जन्म इसी प्रक्रिया का परिणाम है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक अन्य क्रॉसब्रेड गाय में भी बद्री भ्रूण का सफल प्रत्यारोपण हुआ है और अगले पांच से सात दिनों में उसके बद्री बछड़े को जन्म देने की संभावना है।
परियोजना में केवल भ्रूण प्रत्यारोपण तक ही काम सीमित नहीं है। श्रेष्ठ और अधिक दुग्ध उत्पादन वाली बद्री गायों की क्लोनिंग पर भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। वैज्ञानिक दल क्लोन बद्री भ्रूण तैयार करने में सफलता प्राप्त कर चुका है। भविष्य में ओपीयू-आईवीएफ और क्लोनिंग तकनीकों का इस्तेमाल कर श्रेष्ठ बद्री आनुवंशिक संसाधनों का बड़े स्तर पर तेजी से गुणन करने की योजना है। इससे नस्ल संरक्षण के साथ बेहतर दुग्ध उत्पादन क्षमता वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने इस उपलब्धि पर वैज्ञानिक दल को बधाई दी। उन्होंने कहा कि बद्री गाय उत्तराखंड की महत्वपूर्ण स्वदेशी पशु आनुवंशिक संपदा है। इसके संरक्षण और आनुवंशिक सुधार के लिए आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ऐसे प्रयास भविष्य में पशुपालकों की आय बढ़ाने और राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में उपयोगी साबित होंगे।
पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. डी. कुमार ने भी वैज्ञानिक दल को सफलता के लिए बधाई दी। वैज्ञानिकों ने उपलब्धि के लिए पूर्व कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान की पहल, वर्तमान कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप के संस्थागत सहयोग, उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, विश्वविद्यालय प्रशासन, निदेशालय अनुसंधान और शिक्षण डेयरी फार्म के सहयोग एवं मार्गदर्शन के प्रति आभार जताया।


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