Saturday , 5 September 2026
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विश्वविद्यालय में आईसीएआर फल अनुसंधान परियोजना की 13वीं समूह चर्चा का भव्य उद्घाटन

इस कार्यक्रम में देशभर के 19 आईसीएआर संस्थानों एवं 22 राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों, प्रतिनिधियों तथा छः राज्यों से आए प्रगतिशील किसानों ने सहभागिता की। समूह चर्चा में विभिन्न फलों से संबंधित परियोजना समन्वयकों ने भी प्रतिभाग किया।

इस अवसर पर आईसीएआर के प्रतिनिधि डॉ. ए.के. कर्नाटक, पूर्व कुलपति, एमपीयूएटी उदयपुर एवं यूयूएचएफ भरसार, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता एवं निदेशकगण उपस्थित रहे। यह समूह चर्चा फल अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग, ज्ञान-विनिमय एवं नवाचार को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) मनमोहन सिंह चौहान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ मंच पर डॉ. प्रकाश पाटिल, राष्ट्रीय आयोजन सचिव एवं परियोजना समन्वयक (फल), आईसीएआर-आईआईएचआर, बेंगलुरु; डॉ. दिलीप घोष, निदेशक, आईसीएआर-सीसीआरआई, नागपुर; डॉ. जगदीश राणे, निदेशक, आईसीएआर-सीआईएएच, बीकानेर; डॉ. एस.के. वर्मा, निदेशक (शोध); डॉ. सुभाष चंद्र, अधिष्ठाता कृषि तथा डॉ. ए.के. सिंह, संयुक्त निदेशक (उद्यान) उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. (डॉ.) मनमोहन सिंह चौहान ने अपने संबोधन में अनुसंधान परिणामों के प्रभावी प्रसार पर जोर देते हुए कहा कि शोध का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने मांग-आधारित अनुसंधान, आधुनिक तकनीकों के उपयोग तथा कृषि को उद्योग के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने उत्तराखंड के स्थानीय फलों बेडू एवं काफल को उन्नत किए जाने का सुझाव देते हुए इनके आकार एवं वजन में वृद्धि पर शोध की आवश्यकता बताई। साथ ही अन्य स्थानीय फलों के उन्नयन पर भी जोर दिया।

उन्होंने विश्वविद्यालय के उद्यान अनुसंधान केंद्र, पत्थरचट्टा में ड्रैगन फ्रूट, अंगूर एवं एवोकाडो जैसे नए फलों के रोपण की जानकारी दी तथा स्थानीय प्रजातियों को एनबीपीजीआर, नई दिल्ली में पंजीकृत कराने का सुझाव दिया। कुलपति ने कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में पहाड़ी क्षेत्र अधिक प्रभावित होते हैं, इसलिए इस दिशा में शोध आवश्यक है। साथ ही फलों में तुड़ाई उपरांत होने वाले नुकसान को कम करने एवं उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने पर भी बल दिया।

आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (फल एवं बागवानी फसलें) डॉ. वी.बी. पटेल ने वर्चुअल माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर चुनौती है और इसके दृष्टिगत फलों पर शोध को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने उपभोक्ता मांग के अनुरूप उच्च गुणवत्ता एवं पोषक तत्वों से भरपूर नई किस्मों के विकास तथा प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि भारत में कीवी की औसत उत्पादकता 2–3 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि न्यूजीलैंड में यह 38–40 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। उन्होंने फलों की प्रजातियों को पौध संरक्षण किस्म एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण, भारत सरकार में पंजीकृत करने का सुझाव भी दिया।

डॉ. दिलीप घोष, निदेशक, आईसीएआर-सीसीआरआई, नागपुर ने बदलते मौसम के कारण उत्पन्न नए रोग एवं कीटों के प्रति प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर बल दिया तथा नींबू में किए जा रहे शोध एवं उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने एआईसीआरपी केंद्रों पर 3-पी मॉडल अपनाने का सुझाव भी दिया।

डॉ. जगदीश राणे, निदेशक, आईसीएआर-सीआईएएच, बीकानेर ने शोध निर्णयों में आंकड़ों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए भविष्य में अनुसंधान उपकरणों को एआई आधारित एप्लिकेशन से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

इस अवसर पर एआईसीआरपी (फल) के परियोजना समन्वयक डॉ. प्रकाश पाटिल ने देश के 49 केंद्रों पर विभिन्न फलों में चल रहे शोध कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया तथा भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए उत्पादन एवं गुणवत्ता बढ़ाने हेतु रणनीतियों पर चर्चा की।

कार्यक्रम में अधिष्ठाता कृषि डॉ. सुभाष चंद्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में निदेशक शोध डॉ. एस.के. वर्मा ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए विश्वविद्यालय की उपलब्धियों तथा उत्तराखंड के पहाड़ी फलों बेडू, काफल एवं अन्य लघु फलों पर शोध की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के दौरान ‘आम, अमरूद एवं लीची की उत्पादन वृद्धि हेतु प्रौद्योगिकी टोकरी’ नामक प्रकाशन का विमोचन किया गया। साथ ही छः राज्यों से आए प्रगतिशील किसानों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अंत में संयुक्त निदेशक, उद्यान एवं आयोजन सचिव डॉ. ए.के. सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।

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