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घरेलू हुनर बना सम्मानजनक आय का साधन

जहां पहाड़ों से पलायन की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं, वहीं थान बिडोन की यह पहल गांव में ही रोजगार सृजन का सकारात्मक उदाहरण बन गई है। आसपास के गांवों की महिलाएं और युवा भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

टिहरी गढ़वाल जिले के चम्बा ब्लॉक के अंतर्गत बसे छोटे से गांव थान बिडोन की पहाड़ियों में सुबह की पहली किरण जब खेतों और आंगनों को रोशन करती है, तो यहां की महिलाओं की दिनचर्या शुरू हो जाती है। कभी केवल घर-परिवार तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज अपने गांव की पहचान बन चुकी हैं।

थान बिडोन गांव लंबे समय से पलायन की समस्या से जूझता रहा है। युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाते रहे, और गांव की जिम्मेदारी बुजुर्गों व महिलाओं के कंधों पर आ गई। सीमित संसाधन, छोटी जोत की खेती और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच अतिरिक्त आय का कोई स्थायी साधन नहीं था।

इन्हीं परिस्थितियों में गांव की कुछ महिलाओं ने सोचा, ‘क्यों न अपने पारंपरिक हुनर को ही आजीविका का माध्यम बनाया जाए?’ दादी-नानी से सीखी पहाड़ी मसालों की रेसिपी, घर की रसोई में बनने वाले अचार और पहाड़ की शुद्धता, यही उनकी पूंजी थी।

एक विचार से समूह तक

शुरुआत में 5–6 महिलाओं ने मिलकर स्वयं सहायता समूह बनाया। उन्होंने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे आम, नींबू, लिंगड़ा, भांग के बीज, जाखिया और अन्य पहाड़ी मसालों से अचार बनाना शुरू किया।

पहले यह अचार सिर्फ अपने उपयोग और पड़ोसियों तक सीमित था, लेकिन स्वाद और गुणवत्ता ने जल्द ही इसकी मांग बढ़ा दी। लोगों ने कहा, ‘इसमें पहाड़ की मिट्टी की खुशबू है।’

धीरे-धीरे उन्होंने साफ-सफाई, पैकेजिंग और लेबलिंग पर ध्यान देना शुरू किया। घर के आंगन में बनने वाला अचार अब बोतलों में बंद होकर स्थानीय बाजार तक पहुंचने लगा।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

आज यह पहल एक संगठित स्वरूप ले चुकी है। समूह की महिलाएं हर माह सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं। इससे बच्चों की शिक्षा में सुधार हुआ, परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, बैंक खाते और बचत की आदत बढ़ी,
महिलाओं का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा, सबसे बड़ी बात यह है कि अब वे निर्णय लेने में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

गुणवत्ता ही पहचान

इन महिलाओं का मानना है कि ‘विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी है।’ इसलिए वे केवल शुद्ध सरसों का तेल प्रयोग करती हैं, पारंपरिक तरीके से धूप में अचार पकाती हैं, किसी भी प्रकार के रासायनिक संरक्षक का उपयोग नहीं करतीं हैं। यही कारण है कि उनका अचार स्थानीय पहचान बन चुका है और ग्राहकों का भरोसा जीत रहा है।

पलायन के बीच उम्मीद की किरण

जहां पहाड़ों से पलायन की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं, वहीं थान बिडोन की यह पहल गांव में ही रोजगार सृजन का सकारात्मक उदाहरण बन गई है। आसपास के गांवों की महिलाएं और युवा भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

यह केवल अचार बनाने की कहानी नहीं, बल्कि साहस की कहानी, एकजुटता की कहानी, आत्मसम्मान की कहानी और आत्मनिर्भर भारत की सच्ची मिसाल है।

नई दिशा, नया विश्वास

आज थान बिडोन की महिलाएं केवल अपने परिवार की ताकत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की प्रेरणा बन चुकी हैं। उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि बड़े सपनों के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े हौसलों की आवश्यकता होती है।

पहाड़ की इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव की शुरुआत किसी महानगर से नहीं, बल्कि छोटे गांव की रसोई से भी हो सकती है और जब नीयत मजबूत हो, तो एक छोटा कदम भी पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है।

Written by
Hill Mail

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