जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया के निर्देशन में जिला कारागार में बंदियों को 21 दिवसीय हैंडीक्राफ्ट प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण जिला उद्योग केंद्र के माध्यम से आयोजित किया गया। इसमें बंदियों को पिरुल की पत्तियों को प्रसंस्कृत करने से लेकर उनसे विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प और घरेलू सजावट से जुड़े उत्पाद तैयार करने की तकनीक सिखाई गई।
प्रशिक्षण के दौरान बंदियों ने उत्पाद निर्माण की अलग-अलग विधियां सीखीं। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अब वे स्वयं पिरुल की पत्तियों से सजावटी वस्तुएं तैयार कर रहे हैं। इससे उन्हें अपने हुनर को व्यवहार में उतारने और स्थानीय संसाधन के उपयोग का व्यावहारिक अनुभव भी मिल रहा है।
जिला कारागार अधीक्षक कौशल सिंह ने बताया कि ‘एक जेल, एक उत्पाद’ पहल के तहत प्रशिक्षण देने का मुख्य उद्देश्य बंदियों को उपयोगी कौशल से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि जेल में रहते हुए यदि बंदियों को रोजगार से जुड़े हुनर मिलें तो सजा पूरी होने के बाद उनके लिए समाज की मुख्यधारा में लौटना और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ना आसान हो सकता है।
उन्होंने बताया कि पिरुल उत्तराखंड के जंगलों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध होता है और सामान्य तौर पर इसे अनुपयोगी समझा जाता है। अब इसी पिरुल का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों और हस्तशिल्प निर्माण के लिए किया जा रहा है। बंदियों द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पाद स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण भी पेश कर रहे हैं।
पिरुल से हस्तशिल्प तैयार करने की यह पहल पर्यावरणीय संसाधन के उपयोग के साथ कौशल विकास को भी जोड़ती है। प्रशिक्षण के माध्यम से बंदियों को उत्पाद बनाने की प्रक्रिया, सामग्री के उपयोग और हस्तकला की बारीकियों से परिचित कराया गया है। इससे उनमें काम करने का आत्मविश्वास विकसित करने और भविष्य में स्वरोजगार के विकल्प तलाशने का आधार तैयार हो रहा है।
जिला कारागार प्रशासन के अनुसार, ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम बंदियों को केवल समय बिताने के बजाय रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने में मदद करते हैं। पिरुल से तैयार किए जा रहे सजावटी उत्पाद उनके लिए नई शुरुआत की संभावनाएं भी पैदा कर रहे हैं। आने वाले समय में इन कौशलों के जरिए बंदी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल कर रोजगार और स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
‘एक जेल, एक उत्पाद’ पहल के तहत पिरुल को हस्तशिल्प से जोड़ना पौड़ी जिले में कौशल विकास और स्थानीय संसाधनों के उपयोग की दिशा में एक प्रयास है। इससे बंदियों को हुनर सीखने के साथ भविष्य में आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ने का अवसर मिल रहा है।


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