गैस संकट से जूझते टिहरी के गांव , चूल्हों की लौ में लौटती मजबूरी

गैस संकट से जूझते टिहरी के गांव , चूल्हों की लौ में लौटती मजबूरी

उत्तराखंड के टिहरी जिले के ग्रामीण इलाकों में रसोई गैस की भारी किल्लत ने आम जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई गांवों में लोग महीनों से गैस सिलेंडर का इंतजार कर रहे हैं और मजबूरी में फिर से लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाने को विवश हैं। गैस एजेंसियों की लापरवाही और वितरण व्यवस्था की खामियों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

नई टिहरी क्षेत्र में आयोजित जनता मिलन कार्यक्रम के दौरान नवागर गांव के प्रधान प्रदीप सजवाण ने शिकायत करते हुए बताया कि उनके गांव सहित सगंवाण में दो महीने से अधिक समय तक गैस की आपूर्ति नहीं हुई। शिकायत के बाद मंगलवार को टिहरी इंडेन गैस एजेंसी द्वारा आपूर्ति तो की गई, लेकिन यह एक स्थायी समाधान नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है और बार-बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।

 

प्रतापनगर, घनसाली और देवप्रयाग जैसे क्षेत्रों में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। यहां के ग्रामीणों को गैस सिलेंडर के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई बार बुकिंग के बाद भी समय पर डिलीवरी नहीं होती, जिससे लोगों में भारी रोष है। होम डिलीवरी लगभग ठप हो चुकी है और जब गैस की गाड़ी आती है, तो लोगों को घंटों—कभी-कभी पूरी रात—लाइन में लगना पड़ता है।

 

जिला पूर्ति अधिकारी मनोज डोभाल का कहना है कि कई बार ग्रामीण क्षेत्रों में बुकिंग की कमी के कारण वितरण में बाधा आती है, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि एजेंसियों को व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, इंडेन गैस एजेंसी नई टिहरी के प्रबंधक राजपाल सजवाण ने भी माना कि भीड़ और अनियमितता के चलते रोटेशन प्रणाली का पालन करना कठिन हो रहा है।

 

हालांकि, ग्रामीण इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका आरोप है कि गैस एजेंसियां जानबूझकर ग्रामीण क्षेत्रों में आपूर्ति करने से बचती हैं और गैस किल्लत का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ती हैं। रोशन सिंह, विकास कुमार, प्रकाश और राजेंद्र जैसे कई ग्रामीणों ने मांग की है कि गैस वितरण के लिए बनाए गए रोस्टर का सख्ती से पालन किया जाए और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।

 

गैस संकट के चलते जहां एक ओर लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है। लकड़ी के चूल्हों से निकलने वाला धुआं महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष रूप से हानिकारक साबित हो रहा है।

 

इस स्थिति में आवश्यक है कि प्रशासन और संबंधित एजेंसियां मिलकर ठोस कदम उठाएं, ताकि ग्रामीणों को समय पर गैस उपलब्ध हो सके और उन्हें इस परेशानी से राहत मिल सके।

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