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उत्तराखंड की पहाड़ियों में पिरूल से प्रगति की कहानी

वर्षों से पिरूल को जंगलों के लिए खतरे के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन कुछ जागरूक और नवाचारी महिलाओं ने इसी समस्या को अवसर में बदला। ये महिलाएं पिरूल से सुंदर टोकरी, सजावटी वस्तुएं, लैम्प शेड और अन्य उपयोगी हस्तशिल्प उत्पाद बना रहे हैं। इससे ये महिलाएं हर महीने ₹30,000 से ₹40,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं।

उत्तराखंड के जंगल हर साल गर्मियों में आग की भयावह समस्या से जूझते हैं। इस आग का एक बड़ा कारण हैं चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी सुइयां, जिन्हें स्थानीय भाषा में पिरूल कहा जाता है। ये सुइयां जंगल की ज़मीन पर मोटी परत बना लेती हैं और थोड़ी-सी चिंगारी से ही आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। वर्षों से पिरूल को जंगलों के लिए खतरे के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन कुछ जागरूक और नवाचारी महिलाओं ने इसी समस्या को अवसर में बदलने का साहसिक कदम उठाया।

साल 2021 में नुपुर और शरवरी पोहारकर ने मिलकर ‘पिरूल हस्तशिल्प’ की शुरुआत की। उनका उद्देश्य केवल हस्तशिल्प तैयार करना नहीं था, बल्कि जंगलों को आग से बचाना, स्थानीय संसाधनों का उपयोग करना और पहाड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना था। इस पहल के तहत अब तक लगभग 20,000 किलोग्राम से अधिक चीड़ की सुइयों का संग्रह और उपयोग किया जा चुका है, जो अन्यथा जंगलों में आग का कारण बन सकती थीं।

आज खेतीखान, त्यारसुन, पाटन सहित कई गांवों की 100 से अधिक महिलाएं इस पहल से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। इन महिलाओं को अपने घर के पास ही काम करने का अवसर मिला है, जिससे उन्हें परिवार और काम के बीच संतुलन बनाने में आसानी हुई है। पिरूल से सुंदर टोकरी, सजावटी वस्तुएं, लैम्प शेड और अन्य उपयोगी हस्तशिल्प उत्पाद बनाए जा रहे हैं, जिनकी बाज़ार में अच्छी मांग है। इससे महिलाएं हर महीने ₹30,000 से ₹40,000 तक की आय अर्जित कर पा रही हैं।

जहां बेहतर रोज़गार और सुविधाओं की तलाश में पहाड़ों से पुरुषों का शहरों की ओर पलायन एक बड़ी समस्या बन चुका है, वहीं ये महिलाएं गांव में रहकर स्वरोजगार की एक मजबूत मिसाल पेश कर रही हैं। इस पहल ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया है, बल्कि उनके आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक सम्मान में भी उल्लेखनीय वृद्धि की है। अब ये महिलाएं खुद को केवल गृहिणी नहीं, बल्कि उद्यमी के रूप में देखती हैं।

‘पिरूल हस्तशिल्प’ का यह मॉडल यह साबित करता है कि यदि पहाड़ी क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों का सही और नवाचारी उपयोग किया जाए, तो रोज़गार के नए और टिकाऊ अवसर पैदा किए जा सकते हैं। उचित प्रशिक्षण, बाज़ार से जोड़ने की व्यवस्था और संस्थागत सहयोग के साथ यह मॉडल पूरे हिमालयी क्षेत्र में अपनाया जा सकता है। इससे न केवल पलायन पर रोक लगेगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

यह पहल एक साथ कई समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है, जंगलों को आग से बचाना, पर्यावरण संरक्षण, महिलाओं को रोज़गार और आत्मनिर्भरता, और पहाड़ों में टिकाऊ विकास। यह कहानी सिखाती है कि सही सोच, सामूहिक प्रयास और नवाचार से पहाड़ों की सबसे बड़ी समस्याएं भी विकास और रोज़गार का सशक्त आधार बन सकती हैं।

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Hill Mail

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