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केदारनाथ आपदा के एक साल बाद

Kedarnathकेदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा उत्तराखंड ही नहीं देश की भीषणतम आपदाओं में से एक है। इस आपदा को आये एक साल पूरा हो गया है। पिछले साल 16 और 17 जून को केदार घाटी में आई तबाही के कारण हजारों लोगों का जनजीवन प्रभावित हो गया था। इस आपदा में हजारों लोग मारे गये और भारी जन-धन का नुकसान हुआ। यह घटना यूं तो प्रकृति के कहर का एक नमूना थी मगर इतनी बड़ी हानि के लिए कहीं न कहीं राज्य का लचर आपदा प्रबंधन तंत्र भी जिम्मेदार है।

उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां अलग से आपदा प्रबंधन मंत्रालय की स्थापना की गई। वर्ष 2000 में उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद पहली अंतरिम सरकार में ही अलग आपदा प्रबंधन मंत्रालय बना लिया गया था लेकिन विडंबना यह कि धरातल पर इसके लिए अब तक कोई ढांचा तक तैयार नहीं किया गया। आपदा की भीषणता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक साल गुजरने के बाद भी केदारघाटी में कंकालनुमा शवों के मिलने का सिलसिला थमा नहीं है। यह ठीक है कि आपदा पर किसी का वश नहीं चलता, लेकिन इसके प्रभाव को कम करने की दिशा में तो कारगर कदम सरकार को ही उठाने थे।

पिछले साल मंदाकिनी नदी से आई प्रलय और इस बार भारी बर्फवारी के बीच 11वें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ के कपाट 4 मई को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। लेकिन सवाल ये है कि क्या आम श्रद्धालु इस बार केदारनाथ के दर्शन कर पाएंगे। मंदिर तक पहुँचने का रास्ता 4 से 5 फीट बर्फ से पटा पड़ा है। मैंने केदारनाथ मंदिर तक पहुँचने के लिये बनाये नये रास्ते से 19 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय किया और देखा कि ये रास्ता कितना मुश्किल भरा है। पिछले साल तक पैदल रास्ता 14 किलोमीटर लंबा था।

पिछले साल केदार घाटी में आई तबाही के बाद इस बार राज्य सरकार युद्ध स्तर पर मंदिर तक पहुंचने का रास्ता बनाने और साफ सफाई का काम कर रही है। पिछले साल केदार घाटी में आई प्रलय को एक साल का वक्त हो गया है। आपदा के एक साल पूरा होने पर इंडिया टीवी संवाददाता मनजीत नेगी ने अपना पैदल सफर सोनप्रयाग से शुरु किया। पिछले साल तक केदारनाथ का पैदल रास्ता गौरीकुंड से शुरु होता था जो 14 किलोमीटर लंबा था।

ये नया रास्ता काफी कठिन और मुश्किलों से भरा है। हमारा अगला पड़ाव गौरीकुंड है। गौरीकुंड में केदारनाथ कि त्रासदी के दौरान काफी तबाही हुई। गौरीFlood in Chamoliकुंड के रास्ते में हमें एक दुर्घटनाग्रस्त हैलिकॉप्टर मिला। केदारनाथ की प्रलय के दौरान तीन हैलिकॉप्टर दुर्घटना के शिकार हुये थे। सबसे बड़ी दुर्घटना वायु सेना के एमआई-17 हैलिकॉप्टर की हुई थी जिसमें 18 लोगों की मौत हो गयी थी। अब हम जंगलचट्टी पहुँच चुके थे केदारनाथ की यात्रा में ये एक अहम पड़ाव है। जंगलचट्टी में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। अब यहां पर यात्रियों के लिये कुछ अस्थायी शिविर बनाये गये हैं।

हमारी अगली मंजिल रामबाड़ा है। केदारनाथ मंदिर की यात्रा में रामबाड़ा सबसे अहम पड़ाव है। अब तक हम 13 किलोमीटर का रास्ता तय कर चुके थे। रामबाड़ा के हालात चैंकाने वाले थे त्रासदी के एक साल के बाद भी हालात बहुत ज्यादा बदले हुये नजर नहीं आ रहे थे। हर तरफ मलबा बिखरा हुआ है जिसमें अधजले शव और आपदा के शिकार लोगों का सामान शामिल है। इस इलाके में सड़क बनाने के लिए पीडब्ल्यूडी ने 2200 करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं लेकिन आसपास घर, दुकानें सब नष्ट हैं।

पैदल यात्रा की असली चुनौती रामबाड़ा से शुरु होती है। नए रास्ते में मंदिर तक पहुँचने के लिये मंदाकनी नदी को पार करना है। लोक निर्माण विभाग और नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटनियरिंग (निम) के जवान मंदाकनी नदी पर पुल बनाने में जुटे हैं। रामबाड़ा से केदारनाथ मंदिर तक रास्ता  बनाने की जिम्मेदारी नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटनियरिंग और उत्तराखंड पुलिस को दी गयी है। निम के प्रिंसिपल कर्नल अजय कोठियाल ने बताया कि उनके जवान रामबाडा से केदारनाथ तक का रास्ता बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सिर्फ दो महीने के कम समय में इन लोगों ने ये रास्ता बनाने में कामयाबी हासिल की है।

रास्ते में हमें कुछ ऐसे लोग मिले जो उस आपदा के गवाह रहे हैं उनमें से एक हैं बृजमोहन बिष्ट। इन्होनें आपदा के दौरान सबसे पहले रामबाड़ा पहुँचकर सैकडों लोगों की जान बचायी थी। बृजमोहन अब रामबाड़ा से केदरनाथ तक रास्ता बनाने में मदद कर रहे हैं। केदारनाथ से पांच किलोमीटर पहले ही भारी बर्फ से ढका रास्ता शुरु हो जाता है। यह रास्ता 4 से 5 फीट बर्फ से ढका है। रात के 9 बजे हम केदारनाथ के पास लिनचैरी नामक जगह पर पहुंचे।

केदारनाथ बेस कैंप के पाManjeet Negi in Kedarnathस बर्फ काट कर चालीस गुणा चालीस फीट का हेलीपैड बनाया गया। पुलिस व निम के सैकड़ों कर्मचारी के प्रयास से यह सफलता मिली। केदारनाथ में ट्रांसफार्मर भी ले जाया जाना है, ताकि केदारपुरी में विद्युत व्यवस्था सुचारु की जा सके। इसी हेलीकॉप्टर की मदद से जरुरी सामान पहुंचाया जाएगा।

स्पेशल टास्क फोर्स के प्रमुख डीआईजी जी एस मर्तोलिया के मुताबिक इस बार यात्रा के नए रूट के साथ केदारनाथ में एग्जिट रूट की भी प्लानिंग की जा रही है। ऐसी जगहों की पहचान की जा रही है जो आपदा की स्थिति में एग्जिट रूट हो सकता है। ऐसी जगहों पर मार्किंग की जा रही है। उनका कहना है कि पिछले साल केदारनाथ में आई आपदा में ज्यादातर मौतें रास्तों में तीर्थयात्रियों के भटकने से हुई थीं। भारी बरसात, बारिश और भूस्खलन होने पर यात्रियों को समझ नहीं आया कि कैसे सुरक्षित जगह पर पहुंचा जाए।

मंदिर तक पहुँचने में एक और बड़ी परेशानी है मंदिर के पास मंदाकिनी नदी को पार करना। यहां पर कई बार अस्थायी पुल बनाया गया लेकिन वो नदी के तेज बहाव में टिक नहीं पाया। इसी अस्थायी पुल से एक एसडीएम की मौत हो गयी थी। चारों तरफ बर्फ से ढका भगवान केदारनाथ का मंदिर। पिछले दो महीनों से प्रशासन मंदिर के आसपास बर्फ हटाने और सफाई के काम में जुटा है। पहली बार हमनें देखा कि कुदरत के सामने इन्सान कितना बौना हो जाता है। पहले बाढ का कहर और अब बर्फ का कहर।

प्रलय के लगभग एक साल के बाद भी मंदिर के आसपास हालात जैसे के तैसे हैं। प्रलय के लगभग एक साल बाद भक्तों के लिये उम्मीद की किरण ये कि तमाम मुश्किलों के बाद भी मंदिर को सजाया संवारा जा रहा है। प्रलय के दौरान मंदिर को भी नुकसान पहुंचा उसको भी ठीक किया गया है। मंदिर का बायां द्वार बदलकर नया द्वार लगा दिया गया है। मंदिर की कुछ शिलाएं अभी भी बदली जानी बाकि हैँ। मंदिर के पीछे मन्दाकिनी नदी भी जम चुकी है। मन्दाकिनी नदी और गांधी सरोवर में बाढ़ आने से ही केदार घाटी में तबाही आई थी।

प्रलय के बाद मैं पांचवी बार हालात का जायजा लेने केदार घाटी पहुंचा। इस भीषण तबाही से उभरने की कोशिश तो की जा रही है लेकिन अभी बहुत काम बाकी है।
 
– मनजीत नेगी, विशेष संवाददाता इंडिया टीवी

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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