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चिड़ियाघर दिखा रहा प्लास्टिक कचरे से निपटने की राह

चिड़ियाघर प्रशासन चाहता है कि पर्यटक पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी नई जानकारियां भी सीख कर जाएं। सबसे ज्यादा जरूरी है कि प्लास्टिक को न कहें यानी रिफ्यूज़ करें।

हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून

पृथ्वी प्लास्टिक ग्रह में बदल रही है। आज प्लास्टिक हमारे रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। प्लास्टिक और ठोस कचरे का निपटारा उत्तराखंड के लिए अब भी एक बड़ी चुनौती है। प्लास्टिक का सही प्रबंधन बहुत जरूरी है ताकि पर्यावरण का बेहतर प्रबंधन हो। देहरादून का चिड़ियाघर इस मामले में राह दिखाने वाला साबित हो सकता है।

देहरादून चिड़ियाघर के निदेशक आईएफएस अधिकारी पीके पात्रो बताते हैं कि उन्होंने प्लास्टिक और पर्यावरण प्रबंधन के लिए आरआरआर यानी रिड्यूस, रि-साइकल और रि-यूज़ के सिद्धांत को अपनाया है।

प्लास्टिक कचरे को कम करने के लिए चिड़ियाघर आने वाले पर्यटकों के प्लास्टिक के सामान पर स्टीकर लगा दिया जाता है और उनसे एक सामान के दस रुपये ले लिए जाते हैं। वापसी के समय पर्यटक प्लास्टिक का सामान दिखाता है और उसके रुपये उसे वापस दे दिए जाते हैं। हालांकि ऐसे पर्यटक भी होते हैं जो पैसे देने के बावजूद प्लास्टिक चिड़ियाघर में ही छोड़ जाते हैं। ऐसे में वहां काम करने वाले कर्मचारी उन बोतलों या दूसरी वस्तुओं को वापस करता है और बदले में उन्हें पैसे मिल जाते हैं। इस तरह यहां प्लास्टिक का कचरा कम हो जाता होता है।

इसके अलावा देहरादून चिड़ियाघर ने प्लास्टिक की बोतलों को फ्लैक्स (चूरे) में बदलने वाली बायो क्रश मशीन लगाई है। जो उत्तराखंड में लगने वाली पहली बायोक्रश मशीन है। इस मशीन से मिले प्लास्टिक के चूरे को फाइबर समेत दूसरी चीजों में रिसाइकल किया जा सकता है। चिड़ियाघर प्रशासन इस चूरे को 15 से 17 रुपये किलो के हिसाब से बेच देता है।

रि-यूज़ करने के लिए उस प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं जिसे रिसाइकल नहीं किया जा सकता। जैसे प्लास्टिक की थैली, चिप्स-कुरकुरे के पैकेट, थर्माकोल आदि। सीमेंट के बैग में इस कचरे को भरा जाता है। उसके ऊपर सीमेंट की परत चढ़ा दी जाती है। देहरादून चिड़ियाघर में इसका खूब इस्तेमाल हुआ है। जगह जगह इसी प्लास्टिक को रिसाइकल कर बायो-स्टोन बनाए गए हैं। ये बायो स्टोन किसी कलाकृति नुमा नज़र आते हैं। पर्यटक इनके आगे ख़ुशी-ख़ुशी सेल्फी लेते हैं। चिड़ियाघर में निर्माणाधीन सर्पगृह की दीवार को गुफ़ा जैसा दर्शाने के लिये इसी तरह प्लास्टिक की दीवार बनाई गई है।

इको सेंसेटिव चिड़ियाघर बनाने के लिए यहां कुछ और भी प्रयोग किए गए हैं। जैसे गाड़ी के टायर को रंगकर, उसके बीच मिट्टी डालकर एक पौधा रोप दिया गया। इससे टायर भी रिसाइकल हो गए और एक बड़ा डिजाइनर गमला मिल गया।

कैक्टस के बगीचे में कांटेदार पौधों के बीच उगे फूल कुदरत के अनोखेपन का अहसास कराते हैं। बगीचे की घेरेबंदी के लिए बनी बाउंड्री भी कुछ अनोखेपन का अहसास कराती है। यहां फेंकी गई बियर की बोतलों को उलटा कर एक कतार में सीमेंट से जोड़ दिया गया है। इसकी बाउंड्री के लिए बनायी गई दीवार पर जूट की बोरियों को टांगकर उस पर सीमेंट चढ़ा दी गई है। इस तरह ये एक डिजायनर दीवार सी बन गयी है।

देहरादून चिड़ियाघर के निदेशक पीके पात्रो बताते हैं कि बेहतर पर्यावरण प्रबंधन के लिये ही उन्हें इस वर्ष अप्रैल में आईएसओ से प्रमाण पत्र मिला है। पर्यावरणीय कसौटियों पर खरा उतरने के लिए इस दिशा में कई और कदम उठाए जाएंगे। पूरे चिड़ियाघर को सोलर सिस्टम के ज़रिये बिजली मुहैया करायी जाएगी। प्लास्टिक की बायो ब्रिक्स बनाकर उसका इस्तेमाल दीवार और बाउंड्री बनाने में किया जाएगा। इसके लिए प्लास्टिक की बोतलों में पन्नी और रैपर्स जैसे कचरे को भरा जाएगा। जिससे वो बोतल ठोस हो जाएगी। यही प्लास्टिक ब्रिक है। जिसका इस्तेमाल दीवार बनाने में किया जाएगा। ये दीवार टैम्परेचर इन्सोलेशन का कार्य भी करती है। इससे अंदर का तापमान कम रहता है। पीके पात्रो कहते हैं कि विदेशों में इस पर बहुत कार्य हुआ है। इससे लागत और समय दोनों की बचत होती है।

देहरादून चिड़ियाघर के सफ़र की ये शुरुआत ही है। वर्ष 1976 में मालसी डियर पार्क की स्थापना की गई थी। इसी डियर पार्क को वर्ष 2015 में मिनी ज़ू का दर्जा दिया गया। पिछले वर्ष अप्रैल 2017 से मार्च 2018 के बीच यहां छह लाख से ज्यादा सैलानी आए। इससे पहले ये संख्या चार लाख के आसपास थी। चिड़ियाघर को बेहतर बनाने के लिये जिस तरह कार्य हो रहा है, प्रशासन को उम्मीद है कि इस बार ये आंकड़ा दस लाख को पार कर जाएगा।

कुदरती सौंदर्य के बीच खूबसूरत पंछियों, मछलियों और जंगली जानवरों की दुनिया आकर्षित तो करती ही है। चिड़ियाघर प्रशासन चाहता है कि पर्यटक यहां जानवरों के साथ-साथ पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी चीजें और नई जानकारियां भी सीख कर जाएं। इसे आजमाएं। इस सबके साथ सबसे ज्यादा जरूरी है कि प्लास्टिक को न कहें यानी रिफ्यूज़ करें।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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