देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र के डाकरा बाजार में सतीश खुखरी की दुकान में शोकेस में लगी खुखरी को देखकर आपका मन भी इसे एक बार हाथ में उठाने को चाहेगा। अलग-अलग खुखरी अलग-अलग आकार और वजन की है। अपनी दुकान पर अखबार पढ़ते हुए सतीश खुखरी ने बताया कि इसकी शुरुआती कीमत साढ़े चार सौ रुपए है। इसके बाद खुखरी में इस्तेमाल धातु, वज़न और बनाने के तरीके के लिहाज़ से कीमत हज़ारों तक में हो सकती है। सतीश खुखरी शॉप पर आपको सोलह हजार रुपए कीमत की खुखरी भी मिल जाएगी।
डाकरा बाज़ार की यही वो दुकान है, जहां अमेरिकी सेना ने 60 खुकरी बनाने का ऑर्डर दिया है। अमेरिकी मरीन अधिकारी खुद सतीश जी की दुकान पर आए और उन्हें खुकरी बनाने का ऑर्डर दिया। सतीश बताते हैं कि ज्यादातर भारतीय सेना से उन्हें खुखरी बनाने का ऑर्डर मिलता है। उनकी ए दुकान सौ वर्ष से अधिक पुरानी है और खुखरी बाजार में इसकी अलग पहचान है। यही वजह है कि उन्हें ए ऑर्डर भी मिला।

खबर के मुताबिक, अल्मोड़ा के रानीखेत में भारतीय और अमेरिकी सैनिकों के संयुक्त युद्धाभ्यास के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने भारतीय खुखरी देखी। भारतीय सेना के गोरखा रेजिमेंट के पास मौजूद खुखरी उन्हें पसंद आई। इसके बाद ही खाड़ी देशों में अपने अभियान के लिए उन्होंने देहरादून के सतीश खुखरी शॉप पर 60 खुखरी के ऑर्डर दिए। विकास राज खुखरी बनाने के पूरे काम को देखते हैं। जो मशीन से भी बनाई जाती है और इसके कारीगर भी होते हैं। हाथों से बनी खुखरी की अलग पहचान और धार है। अमेरिकी सेना से मिले ऑर्डर भी हाथ से बने खुखरी के ही हैं। अमेरिकी सेना के अधिकारियों ने जब अपने चाकू की तुलना खुखरी से की, तो उन्हें ए हथियार ज्यादा पसंद आया। मशीन से बनी खुखरी की तुलना में हाथ से बनी खुखरी चलती भी ज्यादा है।
इससे पहले भी यहां खुखरी के ऑर्डर मिलते रहे हैं। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब बिना किसी मध्यस्थता के सीधे खुखरी बनाने का ऑर्डर दिया गया। खुकरी गोरखा समुदाय का पारंपरिक हथियार है। आकार में चाकू से कुछ बड़ा और मुड़ा हुआ हथियार सेना के जवान अपने पास रखते हैं। गोरखा समुदाय तोहफे के रूप में भी खुखरी का इस्तेमाल करता है।

साधारण सर्विस खुखरी 6 इंच से शुरू होती है। इसका वज़न एक किलो से कम होता है। इसकी ब्लेड 12 इंच तक होती है। इसी तरह 9 इंच, 10 इंच, 12 इंच तक की ब्लेड की खुखरी बाज़ार में उपलब्ध है। इसे बनाने में लोहा, लकड़ी, रैक्सीन, पीतल, चमड़ा समेत अऩ्य धातुओं का इस्तेमाल होता है। नेपाली खुखरी अमूमन 12 इंच के ब्लेड की होती है। गढ़वाली खुखरी भी 12 इंच के ब्लेड की होती है। गोरखा खुखरी 6 से 9 इंच के ब्लेड की होती है।
वर्ष 1965 और 1971 के युद्ध में भी भारतीय जवानों ने खुखरी का इस्तेमाल किया था। एक समय खुखरी की अच्छी मांग हुआ करती थी। तब खुखरी के अच्छे कारीगर भी हुआ करते थे। लेकिन अब खुखरी की मांग में गिरावट आई है। अब इनके कारीगरों संख्या भी कम हो गई है। यही नहीं जब से मशीन से बनी खुखरी लोग खरीदने लगे, हाथ से बनी खुखरी की मांग में गिरावट आई। जबकि हाथ से बनी खुखरी ज्यादा समय तक चलती है।
जब हम सतीश खुखरी की दुकान से निकलने लगे, उसी समय एक महिला वहां पहुंची। उन्होंने 11 इंच की ब्लेड वाली खुखरी का ऑर्डर दिया था। जिसके लिए उन्हें अभी और इंतज़ार करना था। ग्राहकों का इंतज़ार करती खुखरी की दुकान के लिए सेना से मिलने वाले ऑर्डर ही जीने का ज़रिया हैं।


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