Friday , 4 September 2026
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ऐसे बागवान ही बचाएंगे अब

सुशील बहुगुणा

पिछले कुछ दिनों की छुट्टियां उत्तराखंड में बाग बगीचों के अध्ययन में बिताईं। कई कृषि विज्ञानियों से भी मिला। काफी कुछ नया सीखा और जाना। अन्त में ये विचार और पुष्ट हुआ कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों को अपनी सर्वाधिक शक्ति और संसाधन बागवानी पर ही लगानी होगी। उसे केंद्र में रखना होगा।

खेती यहां के छोटे काश्तकारों के लिए मुफीद नहीं है जबकि बागवानी उनकी किस्मत बदल सकती है। लेकिन लोगों को अब सरकार के भरोसे बैठने के बजाय खुद पहल करनी होगी। ऐसी ही एक शानदार शख्सियत से शुक्रवार शाम चम्बा के पास कनाताल में मिलने का सौभाग्य मिला। खेतों में काम छोड़ उन्होंने हमसे मिलने का समय निकाला। उनके हाथों में लगी मिट्टी बता रही थी अपनी मिट्टी से उनका लगाव।

ये हैं मंगलानंद डबराल – 80 साल के बुजुर्ग जिन्होंने बागवानी के क्षेत्र में जो रोशनी दिखाई है उस पर हमारे ग्रामीण युवकों को चलना ही चाहिए, सीखना ही चाहिए। मंगलानंदजी ने कीवी फ्रूट की फसल बड़ी ही कामयाबी के साथ उगायी है (खास बात कीवी के फल को बंदर नहीं खाता क्योंकि ये बहुत खट्टा होता है। तोड़ने के बाद पकता है केले की तरह) यही नहीं कीवी, आड़ू, पुलम, खुबानी, सेब, अखरोट और कई सब्जियों के साथ कई नए और शानदार प्रयोग किये हैं।

20 साल पहले वो खाड़ी देशों में नौकरी छोड़ घर लौटे और फिर खेती में ही रम गए। आज उत्तराखंड में बागवानी के क्षेत्र में उनका अलग काम और नाम है। अपने बेटों के साथ वो अपना ये काम और आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बागवानी के साथ डिब्बाबंद अचार, चटनी और जूस का काम भी काफी आगे बढ़ा दिया है।

उनकी कामयाबी इस बात की मिसाल है कि अगर थोड़ी मेहनत और ज्यादा दिमाग लगाया जाए तो 20 से 50 हजार रु महीना आमदनी के लिए तो गांव छोड़ने की बिलकुल जरूरत नहीं पड़ेगी। और अगर चकबंदी हो जाये तो ये कोशिश और भी सार्थक साबित होगी।

बागवानीपलायन रोकने का भी एक अचूक उपाय साबित होगा। उत्तराखंड के कुछ युवाओं ने इस दिशा में पहल भी की है लेकिन इस पहल को क्रांति में बदलने के लिए हजारों युवकों को अपने खेतों में उतरना होगा। अगर सहकारी प्रयास किये जायें तो और बेहतर। हमारे पास मंगलानंद डबराल जैसे नायक हैं।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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