नकली फसलों के लिए एक सफल मॉडल साबित हो चुका चमोली जिले का यह गांव अब बन चुका है डिजिटल
घेस से हिल-मेल के लिए हरेंद्र बिष्ट
उत्तराखंड का भूगोल इस राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बहुत सारी संभावनाएं समेटे हुए है। यहां का मौसम, वातावरण व वन्य जीवों का रहस्यमय संसार, मखमली बुग्याल और सफेद चादर ओढ़ेहिमालय की विहंगम चोटियां जहां पर्यटन से बेशुमार आय देने की क्षमता रखती हैं वहीं यहां की खेती किसानों को बहुत अच्छी आय देने को तैयार बैठी हैं। इसके बावजूद शहरी जीवन की चकाचौंध की चाह में पहाड़ वीरान हो रहे हैं। घरों में ताले लटके हैं, गांव वीरान हैं और खेती बंजर। इस सबके बीच चमोली जिले का एक सुदूरवर्ती गांव घेस रिवर्स पलायन का संदेश दे रहा है।
तीन साल पहले जब यह कहानी शुरू हुई तो यह अंदाजा नहीं था किएक ऐसा मॉडल सामने आ सकता है, जो समूचे पहाड़ को समृद्धि देने की संभावनाएं जगा देगा। कभी घेस घाटी के बारे में कहा जाता था…जिसके आगे नहीं देश, वही है घेस। लेकिन अब यह धारणा बदल रही है। यह संभव हुआ है घेस के कायाकल्प से। शुरुआत हुई किसानों की आय बढ़ाने के लक्ष्य से। इसमें मटर की नकदी खेती का प्रयोग पूरी तरह सफल होकर निकला। घेस, हिमनी और बलाण के किसानों ने दो फसलों में ही 55 लाख से अधिक की सीधी कमाई की। यह कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि यह सीधे मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से जुड़ी हुई है। दरअसल, 2014 में उन्हीं की प्रेरणा से घेस में यह पहल हुई। हालांकि तब वह सिर्फ वरिष्ठ भाजपा नेता थे। उन्होंने नकदी खेती के लिए काम करने वाले बनारस से सुरेश कुमार उर्फ पप्पू भाई को घेस के निवासी और स्थानीय पत्रकार अर्जुन बिष्ट से यह कहकर मिलवाया कि इनका नकदी फसलों पर काफी अच्छा काम है, इन्हें अपने क्षेत्र में ले जाइये और कुछ करवाइये। यह वह समय था जब वहां सेब के बागीचों पर काम हो रहा था।
ऐसे बदली घेस की कहानी….
एक नई फसल से किसानों की आय बढ़ाने का यह प्रयास लोगों को भले ही सामान्य सा लगता होगा, लेकिन हकीकत यह है कि इस मॉडल को तैयार करने में तीन वर्ष लग गए। खेती का स्वरूप बदलने से ज्यादा बड़ी चुनौती इस बात की थी कि किसानों का भरोसा कैसे जीता जाए। कैसे उन्हें पूरी तरह अलाभकारी साबित हो रही पुरानी फसलों को छोड़कर ज्यादा लाभ देने वाली फसलें उगाने के लिए तैयार किया जाए। बहरहाल, 2015 में निदेशक उद्यान के निर्देश पर घेस में पहली किसान गोष्ठी रखी गई। इसके बाद शुरू हुआ घेस में मटर की खेती का ट्रायल। शुरुआत 20 किलो मटर के बीज के साथ हुई। इसके बाद 2016 में लोगों ने साढ़े चार क्विंटल मटर का बीज लगाया। अक्टूबर में सात से आठ लाख की फसल खड़ी हो गई। पहले ही साल किसानों को ठीक-ठाक पैसा मिल गया। किसानों को समझ आ गया कि परंपरागत फसलों के मुकाबले नकदी फसल की खेती ज्यादा फायदेमंद है। इसके बाद 2017 में घेस और हिमनी से दोगुने से भी अधिक किसान मटर की खेती करने को तैयार हो गए। कुल मिलाकर जहां पहले साल में खेती करने वालों की संख्या सौ का आंकड़ा भी नहीं छू पाई थी, वहीं दूसरे साल यह संख्या 380 से भी ऊपर चली गई। किसानों ने 15 क्विंटल बीज की बुवाई की। दूसरे साल में इस क्षेत्र से 45 लाख का उत्पाद तो सीधे मंडी में गया, जबकि शेष मटर स्थानीय बाजार में खपाया गया।
आज त्रिवेंद्र मुख्यमंत्री हैं और अपने प्रयास को सफल होता देख उन्होंने किसानों की आय बढ़ाने वाले इस मॉडल को विस्तार देने की योजना बनाई है। देवाल विकास खंड के आधा दर्जन से अधिकऔर गांवों (मुंदोली, हरनी, ल्वाणी, ताजपुर, देवस्थली, सुया और मेलमिंडा) में सीजनल मटर का ट्रायल भी कराया गया है। जुलाई महीने में इस योजना को चमोली, बागेश्वर व पिथौरागढ़ जिलों के50 से अधिक गांवों तक विस्तार देने के लिए रोडमैप तैयार हो रहा है। अप्रैल से ऐसे गांवों में किसानों से सीधा संवाद शुरू किया जाएगा। इसके साथ ही घेस घाटी के जिन गांवों में सफलतापूर्वक मटर की खेती हो चुकी है, वहां सेब के बागीचे विकसित करने की रणनीति पर काम हो रहा है। इसके लिए ग्रो हिमालयन इकोनॉमी सोसाइटी (घेस) नाम से एकसंस्था बनाई गई है जिसमें स्थानीय कास्तकार तो हैं ही, साथ में हिमाचल प्रदेश के तीन सफल बागवानों को भी शामिल किया गया है। दीर्घकालीन लाभ के हिसाब से बन रही योजना के अनुसार, किसान को जहां वर्ष में एक बार सेब से आय होगी वहीं तीन बार मटर, टमाटर और चायनीज लहसुन व आलू जैसी नकदी फसलों से निरंतर आय की व्यवस्था भी की जा रही है। सेब के बगीचे इस हिसाब से लगाए जा रहे हैं कि अगले दो साल में फल दे दें। इसके लिए हिमाचल के सफल बागवानों की मदद ली जा रही है। ये बागवान तकनीकी ज्ञान देने के साथ-साथ अच्छी किस्म के सेब के पेड भी उपलब्ध कराने को तैयार हैं।
घेस ने साबित कर दिया कि आजीविका पहाड़ों में भी रहकर बेहतर ढंग से चलाई जा सकती है। पहाड़ के लोग मेहनती हैं, उनकी जमीन सोना उगलती है। जरूरत है तो बस उन्हें भरोसे में लेने, सही तकनीक देने और उनके उत्पाद का सही मूल्य सुनिश्चित करने के लिए सही सिस्टम बनाने की।
———————
जब इस मेहनत का परिणाम सामने आया तो व्यक्तिगत रूप से खुशी हुई कि मेरे क्षेत्र में कुछ नई शुरुआत तो हुई। किसानों के साथ तीन साल तक संवाद रखने के बाद इतना जरूर पता चला कि वह सिस्टम से हतोत्साहित है। वह करना तो चाहता है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ा संकट इस बात का है कि नकदी फसलों के लिए अच्छी क्वॉलिटी का बीज कौन देगा। सेब के बाग के लिए अच्छी किस्म का पेड़ कहां से मिलेगा, खेती-बागवानी की बेहतर तकनीक कौन सिखाएगा और फसल तैयार होने के बाद उसे कौन खरीदेगा। जिस दिन सिस्टम किसानों की जरूरत के हिसाब से काम करने लगेगा, वह अपनी जमीन से सोना उगलवा देगा।
– अर्जुन बिष्ट, स्थानीय निवासी घेस
-—-—-—-—-—-—-—
एक अखबार में मेरे बारे में पढ़ने के बाद त्रिवेंद्र सिंह जी ने मुझे बुलाया था। मेरे काम के बारे में विस्तार से जानकारी लेने के बाद मुझे थराली क्षेत्र में जाने को कहा। मैं वहां गया तो 2013 में देवाल विकास खंड के कुछ गांवों में मटर की फसल लगवाई। इसके बादउन्होंने मुझे वरिष्ठ पत्रकार और घेस निवासी अर्जुन बिष्ट से मिलवाया। फिर हमने घेस में काम शुरू किया और आज नतीजा सबके सामने है। पहाड़ से मेरा बहुत लगाव है। आधी उम्र हिमाचल में गुजर गई। वहां से बहुत कुछ सीखा। उसी को उत्तराखंड में विस्तार देने का प्रयास कर रहे हैं। हमारा किसान सबकुछ कर सकता है, बस उसे भरोसेमंद सिस्टम उपलब्ध कराने की जरूरत है।
– पप्पू भाई, नकदी फसल विशेषज्ञ


Leave a comment