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…तो उत्तराखंड से देवी-देवताओं का भी पलायन!

पहाड़ों में दो सौ से अधिक लोक देवियां और देवता हैं। इनमें नंदा देवी, राज राजेश्वरी, झाली-बाली देवी, ज्वाल्पा, सुरकंडा, भद्रकाली, बाराही प्रमुख हैं। इसी तरह गोलू देवता, ऐड़ी देवता, भैरव, नरसिंह देवताओं के कई मंदिर हैं।

वर्षा सिंह, देहरादून

पलायन की मार झेल रहे उत्तराखंड के गांवों के लोक-देवता अपने-अपने मंदिरों में बंद भक्तों की राह देख रहे हैं। साल में एक बार गांवों में पूजा के समय ये मंदिर खुलते है। एक दिन की रौनक होती है और फिर लोग अपनी-अपनी मंज़िलों की ओर लौट जाते हैं। बीते समय में कुछ ऐसा भी हुआ कि जो लोग अपने उजड़ चुके गांवों में नहीं लौट रहे, उन्होंने शहरों में अपने देवता को स्थापित कर लिया। लोगों के लोक देवताओं ने भी पलायन कर लिया। तो कई गांव ऐसे भी हैं, जहां घर तो खंडहर में तब्दील हो गए लेकिन मंदिर दुरुस्त कर दिए गये।

वैज्ञानिक और साहित्यकार डॉ अरुण कुकसाल कहते हैं कि पिछले पचास वर्षों में उत्तराखंड में दो तरह के रुझान देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ तो कुछ जगहों से लोक देवी-देवता पलायन कर गए हैं। दूसरा ये भी है कि अब गांव-गांव में मंदिर बन रहे हैं। क्योंकि जो लोग बाहर चले गए हैं, आर्थिक तौर पर मजबूत हुए हैं, उन्होंने अपने लोक देवताओं को प्रसन्न करने के लिए गांवों में मंदिर बनवाए। लेकिन इन मंदिरो को चलाने वाले लोग ही नहीं रहे। मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं हो रहा। इसलिए ये वीरान भी हो रहे हैं। डॉ कुकसाल कहते हैं कि गांव के लोगों की ज़िदंगी भी शहरी लोगों जैसी ही हो गई है।

वह बताते हैं कि आज से पचास साल पहले हमारे पूर्वजों ने स्कूल के लिए जमीन दी थी, लेकिन वे स्कूल नहीं रहे। उनकी जगह मंदिर बन गए। पहाड़ों में स्कूल बंद हो रहे हैं लेकिन मंदिर बन रहे हैं।लोक देवताओं के बारे में डॉ कुकसाल बताते हैं कि पहले के समय में मंदिर तो गांव के बाहर ऊंचाई पर हुआ करते थे। क्योंकि लोक देवता का विचार ही यह था कि वे बंद स्थल पर नहीं बल्कि खुले में रहने वाले विचरण करने वाले होते थे। बाद में उनके मंदिर बनने लग गए।

विस्थापन के साथ हुआ पलायन

लोक देवताओं के पलायन को लेकर डॉ. कुकसाल कहते हैं कि ऐसा उन जगहों पर हुआ, जहां लोगों ने एक साथ पलायन किया। जैसे टिहरी में जो विस्थापित लोग थे, वे एक साथ योजनाबद्ध तरीके से गए, तो वे अपने देवी-देवताओं को साथ ले गए। पिथौरागढ़ में भी एक साथ विस्थापित हुए लोगों ने अपने लोक देवियों-देवताओं के मंदिर अपनी रिहायश के साथ बनाए। जहां लोगों की आवाजाही बिलकुल बंद हो गई, उन जगहों से लोकदेवताओं का पलायन हुआ।

लोक देवता दरअसल लोक संस्कृति के भी प्रतीक हैं। अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए भी लोग अपने देवताओं को साथ ले गए। डॉ कुकसाल के मुताबिक इसके साथ ही भय भी एक वजह बनी, कि लोगों ने अपने लोक देवताओं को नहीं छोड़ा। नए मंदिर बनाने के पीछे भी लोक देवताओं से भय का ख्याल था, कि कहीं उनके देवता नाराज़ न हो जाएं। डॉ कुकसाल कहते हैं कि ईश्वर के प्रति उस तरह का भय नहीं होता, जैसा लोक देवता के लिए होता है। उनकी पुजाई के समय पहला वाक्य ही यही कहा जाता है कि हमारे काम को पूरा कर देना, मैं तुम्हारी पूजा करूंगी।

कौन हैं लोक देवता

लोकदेवता जो भी हुए, वे अपने ही परिवार, जाति, क्षेत्र से हुए। वे कोई बाहर के व्यक्ति नहीं हैं। न ही वे अनजान व्यक्ति रहे होंगे। डॉ अरुण कुकसाल कहते हैं कि लोक देवता सामान्य परिवारों से निकले हुए आसाधरण व्यक्तित्व के स्वामी रहे। वे अच्छे भी थे और बुरे भी थे। ऐसा नहीं था कि सिर्फ अच्छे ही व्यक्ति को लोकदेवता माना गया। बुरे व्यक्तियों को भी लोक देवता माना गया। ये विचार रहा कि कहीं उनके कोप का शिकार न होना पड़े, तो उन्हें देवता बना दिया।

डॉ अरुण कुकसाल के मुताबिक मूल तौर पर लोक देवता को घरभूत देवता माना जाता है। जो अतृप्त रहा, वही लोकदेवता बना। उनकी कहानियों में यही बातें सामने आती हैं। उनसे बचाव के लिए उनके साथ बहन-भाई का रिश्ता माना गया।लोकदेवता के पलायन के पीछे भी इसी भय ने काम किया। उनके परिवार या समुदाय में ऐसा महसूस हुआ होगा कि कहीं देवता नाराज़ न हो रहे हों। इसके साथ ही वे स्थानीय लोगों की पहचान के भी प्रतीक हैं। इसलिए लोगों ने पुराने मंदिरों से जोत लेकर नई जगह स्थापित कर दी।

पहाड़ में लोग घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे। वे एक जगह नहीं रहते थे। जिस जगह वे जाते थे अपने देवता को भी साथ ले जाते थे। उनकी जोत को, उनके प्रतीक के रूप में ले जाते थे। ऐसा सौ साल पहले भी हुआ करता था। लोक देवताओं पर किताब लिख चुके डॉ कुकसाल कहते हैं उनके देवता भी घुमक्कड़ प्रवृत्ति के देवता हैं। बल्कि कई जगह तो ऐसा भी हुआ कि लड़की की शादी हुई, तो उसकी कुलदेवी भी उसके साथ चली जाती है।

इसके साथ ही लोकदेवता का दर्शन खेती और पशुपालन यानी लोगों की आर्थिकी से भी जुड़ा रहा। इन देवताओं को स्थापित करने के पीछे मकसद था। अपनी आजीविका को सुरक्षित करना। इसीलिए पहाडों में ज्यादातर लोक देवताओं के प्रतीक पशुओं के रूप में हैं। पशुपालन में भी लोक एक जगह नहीं ठहरते थे, अपने मवेशियों के साथ जगह बदलते रहते थे। और अपने देवताओं को साथ ले जाते थे।


ऐसा उन जगहों पर हुआ, जहां लोगों ने एक साथ पलायन किया। जैसे टिहरी में जो विस्थापित लोग थे, वे एक साथ योजनाबद्ध तरीके से गए। वे अपने देवी-देवताओं को साथ ले गए। पिथौरागढ़ में भी एक साथ विस्थापित हुए लोगों ने अपने लोक देवियों-देवताओं के मंदिर अपनी बसावट के साथ बनाए। जहां लोगों की आवाजाही बिलकुल बंद हो गई, उन जगहों से लोकदेवताओं का पलायन हुआ।

– डॉ. अरुण कुकसाल,वैज्ञानिक और साहित्यकार

पहाड़ों में दो सौ से अधिक लोक देवियां और देवता हैं। इनमें नंदा देवी, राज राजेश्वरी, झाली-बाली देवी, ज्वाल्पा, सुरकंडा, भद्रकाली, बाराही आदि हैं। इसी तरह गोलू देवता, ऐड़ी देवता, भैरव, नृसिंह देवताओं के कई मंदिर हैं। लोक देवताओं पर बारीकी से अध्ययन करने वाले डॉ कुकसाल के मुताबिक लोग मानते हैं कि उनके देवता रात्रि में अपने क्षेत्र का भ्रमण करते हैं और उसे सभी तरह की दैहिक, दैविक और भौतिक आपदाओं से मुक्त करते हैं। उन्हें भयंकर आकृति वाले वन देवता के रूप में माना जाता है। उनकी पहचान एक योद्धा के रूप में भी है।
पहाड़ों की रग-रग से परीचित सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला का मानना है कि लोगों ने अपने गांवों से तो पलायन किया है, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए लोक देवताओं को तंदरुस्त कर दिया है। वे कहती हैं कि बीते दिनों कुमाऊं की यात्रा के दौरान उन्होंने पाया कि गांवों में घर-घर पर ताले टंग है लेकिन मंदिरों पर ताज़ा गेरुआ रंग लगा हुआ है। गांव में रह जाने वाले इक्का-दुक्का परिवार इन मंदिरों पर दिया-बत्ती करते हैं। यही नहीं पलायन की मार से सबसे अधिक प्रभावित पौड़ी में तो छोटे-छोटे मंदिरों की समितियां हैं, प्रवासियों के भेजे गये पैसों से जिनकी अच्छी-खासी कमाई होती है।

दरअसल पहले लोग साल में एक बार लोक देवता को पूजने के लिए अपने गांव आते थे। लेकिन एक के बाद दूसरी पीढ़ी शहर में पैदा हुई, पली-बढ़ी, तो ये प्रवृत्ति भी खत्म होने लगी। इसी वजह से गांवों के इक्का-दुक्का परिवार भी पलायन कर गए। जब गांव में कोई नहीं रहा तो, लोक देवता को भी पलायन कर अन्यत्र विस्थापित होना पड़ा। पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के 700 से अधिक गांव पूरी तरह गैर-आबाद हो गए हैं। वे लोग अपने देवताओं को भी साथ ले गए होंगे।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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