देहरादून की हलचल भरी कचहरी में, एक छोटी-सी प्रेस वार्ता ने पूरे प्रदेश की व्यवस्था को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया। आरटीआई एक्टिविस्ट और वरिष्ठ अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने जब पेयजल निगम में आठ वर्षों से चल रहे 2660 करोड़ रुपये के भारी-भरकम घोटाले का खुलासा किया, तो यह साफ हो गया कि मामला सिर्फ पैसों का नहीं—इतनी बड़ी रकम का गायब हो जाना शासन की आत्मा पर चोट है। यह पहली बार नहीं है जब विकेश सिंह नेगी ने भ्रष्टाचार पर उंगली उठाई हो। सैन्यधाम से लेकर नगर निगम की अनियमितताओं और चाय बागान जमीन घोटाले तक, उन्होंने कई बार सरकार और विभागों को आइना दिखाया है। लेकिन इस बार जो सामने आया है, वह कहीं ज्यादा भयावह है, क्योंकि यह सीधे उस मूलभूत व्यवस्था से जुड़ा है, जिसका काम जनता को सबसे बुनियादी सुविधा “पानी” देना है।

विकेश सिंह नेगी को आरटीआई के माध्यम से मिली CAG रिपोर्टों से पता चला कि वर्ष 2016 से 2024-25 तक पेयजल निगम में 2660 करोड़ 27 लाख रुपये की अनियमितताएँ दर्ज हुईं। हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े वित्तीय प्रकरण के बावजूद निगम ने कई वर्षों तक ऑडिट ही नहीं करवाया। 2017-18 और 2018-19 में तो एक भी ऑडिट नहीं हुआ, ये सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को ढंकने की एक सुनियोजित रणनीति थी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कोरोना काल में, जब राज्य का हर विभाग स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा था, उसी दौरान पेयजल निगम में 829.90 करोड़ रुपये की गड़बड़ी दर्ज हुई। यह वह समय था जब लोगों को ऑक्सीजन और अस्पतालों की कमी से जूझना पड़ रहा था, और दूसरी ओर, विभाग के भीतर करोड़ों रुपये का खेल चल रहा था। यह आंकड़ा सिर्फ वित्तीय अपराध नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का काला दस्तावेज है। नेगी ने यह भी बताया कि कई ठेकेदारों ने जीएसटी तक जमा नहीं किया। कई जगह बिना बैंक गारंटी के भुगतान हो गया, और कई निर्माणों में रॉयल्टी तक नहीं ली गई। घटिया निर्माण तो मानो सामान्य बात हो गई थी। यह पूरी प्रणाली अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत का ऐसा जाल दिखाती है, जिसमें जनता का हर रुपया फंसता गया।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी के बावजूद सीएजी रिपोर्ट को अब तक विधानसभा में पेश तक नहीं किया गया। इसका मतलब साफ है- मामले को जानबूझकर दबाया गया। जब तक रिपोर्ट सदन में नहीं आएगी, दोषियों पर कार्रवाई कैसे होगी? विकेश सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर इस मामले की हाई-लेवल जांच SIT, विजिलेंस या CBI से कराने की मांग की है। उनकी दलील सरल है: जब घोटाला 2600 करोड़ से ऊपर का हो, तब विभागीय जांच का कोई मतलब नहीं।


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