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नंदाकिनी की पुकार: प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट की नज़र से पहाड़ों का सच, संकट और समाधान

“पहाड़ चुप रहते हैं… लेकिन जब टूटते हैं, तब हर पत्थर एक चेतावनी बन जाता है।” यह बात प्रोफ़ेसर **महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट**, विभागाध्यक्ष – भूविज्ञान, HNBGU, ने इस अक्टूबर नंदाकिनी घाटी में कदम रखते ही महसूस की। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल के साथ जब वे आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे थे, तो उनके भीतर एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था-
क्या हमने हिमालय को समझने की क्षमता खो दी है?

नंदाकिनी घाटी सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं; यह पहाड़ों की आत्मा है, नंदाकिनी नदी, त्रिशूल, नंदा घूंघटी और नंदा राजजात की सदियों पुरानी आस्था। प्रो. बिष्ट कई दशक से इस घाटी को पढ़ते आए हैं। वे कहते हैं—
“यह घाटी प्रकृति की खुली किताब है, बस हमने इसे पढ़ना बंद कर दिया।”

घाटी का बदला हुआ चेहरा- संकट की असली जड़

1987 में NRDMS मिशन के दौरान जब वे पहली बार यहाँ आए थे, तब गाँव ऊँचे, सुरक्षित ढालों पर बसे थे। घर परंपरा, समझ और प्रकृति के संतुलन के अनुसार थे।लेकिन आज नदी तल के किनारे नई बसावट, अनियोजित सड़कें, नालों पर निर्माण, और Run-of-River परियोजनाओं की भरमार।
डॉ. असवाल और प्रो. बिष्ट दोनों ने पाया कि कई घर ऐसी जगहों पर बने हैं जहाँ विज्ञान “खतरा” कहता है लेकिन इंसान “चल जाएगा” बोलकर बना देता है।

 जाखनी गाँव- जहाँ घर रॉक ग्लेशियर के ठीक नीचे!
प्रो. बिष्ट बताते हैं, “रॉक ग्लेशियर के बहाव के ताज़ा निशान वहीं मौजूद हैं। 10–15 साल पुराने संकेत साफ़ दिखाते हैं कि यह क्षेत्र स्थिर नहीं। फिर भी उसके ठीक नीचे घर बनाना, यह विज्ञान के खिलाफ जाना नहीं, बल्कि खतरे को न्योता देना है।” नीचे की तरफ एक तेज़ ढाल वाला Alluvial Fan, जहाँ बहाव किसी भी समय दिशा बदल सकता है, और वही स्थिति उत्तरकाशी के धाराली में भारी तबाही का कारण बनी थी।

चुफ़लां गाढ़- पहाड़ की सबसे तेज़ चीख
2025 की तबाही का सबसे बड़ा प्रहार इसी क्षेत्र में हुआ। प्रो. बिष्ट याद करते हैं कि 2018 में भी यही दृश्य था, वही बहाव, वही विनाश, वही पैटर्न। फर्क बस इतना कि इस बार एक ऐसी जान चली गई, जो पिछली आपदा में दर्जनों लोगों की जान बचा चुका था। वे कहते हैं-
हम हर बार इसे बादल फटना बोलकर खत्म कर देते हैं, लेकिन सच यह है कि असली वजह अनियंत्रित बसावट और प्रशासन की अनदेखी है।

समाधान — जो अब सिर्फ सुझाव नहीं, मजबूरी हैं

प्रो. बिष्ट के अनुसार हिमालय को बचाने के लिए 6 अनिवार्य कदम:

ढाल, भूगर्भ और भू-भौतिकीय सर्वे के बाद ही बसावट तय हो।
नदियों के अधिकतम जलस्तर की सीमा रेखा तय की जाए।
Slope Mapping कर ढाल की धारण क्षमता समझी जाए।
पहाड़ों के लिए अलग भवन निर्माण कोड अनिवार्य किया जाए।
वैज्ञानिक रिपोर्टें फाइलों में दब न जाएँ- मैदान में लागू हों।
काम ईमानदारी और पारदर्शिता से हों- यही एकमात्र असली समाधान है।

नंदाकिनी घाटी रो नहीं रही… वह हमें बुला रही है, यह कहने के लिए कि अब भी समय है, पहाड़ों को समझो, वरना एक दिन ये चुप्पी सब कुछ बहा ले जाएगी।”

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

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