उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में वजूद में आने के ठीक बारह साल बाद अब कहा जा सकता है कि स्थाई राजधानी के मामले में कुछ प्रगति हुई है। राज्य सरकार द्वारा स्थाई राजधानी के रूप में पर्वतीय जनमानस की पहली पसंद चमोली जिले
उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में वजूद में आने के ठीक बारह साल बाद अब कहा जा सकता है कि स्थाई राजधानी के मामले में कुछ प्रगति हुई है। राज्य सरकार द्वारा स्थाई राजधानी के रूप में पर्वतीय जनमानस की पहली पसंद चमोली जिले के गैरसैंण को चुना जाना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की अध्यक्षता में 3 नवम्बर को हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। विधानसभा भवन निर्माण के लिए दो साल की समय सीमा तय की गई है। इसके बाद हर साल गैरसैंण में विधानसभा का एक सत्र आयोजित करने का एलान भी किया गया है, लेकिन गैरसैंण में स्थायी या ग्रीष्
मकालीन राजधानी के मुद्दे पर सरकार ने अभी स्पष्ट नहीं किया है।
विधानसभा भवन का शिलान्यास अगले साल मकर संक्रांति पर 14 जनवरी को करने की योजना है। बहुगुणा सरकार के इस फैसले को राज्य के आंदोलनकारियों की पर्वतीय क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की मांग पूरी करने की दिशा में बढ़ाए पहले कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह बात अलग है कि इस आंशिक सफलता को हासिल करने में भी बारह साल का लंबा समय लग गया।
लंबे संघर्ष के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, लेकिन पहाड़ के पिछड़ेपन में कोई कमी नहीं आई। विकास मैदानी जिलों तक ही सिमट कर रह गया और दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्र आज भी वहीं हैं जहां बारह साल पहले थे। यही वजह रही कि राज्य में, खासकर पर्वतीय जनमानस में पहाड़ी क्षेत्र में स्थाई राजधानी बनने की मांग उठती रही।
इसके अलावा राज्य सरकार नंदादेवी राजजात यात्रा को अब देश के पर्यटन मानचित्र पर उभारने की योजना भी बना रही है। कुंभ मेले की तर्ज पर इसके लिए एक पीसीएस अधिकारी बतौर मेला अधिकारी के रूप में तैनात किया जाएगा।
गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने की बात 1994 में गठित रमाशंकर कौशिक समिति ने भी कही थी। हालांकि स्थाई राजधानी के मसले पर दीक्षित आयोग भी गठित हुआ, मगर उसने सालों की कवायद के बाद सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में स्थाई राजधानी के विकल्प के रूप में गैरसैंण को लगभग दरकिनार ही कर दिया। अब राज्य सरकार की पहल से एक बार फिर पर्वतीय राज्य की अवधारणा साकार होने की आस बंधी है।







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