उत्तराखंड कला जगत के लिए दुखद खबर आई है। उत्तराखंड के जानेमाने लोकगायक हीरा सिंह राणा का निधन हो गया है। उत्तराखंड की कला संस्कृति को निखारने और अपनी गायकी से जन-जन तक पहुंचाने में हीरा सिंह का असीम योगदान था। आज सुबह जैसे ही यह खबर मिली पूरे उत्तराखंड में शोक व्याप्त हो गया। लोगों ने सोशल मीडिया पर अपने चहेते कलाकार को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है।
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दो साल पहले उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई थी। इसके बाद उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि जब तक शरीर में प्राण है तब तक गाता रहूंगा। कहा जाता है कि संगीत से भेदभाव, राजनीति में उठापटक और वीरान होते पहाड़ के दर्द को उकेरने वाले लोकगायक हीरा सिंह राणा पहाड़ों की वह लोक आवाज़ रहे, जिसने पहाड़ को नई पहचान ही नहीं दिलाई बल्कि विश्व सांस्कृतिक मंच पर स्थापित भी किया।
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हीरा सिंह राणा का जन्म 16 सितंबर 1942 को मानिला डंढ़ोली, जिला अल्मोड़ा में हुआ था। उनकी माता नारंगी देवी, पिता का नाम मोहन सिंह था। राणा की प्राथमिक शिक्षा मानिला में हुई। उन्होंने दिल्ली में सेल्समैन की नौकरी की लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा और इस नौकरी को छोड़कर वह संगीत की स्कॉलरशिप लेकर कोलकाता चले गए और संगीत के संसार में पहुंच गए। उन्होंने खुद बताया था कि 15 साल की उम्र से ही वह उत्तराखंड की संस्कृति से जुड़े गीत गाने लगे थे।
इसके बाद हीरा सिंह राणा ने उत्तराखंड के कलाकारों का दल नवयुवक केंद्र ताड़ीखेत 1974, हिमांगन कला संगम दिल्ली 1992, पहले ज्योली बुरुंश (1971) , मानिला डांडी 1985, मनख्यु पड़यौव में 1987, के साथ उत्तराखंड के लोक संगीत के लिए काम किया। इस बीच राणा जी ने कुमाउंनी लोक गीतों के 6- कैसेट ‘रंगीली बिंदी, रंगदार मुखड़ी’, सौमनो की चोरा, ढाई विसी बरस हाई कमाला’, ‘आहा रे ज़माना’ भी निकाले।
आज के दौर में हीरा सिंह राणा के गीत खूब गाए बजाए जाते हैं। मशहूर कवि, गीतकार हीरा सिंह राणा को ‘गढ़वाली-कुमाऊंनी-जौनसारी’ भाषा अकादमी दिल्ली का पहला उपाध्यक्ष भी बनाया गया था।


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