अलग राज्य बनते वक्त उत्तराखंड अगर पहली क्लास का एक बच्चा होता तो आज उत्तराखंड बाहरवीं बोर्ड का इम्तिहान दे रहा होता। 9 नवम्बर को उसके रिपोर्ट कार्ड का हम सब बेसब्री से इंतज़ार कर रहे होते। और जैसा कि हर अभिभावक को उम्मीद होती
अलग राज्य बनते वक्त उत्तराखंड अगर पहली क्लास का एक बच्चा होता तो आज उत्तराखंड बाहरवीं बोर्ड का इम्तिहान दे रहा होता। 9 नवम्बर को उसके रिपोर्ट कार्ड का हम सब बेसब्री से इंतज़ार कर रहे होते। और जैसा कि हर अभिभावक को उम्मीद होती है कि अपने नौनिहालों से कि वो ककहरे से शुरू कर बारह साल के इस बड़े दौर में ज़िंदगी का एक बड़ा मुकाम पाने की ओर बढ़ चलेगा हमें भी बड़ी उम्मीद होती। पर अफ़सोस हमें नतीजा पहले ही दिख रहा है। उत्तराखंड बमुश्किल सेकेंड डिविज़न भी पास हो पाएगा, हमें उम्मीद कम है। दरअसल इन बीते बारह सालों में राज्य से जुड़े तमाम सपनों पर एक-एक कर पानी फिरता चला गया। और इन उम्मीदों को तोड़ने का ठीकरा उन तमाम लोगों के सिर फूटता है जिनके सिर जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ जीत का सेहरा बांधा।
इस नाकामी के लिए कोई एक दल जिम्मेदार हो ऐसा भी नहीं है। राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी इसमें बराबर की हिस्सेदार हैं। बीते बारह सालों में कमोवेश दोनों ने ही राज्य पर आधा-आधा राज किया और पूरा-पूरा बंटाधार। राज्य जब बना तो जनता को लगा कि चलो देर से ही सही अब तो उसके दिन फिरंेगे। लेकिन नेताओं के भाग्य से छींका उनके सिर फूटा और सत्ता की बंदरबांट पहले ही दिन से शुरू हो गई।
पहले दौर की सरकार कामचलाऊ और बेहद थकाऊ साबित हुई और दूसरी सरकार ने देश के सबसे वरिष्ठ नेता के उदासीन शासन में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। तीसरे दौर में जब अड़तीस साल फौज के सख़्त अनुशासन में कसे एक अपेक्षाकृत नवोदित नेता ने सियासत की पुरानी रवायतें तोड़कर राज्य को पटरी पर लाने की कुछ कोशिशें कीं तो अवसरवादी नेताओं, भ्रष्ट अफ़सरों, शराब कारोबारियों और भू माफ़ियाओं की चैकड़ी ने मिलकर उसे ही गिरा दिया और फिर जिसके मुंह जो टुकड़ा लगा वो उसे लेकर चलता बना।
अब एक और सरकार है। सरकार क्या है कांग्रेस की अंदरूनी सियासी खींचतान के बीच बना एक संतुलन है जो जब टूटेगा तो दोनों ओर दांत राज्य की जनता के ही टूटेंगे। राज्य को लेकर छाए इस निराशावाद के बीच सत्ता सुख भोगने वाले नेताओं से बात करो तो वो कुछ आंकड़ों से रोशनी दिखाने की कोशिश करते हैं। लेकिन वो या तो समझते नहीं या समझकर भी अनजान बने रहते हैं कि अंकगणित की इस चाशनी में राज्य की जनता को अपनी परछाई धुंधली ही दिखती है।
इन नेताओं की बात अगर कुछ हद तक मान भी ली जाए कि राज्य के कुछ कोनों में विकास के दिए टिमटिमा रहे हैं तो वो दिए उस पहाड़ पर नहीं हैं जिसके विकास की अवधारणा को लेकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई और जीती गई। ये बरकत उन इलाकों में आई है जहां का एक बड़ा वर्ग पहले तो बड़े बेमन से इस राज्य का हिस्सा बना और फिर राज्य गठन के कई साल बाद तक भी वापस उत्तर प्रदेश में लौटने को तड़पता रहा। आज तथाकथित विकास का मख्खन उसके ही हिस्से आया है। और पहाड़ के हिस्से छांछ भी नहीं। भ्रष्ट नेताओं, अफ़सरों और भू माफ़ियाओं की ही करनी है कि बीते बारह साल में उत्तराखंड को ऐशगाह के एक प्लाॅट से ज़्यादा नहीं समझा गया जिसके टुकड़े सबने आपस में बांट लिए। ज़मीन की अंधाधुंध ख़रीद फ़रोख़्त ने कई भोले भाले लोगों को उनकी ही ज़मीन पर बेगाना बना दिया।
इस दौर में उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों की लूट घटने के बजाय कहीं ज़्यादा बढ़ गई। विकास का नया माॅडल बताकर बड़े-बड़े बांध बनाने आई कंपनियों ने स्थानीय लोगों को भी लूटा, जल, जंगल और ज़मीन को भी। आज हालत ये है कि ऊर्जा प्रदेश के तौर पर पेश किए गए राज्य में खु़द के लिए ही ऊर्जा पूरी नहीं पड़ रही है। उलटा कई अधूरी परियोजनाओं ने पर्यावरण का और सत्यानाश कर दिया है। हज़ारों लोग अपने ही घरों के आसपास बेघर हैं।
राज्य की व्यवस्था में भ्रष्टाचार का दीमक इस कदर गहरा बैठ गया है कि कई बार लगता है कि इस मर्ज़ का कोई इलाज नहीं। पहाड़ से पलायन जारी है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं। पहाड़ी घरों में ताले पड़े हैं। कभी लहलहाते सीढ़ीदार खेतों में भी चीड़ के जंगल उग आए हैं। जंगलों में बांज, बुरांस और देवदार के पेड़ बस इतने ही बचे हैं जितने सरकारी व्यवस्था में ईमानदार अफ़सर और कर्मचारी। पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखते जा रहे हैं। घाटियों का गला सूख रहा है। पहाड़ों की सांस उखड़ रही है। बाहर साल में इतना कुछ खोने के बाद रोने को ऐसा बहुत कुछ है। लेकिन उम्मीद फिर भी बाकी है। क्यों ना इस मुट्ठी भर उम्मीद को हक़ीक़त के आसमान में बदल दिया जाए।
सुशील बहुगुणा एनडीटीवी के वरिष्ठ समाचार संपादक हैं।







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