ड्रैगन को चुनौती देते हिमवीर। भारत- चीन सरहद पर शून्य से नीचे के तापमान में बर्फीले तूफान के बीच तैनात हैं हिमवीर। कौन हैं ये हिमवीर ? ये हैं आईटीबीपी के बहादुर जवान जो दिन रात चीन से लगने वाली 3500 किलोमीटर लम्बी सरहद पर
ड्रैगन को चुनौती देते हिमवीर। भारत- चीन सरहद पर शून्य से नीचे के तापमान में बर्फीले तूफान के बीच तैनात हैं हिमवीर। कौन हैं ये हिमवीर ? ये हैं आईटीबीपी के बहादुर जवान जो दिन रात चीन से लगने वाली 3500 किलोमीटर लम्बी सरहद पर जानलेवा हालात में सरहदों की निगरानी कर रहे हैं। हाल ही में मुझे उत्तराखंड में चीन से लगने वाली सरहद पर बर्फ से ढकी एक ऐसी पोस्ट पर जाने का मौका मिला जहाँ पर आईटीबीपी के जवान शून्य से नीचे के हालात में तैनात हैं।
भले ही सरकार लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक लगने वाली सरहद पर चीनी सेना की घुसपैठ को तूल नहीं देना चाहती हो लेकिन हकीकत में सरहद पर ड्रैगन के हौसले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में कोई है जो देश को ये भरोसा दिल रहा है की चीन अब 1962 नहीं दोहरा सकता। उत्तराखंड में चीनी सेना की घुसपैठ को लेकर राज्य सरकार कई बार केंद्र सरकार को आगाह कर चुकी है। आईटीबीपी के महानिदेशक अजय चड्डा ने बताया की हिमवीर सावधानी हटी दुर्घटना घटी की तर्ज पर उत्तराखंड में चीन से लगने वाली सरहद पर निगरानी कर रहे हैं।
हमने अपना सफर उत्तरकाशी में आईटीबीपी के बेस कैम्प मातली से शुरू किया। इस बेस कैम्प में आईटीबीपी की 12वीं बटालियन तैनात है जो उत्तरकाशी से लगने वाली भारत-चीन सीमा की निगरानी करती है। हम आईटीबीपी के जवानों के साथ उनकी गाड़ियों में सवार होकर आगे सरहद पर एक निगरानी चैकी की तरफ आगे बढ़ रहे थे। हमारा मिशन उत्तरकाशी में चीन से लगने वाली एक निगरानी चैकी तक पहुंचना तक पहुंचना है। हमारे साथ इस पेट्रोलिंग टीम में आईटीबीपी के सभी जवान हथियार और दूसरे खास साजोसामान से लैस थे। ये सड़क भागीरथी नदी के साथ गंगोत्री की तरफ जाती है। आईटीबीपी की 3 गाड़ियों के साथ हम आगे बढ़ रहे थे। मुश्किलों का सिलसिला शुरू होने लगा। आगे भारी बर्फवारी के कारण सड़क कई जगह टूट गयी थी। बर्फवारी शुरू हो चुकी थी। आईटीबीपी की गाड़ियों की रफ्तार धीमी होने लगी। सारा इलाका बर्फ से ढका नजर आ रहा था। हमें आभास होने लगा की आईटीबीपी के जवान किन मुश्किल हालात में यहाँ पर तैनात हैं। बढ़ती बर्फवारी ने अचानक हमारी गाड़ियों की रफ्तार रोक दी। आईटीबीपी के जवानों ने नीचे उतर कर रास्ता साफ किया।
करीब पांच घंटे का सफर सड़क से तय करने के बाद बर्फ ने हमारा रास्ता पूरी तरह रोक दिया। अब आगे का रास्ता हमें पैदल ही तय करना था। बर्फवारी तेज हो गयी। भारी बर्फवारी के बीच आईटीबीपी की पेट्रोलिंग टीम के साथ हम आगे बढ़ रहे थे। सारा इलाका बर्फ से सराबोर नजर आ रहा था। आखिरकार करीब 2 घंटे का सफर पैदल तय करने के बाद हम सुखी टॉप के पास आईटीबीपी की एक निगरानी चैकी पर पहुँचने में कामयाब रहे। हमारे साथ चल रहे पेट्रोलिंग टीम के एक ऑपरेटर ने वायरलेस सिस्टम से हमारे आने की सूचना चैकी पर मौजूद अधिकारी को दी। यहाँ पहुंचकर पेट्रोलिंग टीम के लीडर अस्सिटेंट कमान्डेंट विपुल बत्त्श ने टीम को भारत-चीन सरहद पर आगे पेट्रोलिंग करने की योजना के बारे में जानकारी दी। अब हमारी हिम्मत की असल परीक्षा शुरू होने वाली थी। हमें बर्फ से ढकी ऊँची पहाड़ी पर चढ़ना था। आईटीबीपी की इस पेट्रोलिंग टीम ने आगे बढ़ना शुरू किया। रस्सी के सहारे सभी जवान सावधानी के साथ आगे बढ़ रहे थे। हमनें भी आगे बढ़ना शुरू किया। हम कई बार नीचे गिरने से बाल-बाल बचे तो कई बार कोई जवान गिरने से बच रहा था। ऐसी पेट्रोलिंग में सबसे बड़ा खतरा बर्फीले तूफान का होता है। अभी दो दिन पहले ही मौसम विभाग का एक कर्मचारी बर्फीले तूफान का शिकार हो चुका था।
दूरबीन और नक्शे के सहारे टीम ने सरहद पर चीनी सेना की हरकतों की जानकारी जुटाई। अचानक बर्फवारी के बीच एक धमाके के साथ ही धुंए का गुबार फैल गया। आईटीबीपी के जवानों ने मोर्चा संभाल लिया। ये सरहद पर दुशमन चैकानें की ड्रिल है। शून्य से निचे के तापमान और भारी बर्फवारी के बीच हर जवान की नजर सरहद के पार टिकी थी। हर जवान की अंगुली अपने हथियार के ट्रिगर पर है। आखिरकार दो घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद एसआरपी यानी शॉर्ट रेंज पेट्रोलिंग का काम पूरा हुआ। टीम लीडर ने वायरलेस सिस्टम से बेस कैम्प में मौजूद अपने अधिकारियों को भारत-चीन सरहद के मौजूदा हालात की जानकारी दी। ये नजारा देखकर हमें भरोसा हो गया कि उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा पर चीनी सेना की किसी भी गुस्ताखी का जवाब देने के लिए आईटीबीपी के ये हिमवीर हर समय तैयार हैं। भारत माता की जय के नारों के साथ पूरी भारत-चीन सीमा गूंज गयी।
इस निगरानी चैकी से आईटीबीपी के जवानों से हम विदा लेकर हम लौट रहे थे लेकिन अभी हमारा सामना एक बड़ी मुसीबत से होने वाला था। कई दिनों से हो रही बर्फवारी से बेस कैम्प तक जाने वाली सड़क पूरी तरह बंद हो चुकी थी। आईटीबीपी की जिन गाड़ियों पर हम आये थे वो बर्फ में फंस चुकी थी। रात के 9 बज रहे थे और हम अभी आईटीबीपी की इस अग्रिम चैकी पर ही फंसे हुए थे। बर्फवारी लगातार जारी थी। कई बार की कोशिशों के बाद आईटीबीपी की गाड़ियों बर्फ से नहीं निकल पा रही थी। आईटीबीपी के हिमवीरों की कई घंटों की मशक्कत के बाद रात 12 बजे हम वहां से निकलने में कामयाब हो पाए। रात 2 बजे हम आईटीबीपी के बेस कैम्प मातली वापस पहुंचे। सुबह होने पर हमनें आईटीबीपी के जवानों के साथ सर्वधर्म स्थल पर जाकर भगवान का शुक्रिया अदा किया। भारत-चीन सरहद पर कठिन हालातों में तैनात आईटीबीपी के ये हिमवीर वक्त मिलने पर भगवान की भक्ति में अपना समय लगाते हैं जिससे इनका जोश और बढ़ जाता है।
सरहद पर ट्रेनिंग का सिलसिला लगातार चलता रहता है क्योंकि ड्रैगन पर भरोसा करना आसान नहीं है। इसीलिए इस पहाड़ी इलाके में जंग के लिए हथियार भी खास चाहिए। आईटीबीपी के ये जवान मोटार्र पर महारत हासिल कर रहे हैं। ये पहाड़ी इलाकों में दुश्मन पर वार करने के लिए सबसे कारगर हथियार है। धुंए के गुबार के बीच दुश्मन पर मोटार्र से हमला। सरहद पर हालात जैसे भी हों जवानों की तैयारियों में कहीं कोई कमी नहीं है। आईटीबीपी के ये हिमवीर सरहद पार से आने वाली हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं। आखिर में भारत-चीन सरहद के इस बेस कैम्प पर तैनात आईटीबीपी के हिमवीरों ने तिरंगा लहराकर बताया की मुश्किल हालात और सरहद पर बढती हर चुनौती से निपटने में वे अपनी जान की बाजी लगा देंगे।
– मनजीत नेगी, भारत-चीन सीमा मातली उत्तरकाशी







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