कहा जाता है कि अगर बच्चों का बेस मजबूत हो तो उनकी सफलता की गारंटी सुनिश्चित हो जाती है। अपने देश में माहौल का असर हो या शिक्षा के तरीके में खामी कहें, प्राइमरी स्कूल से निकलने वाले बच्चे पूरी तरह दक्ष नहीं होते हैं और आगे चलकर उन्हें पढ़ाई में नुकसान होता है। नींव की यह कमी उनके करियर पर भी असर डालती है। सरकार के स्तर से प्राइमरी एजुकेशन को सुधारने के निरंतर प्रयास हो रहे हैं। हाल ही में शिक्षा के ढांचे में व्यापक बदलाव करने के लिए नई शिक्षा नीति भी लागू की गई है। पर क्या कोई एक व्यक्ति अपने स्तर पर इसकी पहल नहीं कर सकता है?
आपको शायद इसमें चुनौतियां, परेशानियां या असंभव जैसी चीजें समझ में आएं पर आज हम जिस शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, वह अपने आप में प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। नाम है प्रदीप जोशी। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के पोखड़ा के प्रदीप जोशी सरकारी इंटरमीडिएट कॉलेज में बच्चों को पढ़ाते थे। 25 साल बच्चों को पढ़ाते हुए हो गया था लेकिन मन में टीस थी कि बच्चों को जितना बेहतर करना चाहिए, शायत उतना अच्छा नहीं कर पा रहे हैं। इस स्टेज पर आकर बच्चे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी प्राइमरी शिक्षा में अच्छी मेहनत नहीं हुई है। ज्यादातर बच्चे पढ़ाई पूरी करने के बाद प्राइवेट कंपनियों में ही नौकरियां पा रहे थे। जब उनके छात्र बाद में मिलते तो प्रदीप जोशी को यह बात खलती। वह चाहते थे कि बच्चे बड़े पदों तक जाएं और समाज में बदलाव के लिए योगदान करें।
हिल-मेल से बातचीत में प्रदीप जोशी ने बताया कि पांचवीं तक अच्छी पढ़ाई न होने के कारण छठी कक्षा में दिक्कत होती थी, जो आगे की कक्षाओं में भी बनी रहती थी क्योंकि उनका कॉन्सेप्ट क्लियर नहीं होता था। बाद में बोझ और परेशानी बढ़ती ही जाती थी।
आखिर में उन्होंने अपने दम पर एक बड़ा संकल्प लिया। सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर उन्होंने एक विद्यालय की नींव रखी। इंटरमीडिएट के बच्चों को पढ़ाने वाले प्रदीप जोशी अब छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाने लगे। इस काम में उन्होंने अपनी पूरी पूंजी लगा दी और परिवार के सदस्यों ने उनकी कुछ मदद की। सरकार या किसी अन्य से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। आज पोखड़ा में उनके द्वारा शुरू किए गए स्कूल को 10 साल हो चुके हैं।
वह कहते हैं कि छोटे बच्चों का मन-मस्तिष्क बिल्कुल खाली रहता है, प्राइमरी स्तर पर उन्हें अच्छे से पढ़ाया जाए तो वे अच्छे पदों तक पहुंच सकते हैं। इसी मकसद से उन्होंने बेहतरीन शिक्षा देने की रणनीति बनाई। शुरुआत से बच्चों की पढ़ाई का उन अभियान चल पड़ा। समस्या स्कूल फीस की थी क्योंकि गांव में बच्चों के अभिभावकों की स्थिति ऐसी नहीं कि वे ज्यादा फीस दे सकें।
ऐसे में उन्होंने हर महीने की पेंशन भी स्कूल में लगानी शुरू कर दी। बच्चों से मामूली फीस ही ली जाती है। अब यह स्कूल 8वीं कक्षा तक हो गया है और 80 से ज्यादा छात्र तालीम हासिल कर रहे हैं।
उनके स्कूल के बच्चे हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी अच्छी बोलते हैं। प्रधानाचार्य बताते हैं कि उन्होंने गांव की कुछ योग्य गृहणियों को शिक्षक बनाया। अब उनके स्कूल के बच्चे अब अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी एक रिटायर्ड शिक्षक बहन रुक्मिणी भदोला को राष्ट्रपति से भी सम्मान मिल चुका है। ऐसे में उनके पूरे परिवार में शिक्षा का माहौल है।
उन्होंने कहा कि हमारा स्कूल शुरू करने का एक मिशन है कि यहां से पढ़े बच्चे आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, एमबीए करें, आईएएस बनें और विभिन्न क्षेत्रों में अपना, परिवार और देश का नाम रोशन करें। ऐसे में स्कूल को सामाजिक उद्देश्य से शुरू किया गया। वह चाहते हैं कि गांव के बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए ज्यादा से ज्यादा ऐसे विद्यालय खुलें।
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Bahut he sundar
प्रदीप जी, विद्यालय स्थाप्ना के समय पूरा भरोसा हुआ, आप तलाईं पोखड़ा क्षेत्र में शिक्षा की एक ज्योतिपुंज स्थापित कर रहे हैं।
मेरी बधाई और शुभकामनाएं।