मुम्बई में 26 नवम्बर को हुए हमले के पांच साल पूरे हो गये हैं। इन बीते पांच सालों में हमारे देश की सुरक्षा कितनी दुरस्त हुई है ? हमने अपनी सुरक्षा के लिए क्या-क्या उपाय किये ? ऐसे कई प्रश्न हैं जो हमें ऐसे दिनों
मुम्बई में 26 नवम्बर को हुए हमले के पांच साल पूरे हो गये हैं। इन बीते पांच सालों में हमारे देश की सुरक्षा कितनी दुरस्त हुई है ? हमने अपनी सुरक्षा के लिए क्या-क्या उपाय किये ? ऐसे कई प्रश्न हैं जो हमें ऐसे दिनों में और याद आ जाते है जब हम उन लोगों को श्रंद्धाजली देते हैं जो इन हमलों में शहीद हो गये थे। देश में जब भी कोई आतंकी हमला होता है तब उस हमले की जोरदार निन्दा होती है तथा आगे ऐसे हमले दोबारा न हों उसके लिए ठोस कदम उठाने की बात कही जाती है। पिछले पांच सालों में कोई बड़ा आतंकी हमला तो नहीं हुआ है लेकिन सीमापार आतंकवाद अब भी चुनौती बना हुआ है। इसके लिए सरकार ने जो कदम उठाये हैं वह नाकाफी है। पिछले कई सालों से पाकिस्तान ही आतंकवादियों को पनाह, प्रशिक्षिण और संरक्षण देता रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान में किसी का भी शासन रहा हो वह हमेशा से भारत विरोधी नीति पर अमल करता आया है।
पाकिस्तान के नेता हमेशा से कहते आ रहे है कि वह अपने देश की धरती से आतंकवादियों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने देंगे, लेकिन उनके दावे हमेशा खोखले और बेमानी हो जाते हैं। पाकिस्तान की पोल एक बार फिर मुम्बई पर किए गये हमले ने खोल दी। इस हमले में 166 लोगों की मृत्यु तथा लगभग 300 लोग घायल हुए थे। इस हमले को अंजाम देने के लिए कराची से दस आतंकवादियों को समुद्र के रास्ते मुम्बई में भेजा गया था जिनमें से नौ आतंकवादी तो मारे गये थे और एक आतंकवादी अजमल कसाब को गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद कसाब के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई और उसे 21 नवम्बर 2012 को फांसी की सजा दी गई। कई जानकारों का कहना है कि मुम्बई के 26ध्11 के हमलों का संचालन कराची में बने ‘‘कंट्रोल रूम’’ से हो रहा था। जिसमें जमात-उद-दावा चीफ और आतंकी सरगना हाफिज़ सईद और पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी मौजूद थे। मुम्बई हमले में गिरफ्तार आतंकी कसाब ने भी अपनी गवाही में हाफिज सईद का नाम लिया था। इसके बाद भी हाफिज सईद को पाकिस्तान सरकार का पूरा संरक्षण प्राप्त है।
भारत और अमेरिका के दबाव के बावजूद मुंबई हमलों के लिए कथित रूप से जिम्मेदार लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ पाकिस्तान में अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। अमेरिका में कुछ ही समय पहले जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा की जड़ें अब काफी गहरी हो चुकी हैं। पाकिस्तानी विश्लेषक और लेखक आरिफ जमाल लम्बे समय से लश्कर पर काम कर रहे हैं और उनकी किताब ‘कॉल फॉर ट्रांसनेशनल जिहाद’ जनवरी में प्रकाशित हो रही है। उनका कहना है कि पिछले चार सालों में लश्कर काफी ताकतवर हो चुका है और उसकी जड़ें अब सिर्फ पाकिस्तान के पंजाब सूबे में ही नहीं बल्कि बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वाह सूबों तक फैल चुकी है। लश्कर-ए-तैयबा अब पाकिस्तान में एक समाजी सियासी तंजीम जमात उद दावा के नाम से सक्रिय है। लश्कर इतिहास में सबसे बड़ा आतंकी समूह है जिसके पांच लाख से अधिक हथियारबंद और प्रशिक्षित सदस्य हैं।
आरिफ जमाल कहते हैं, मुंबई हमलों के एक साल बाद तक तो उन पर सख्ती थी, लेकिन अब उन्हें खुली छूट मिली हुई है। लश्कर-ए-तैयबा के नेता हाफिज सईद पाकिस्तान में बेरोकटोक घूमते हैं और रैलियों में भारत और अमेरिका के खिलाफ भाषण देते हैं। मीडिया भी उन्हें बढ़ावा देता है। उनका कहना है, पाकिस्तानी टीवी पर हाफिज सईद एक बहुत बड़ा चेहरा है और टीवी प्रस्तोता उन्हें एक इस्लामी विद्वान, एक आलम-ए-दीन, एक मजहबी नेता की तरह पेश करते हैं न कि एक जिहादी के तौर पर। ऐसे में क्या कोई पाकिस्तानी हुकूमत चाहे भी तो लश्कर के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है ?
हालांकि पांच साल पहले मुंबई में हुए हमले के बाद लश्कर-ए-तैयबा ने कोई बहुत बड़ा हमला नहीं किया है। लेकिन अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कई पूर्व अधिकारी और विश्लेषकों का कहना है लश्कर-ए-तैयबा अब सिर्फ भारत के खिलाफ काम करने वाला संगठन नहीं रहा। उसके तार अल कायदा से जुड़ चुके हैं तथा अब अमेरिका में भी लश्कर को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। अगर भविष्य में फिर कोई हमला हुआ तो अमेरिका से लश्कर के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग बढ़ सकती है। पिछले सालों में लश्कर नेताओं के अमेरिका विरोधी सुर और तीखे हुए हैं, लेकिन अमरीका ने लश्कर पर कभी सीधा वार नहीं किया है। फिलहाल अमेरिका पाकिस्तान को और नाराज नहीं करना चाहता, लेकिन अफगानिस्तान से अमरीकी फौज की वापसी के बाद हालात बदल सकते हैं। इससे तो यही कयास लगाये जा सकते है कि अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ अभियान का नेतृत्व तो करना चाहता है, लेकिन वह उन आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं जो न केवल भारत अपितु विश्व शान्ति के लिए खतरा बने हुए हैं।
अब पाकिस्तान में नये सेनाध्यक्ष ने अपना पदभार ग्रहण कर लिया है। कई दिनों के विचार विमर्श के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने लेफ्निेंट जनरल राहील शरीफ को नया सेना प्रमुख नियुक्त किया। उन्होंने जनरल अशफाक परवेज कियानी का स्थान लिया जिन्होंने छः साल तक पाकिस्तान सेना की कमान सम्भाली। पाक सेना के वरिष्ठतम क्रम में तीसरे नम्बर पर खड़े जनरल शरीफ गैर विवादित छवि वाले माने जाते हैं। नवाज शरीफ ने जनरल राहील शरीफ के रूप में पाक सेना प्रमुख के तौर पर एक ऐसा चेहरा चुना है जिन्होंने न तो पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के किसी पद पर काम किया और न ही उन्होंने स्पेशल फोर्सेज में कोई भूमिका निभाई। दूसरी ओर अपनी वरिष्ठता को नजरअंदाज किये जाने पर लेफ्टिनेंट जनरल हारून असलम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। असलम जनरल कियानी के बाद दूसरे नम्बर के शीर्ष अधिकारी थे।
अब तो यह आने वाला समय ही बतायेगा कि दोनों शरीफ पाकिस्तान की दिशा और दशा कैसे बदलते हैं।
वाई एस बिष्ट







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