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प्रलय के 6 महीने बाद भी केदारघाटी में जीवन और मौत का संघर्ष

utt photo1केदारनाथ में आई प्रलय को 6 महीने का वक्त हो चुका है। इन 6 महीनों में जमीनी हालात कितने बदले हैं इसका जायजा लेने के बाद पता चला कि केदारघाटी के हालात दिल दहला देने वाले हैं। गोद में एक महीने का बच्चा और कड़कड़ाती ठण्ड के बीच लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने के लिए मजबूर हैं। केदारनाथ की प्रलय में केदारघाटी के 50 से ज्यादा गांव प्रभावित हुए थे। दर्जनों गाँव के लोग अभी भी अस्थायी टीन शेडों में रह रहे हैं। इन लोगों को सरकार से कोई मदद नहीं मिली है। 50 से ज्यादा गावों के लोग जान हथेली पर लेकर लोहे की रस्सी के सहारे लटकी ट्राली से मन्दाकिनी नदी को पार करने के लिए मजबूर हैं। नदी पार करते समय हर रोज कई लोग नदी में गिर रहे हैं। केदारनाथ की प्रलय के वक्त मन्दाकिनी नदी में आई बाढ़ से सैकड़ों गाँव आज भी सामान्य जनजीवन से कटे हुए हैं। 6 महीनों से कई घरों में चूल्हा नहीं जला है। घर का अकेला कमाने वाला बेटा और माँ के बुढ़ापे की लाठी केदारनाथ कि तबाही की भेंट चढ़ गया।

ऋषिकेश से हाइवे न.109 से होते हुए जैसे ही हम अगस्तमुनि पहुंचे तबाही के निशान नजर आने लगे। हाइवे जगह-जगह पर टूटा हुआ था। अगस्तमुनि में हमारे सामने ही एक बाइक सवार मन्दाकिनी नदी में जा गिरा। गनीमत थी कि बाइक सवार की जान बच गई। उसके साथी उसकी मोटरसाइकिल को निकालने की कोशिश कर रहे हैं। अगस्तमुनि के सिल्ली गाँव के उपेन्द्र सिंह ने बताया कि ऐसी दुर्घटनाएँ रोज की बात है। जैसे ही हम आगे बढ़े अगस्तमुनि के पास सिल्ली गाँव में मन्दाकिनी नदी का नजारा चैंकाने वाला था। जान हथेली पर लेकर लोहे की रस्सी के सहारे लटकी ट्राली से लोग मन्दाकिनी नदी को पार कर रहे थे। इस ट्राली से 30 गावों के लोग नदी पार करते हैं। हर रोज कई लोग नदी में गिर रहे हैं। 6 महीने पहले नदी पर एक पुल था जो बाढ़ में बह गया। ये नजारा है अगस्तमुनि बाजार का जहां पर केदारनाथ के हादसे के 6 महीनों के बाद भी खतरा बना हुआ है। ये आसमान में झूल रहे मकान कभी भी गिर सकते हैं। अगस्तमुनि बाजार में 100 से ज्यादा दुकानें, स्कूल और मकान थे।

utt photoअब हम आपको उन लोगों से मिलाते हैं जो आज भी इस हादसे से नहीं उभर पाये हैं। अगस्तमुनि के बनियाडी गाँव के सरादू लाल की एकलौती बेटी प्रलय की भेंट चढ़ गयी। गरीब सरादू लाल 6 महीनों से सब काम छोड़कर सरकार से मिलने वाले मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। अब हम केदारनाथ से 40 किमी दूर गुप्तकाशी पहुँच चुके हैं। 16 और 17 जून को केदारनाथ से आई तबाही से गुप्तकाशी के सेमी गाँव के 80 से ज्यादा मकान जमीदोज हो चुके हैं। इस गाँव में 150 परिवार रहते हैं। सरकार ने आपदा के समय लोगों को रहने के लिए टैंट दिये लेकिन जैसे ही सर्दी शुरू हुई स्थानीय प्रशासन ने लोगों से टैंट खाली करवा दिए और कहा कि लोग अपने घरों में चले जायं। कुछ एनजीओ की मदद से लोग टीन शेडों में रह कर गुजारा कर रहे हैं। राधे लाल का 15 साल का बेटा बुखार से तप रहा है। सेमी गाँव में 12 लोगों का एक परिवार इस तरह के तीन शेड में कड़कड़ाती ठण्ड में रात काट रहा है। इस परिवार में एक महीने का एक छोटा बच्चा भी है। ठण्ड से बचने के लिए आग ही सहारा है।

अब हम ऐसी कई अभागी माँ से मिलाते हैं जिनके आंसू पिछले 6 महीनों से अभी तक सूखे नहीं हैं। 52 साल की विजया देवी का एकलौता बेटा और बुढ़ापे की लाठी कल्पेश्वर शुक्ला केदारनाथ के प्रलय में खो गया। कल्पेश्वर शुक्लाUttarakhand_Road हैलीकॉप्टर कम्पनी के साथ काम करता था।  अब इस घर में इस बूढी माँ के अलावा कोई नहीं है। हैलीकॉप्टर कम्पनी ने कोई मदद नहीं की। अकेले रुद्रपुर गाँव के केदारनाथ में पूजापाठ करने वाले 10 पुरोहितों की मौत हुई। एक ही परिवार की ये तीन बूढी माँ हैं। जिनके जवान बेटे केदारनाथ की प्रलय का शिकार हो गये। अपना दुःख बांटने के लिए ये तीनों माएं पिछले 6 महीनों से इसी तरह रोती रहती हैं। 34 साल के जगदम्बा प्रसाद की माँ सविता देवी, 35 साल के जमुना प्रसाद की माँ कपूरी देवी और अनूप शुक्ला की माँ रेखा देवी को अब तक ये यकीन नहीं हो रहा है कि उनके जवान बेटे अब इस दुनिया में नहीं हैं। कोई इनका हाल लेने वाला नहीं है। होली हिमालय एनजीओ कि प्रमुख लता नेगी ने बताया कि अब इन लोगों कि सुध लेने के लिए कोई सरकारी अधिकारी नहीं आता है।

कड़ाके की ठण्ड के बीच इन लोगों को कुछ एनजीओ का ही सहारा है। कई सामाजिक संगठन इन इलाकों में गर्म कपडे बाँट रहे हैं।  केदारघाटी में 50 से ज्यादा गाँव आज भी सामान्य जनजीवन से कटे हुए हैं।  कई गाँव खतरे के निशान पर खड़े हैं। इन गाँव के पुनर्वास का कोई इंतजाम नहीं है। पिछले 6 महीनों से सड़क बनाने का काम सुस्त रफ्तार से चल रहा है। दिल्ली से आये सामाजिक कार्यकर्ता बृजमोहन उप्रेती ने बताया कि हाल ही में राज्य सरकार ने लोगों के विरोध के बावजूद केदारनाथ हाइवे के पुनर्निर्माण का काम बीआरओ से वापस लेकर पीडब्लूडी को दे दिया है। इस फैसले पर कई सवाल उठ रहे हैं। इस फैसले का मतलब सीधा-सीधा भ्रष्टाचार है।

इस निराशा के बीच कोई है जो लोगों के आंसू पोंछ रहा है। सरहद पर निगरानी करने वाली बीएसफ ने केदारघाटी के 12 गावों को गोद लिया है। बीएसफ के जवान दिन रात लोगों की मदद कर रहे हैं। बीएसफ ने सिर्फ कालीमठ गाँव का पुर्निर्माण किया बल्कि पौराणिक कालीमठ मंदिर को भी मन्दाकिनी नदी में बहने से बचाया। कालीमठ मंदिर को बचाने के लिए बीएसफ ने 100 मीटर लम्बी सुरक्षा दीवार कड़ी कर दी। इस पूरे इलाmanjeet (2)के में कालीमठ मंदिर की बहुत मान्यता है। कहा जाता है कि यहाँ पर माँ काली ने रक्तबीज राक्षस का संहार किया था। बीएसफ ने कालीमठ मंदिर के अलावा गाँव में लोगों के लिए पंचायत भवन, स्कूल और छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्र को दोबारा तैयार किया है। बीएसफ ने एक और बड़ा काम किया है कालीमठ के हाई स्कूल को दोबारा तैयार किया है। स्कूल में नए कमरों का निर्माण, फर्नीचर और स्कूल बैग देकर बच्चों के चेहरों पर हंसी लौटाने का काम किया है।

केदारघाटी में पिछले 6 महीनों से सरकार की बेरुखी से लोगों का गुस्सा अब सड़कों पर आ गया है। न सड़क बन पायी है और न बिजली की बहाली ऐसे में लोगों का रोजगार ठप्प है। लोग सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। ये सब देखकर यही लगा कि सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है और लोगों के प्रति सवेंदनहीन हो गयी है।

मनजीत नेगी – विशेष संवाददाता इंडिया टीवी (लेखक केदारनाथ प्रलय के बाद सबसे पहले पैदल मार्ग से केदारनाथ मंदिर पहुँचे थे।)

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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