आखिरकार कांग्रेस में लंबे समय से मुख्यमंत्री पद को लेकर चले ‘हाई प्रोफाइल’ ड्रामे का 31 जनवरी को उस समय पटाक्षेप हो गया जब मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपा। इसके बाद 1 फरवरी को देहरादून में विधायक दल की बैठक हुई
आखिरकार कांग्रेस में लंबे समय से मुख्यमंत्री पद को लेकर चले ‘हाई प्रोफाइल’ ड्रामे का 31 जनवरी को उस समय पटाक्षेप हो गया जब मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपा। इसके बाद 1 फरवरी को देहरादून में विधायक दल की बैठक हुई जिसमें केंद्रीय मंत्री हरीश रावत को नेता चुना गया।
छात्र जीवन से ही संघर्षशील रहे हरीश रावत के सिर आखिरकार मुख्यमंत्री का ताज सज गया। हालांकि इसके लिए उन्हें बाहरी नहीं बल्कि ‘अपनों’ के बिछाये सियासी बिसात से होकर गुजरना पड़ा।
इस कुर्सी पर उनकी दावेदारी तो राज्य बनने के बाद पहली कांग्रेस सरकार बनने के समय से ही थी, लेकिन वे जब भी आगे बढ़े अपने लोग ही उनके रास्ते में ‘कांटे’ बिछाते रहे। उन्होंने हार नहीं मानी और राज्य के ‘सिंहासन’ के लिए करीब 12 साल तक वह अपने ही सैनिकों (कांग्रेसियों) से अघोषित ‘युद्ध’ लड़े और विजय हासिल की।
हरीश रावत के सियासी सफर पर गौर करें तो उनकी पहचान जमीनी नेता और कुशल संगठनकर्ता की रही है। राज्य से लेकर केंद्र स्तर पर उनकी पकड़ काफी मजबूत है।
हिलमेल ब्यूरो







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