केदारनाथ प्राकृतिक आपदा के एक वर्ष पूरा होने पर उत्तराखंड सरकार ने आपदा पीडितों के लिए नई घोषणाएं की हैं। सरकार ने आपदा पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए आपदा में मृतक आश्रितों को सरकारी नौकरी दिए जाने के साथ ही दो लाख की अतिरिक्त सहायता देने की भी घोषणा की। यही नहीं गैरसैंण में निर्मिंत विधानसभा भवन के विभिन्न कक्षों के नाम आपदा में सबसे अधिक प्रभावित ब्लॉकों व गांवों के नाम पर रखा जाएगा। आपदा में उत्तराखंड के करीब 8,55 लोग लापता हैं, जिन्हें मृतक घोषित किया गया है।
पिछले साल 16-17 जून को आई भीषण आपदा में देशभर के करीब 4,021 लोग लापता हो गए थे। साथ ही लापता लोगों को मृतक मानकर मृत्यु प्रमाण पत्र भी जारी किए गए हैं। इसी के आधार पर प्रदेश सरकार की ओर से उत्तराखंड के मृतकों के परिजनों को पांच लाख रुपये की राहत राशि दी गई थी, जिनके घर पूर्णतः क्षतिग्रस्त हुए उन्हें सात लाख की राहत राशि दी गई। इसी प्रकार आपदा में अपंग हुए व्यक्ति को 1.50 लाख, कृषि भूमि के क्षतिग्रस्त होने, जानवरों के मरने, कंडीडंडी आदि के लिए भी राहत राशि बांटी गई।
मुख्यमंत्री के मीडिया प्रभारी सुरेंद्र कुमार ने सचिवालय में पत्रकार वार्ता कर इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि क्षेत्र व मृतक आश्रित भी चिह्नित कर लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई छूट गया होगा तो उसे भी शामिल कर लिया जाएगा।
एक सवाल के जवाब में कुमार ने कहा कि सरकार ने कभी यह दावा नहीं किया कि केदारनाथ में अब कोई शव नहीं है। उन्होंने कहा कि केदारनाथ में मिल रहे मानव कंकाल कांबिंग के चलते ही मिले हैं, इसलिए सरकार ने फैसला लिया है कि कांबिंग अभियान और तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जो नर-कंकाल मिल रहे हैं, सरकार उनका डीएनए टेस्ट कराने के साथ ही उनका विधि विधान के साथ अंतिम संस्कार भी करा रही है।
इस प्राकृतिक आपदा ने उत्तराखंड को कई वर्ष पीछे धकेल दिया है। प्रदेश में अवस्थापना विकास का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया था। प्रदेश को इस त्रास्दी से उबारने के लिए सरकार की ओर से अवस्थापना विकास को सुदृढ करने के साथ प्रभावितों का जीवन सामान्य करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।
इस आपदा के कारण केदारघाटी के लोगों ने यहां से पलायन करना शुरू कर लिया है। आपदा के बाद केदारघाटी के अधिकांश लोग पलायन कर चुके हैं और जो लोग यहां हैं भी वे आपदा के साये में जीवनयापन करने का मजबूर हैं। केदारघाटी के कई गांव एवं कस्बे आज भी ऐसे हैं जो खतरे की जद में हैं। इन गांव एवं कस्बों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किये गये हैं। हल्की सी बारिश होने पर यहां के लोगों की रूह कांप जाती है। ऐसी स्थिति में केदारघाटी से पलायन निरंतर जारी है।
इस आपदा ने सैकड़ों लोगों के सिर से छत छीन ली थी। सैकड़ों लोग एक ही रात में सड़क पर आ गये थे जबकि केदारघाटी के अधिकांश गांव खतरे की जद में आ गये थे। आपदा की दृष्टि से खतरे में आये गांवों एवं कस्बों की सुरक्षा के लिए शासन-प्रशासन स्तर से आज तक किसी भी प्रकार की कोई पहल नहीं हो पायी है।
आज भी मंदाकिनी नदी के किनारे सुरक्षा दीवारों का निर्माण नहीं हो सका है। मंदाकिनी का जलस्तर बढ़ते ही आपदा पीड़ितों की धड़कने तेज हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में केदारघाटी के लोग पलायन करने को मजबूर हैं। आपदा के एक वर्ष बाद भी केदारघाटी के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों का पलायन जारी है।
हिलमेल ब्यूरो


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