नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी सौंपने की चर्चा शुरू हो गई थी। डोभाल ने गुजरात भवन में मोदी से मुलाकात की थी और देश के सामने मौजूद सुरक्षा चुनौतियों से उन्हें
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी सौंपने की चर्चा शुरू हो गई थी। डोभाल ने गुजरात भवन में मोदी से मुलाकात की थी और देश के सामने मौजूद सुरक्षा चुनौतियों से उन्हें अवगत कराया था। भारत के सुरक्षा मुद्दों पर स्पष्ट नजरिया रखने वाले डोभाल ने ही मोदी के शपथ ग्रहण में सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाने की रणनीति बनायी थी जो उनकी पहली बड़ी सफलता साबित हुई लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर उनकी राह आसान नहीं है।
अजीत डोभाल की नियुक्ति से पाक में भी हलचल मच गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक डोभाल की नियुक्ति शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस योजना का हिस्सा है जो उन्हें पाक समर्थित आतंकवाद से निपटने के लिए तैयार की है। उनकी नियुक्ति के बाद से पाक में मौजूद दाऊद इब्राहीम, हाफिज सईद और सैयद सलाउद्दीन जैसे आतंक के सरगनाओं को सिरदर्द होना लाजिमी है क्योंकि डोभाल हमेशा ही आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के समर्थक रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने हमेशा ही अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के खिलाफ सख्त कार्रवाई का समर्थन भी किया है। ऐसे में क्या माना जाय कि भारत का ये जेम्स बांड दाऊद इब्राहिम जैसे मोस्ट वांटेड आतंकवादी को उसके अंजाम तक पहुंचा पायेगा ?
केरल कॉडर के 1968 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे अजीत डोभाल एनडीए सरकार के दौरान आईबी के निदेशक नियुक्त हुए थे। वह 2004-2005 में इस पद पर रहे। उन्होंने 1999 में कंधार विमान अपहरण, आईसी 814 के संकट से निपटने में भी अहम भूमिका अदा की थी। वह कर्नाटक सरकार के सुरक्षा सलाहकार भी रह चुके हैं। इन्हें खुफिया हलकों में सर्वश्रेष्ठ दिमाग वाला माना जाता है। अजीत डोभाल ने मिजोरम में छापेमारी निरोधी अभियान चलाया था और मिजो नेता लालडेंगा के सात में से छह कमांडरों को अपने पक्ष में लाकर मिजो नेता को वार्ता की मेज पर लेकर आए थे। जब खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने 1991 में रूमानियाई राजनयिक लिवियू रादू का अपहरण कर लिया था तो डोभाल ने उन्हें छुडाने के लिए सफल रणनीति रची थी।
अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड में हुआ। वह गैर सरकारी संस्था विवेकानंद की शाखा विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के निदेशक हैं। वह बेहद तेज तर्रार अधिकारी माने जाते हैं। उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 1988 में कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया जो कि आम तौर पर सैन्य बलों को वीरता के लिए दिया जाता है। इसके अलावा वह भारतीय पुलिस पदक पाने वाले सबसे युवा अधिकारी थे।
इस पृष्ठभूमि में जब हम भारत की वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा का विश्लेषण करते हैं तब हमारे सामने एक अव्यवस्थित सुरक्षा-तंत्र ही नजर आता
है। इस समय जब अन्य एशियाई राष्ट्र विश्व शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं, भारत की स्थिति इसके विपरीत है। भारत के अपने पड़ोसी राष्ट्रों से सम्बन्ध और बिगड़ते जा रहे हैं। पाकिस्तानी सीमा पर भारतीय सैनिकों के मारे जाने की घटना आम हो गई है। सिर काटकर ले जाना, युद्धविराम के बावजूद सोते समय जवानों को गोलियों से उड़ा देना ये सभी अंतर्राष्ट्रीय युद्ध अपराध के अंतर्गत आते हैं। इसके बावजूद भारत ने पाकिस्तान के ऊपर ना कोई कूटनीतिक दबाव ना ही दण्डित करने का प्रयास किया। इन घटनाओं से उत्साहित होकर चीनी सैनिक लगातार भारतीय सीमा में दूर तक घुसपैठ कर रहे हैं।
श्रीलंका में चीनी बेड़े तथा नेपाल में माओवादियों का भारत के खिलाफ खुला षड़यंत्र ये सारी घटनाएं भारत के कूटनीतिक विफलता तथा बाह्य सुरक्षा की निष्क्रियता का परिणाम हैं। भारत का कमोबेश ढुलमुल रवैया आंतरिक तथा वाह्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। कूटनीतिक मुद्दों पर अपनी ढीली प्रतिक्रिया के कारण भारत की छवि एक नरम राष्ट्र की हो गई है। आज भी कूटनीतिक विश्लेषक भारत को एक नरम राष्ट्र के रूप में ही देखते हैं।
ऐसे समय में जब चीन तथा पाकिस्तान जैसे विरोधी राष्ट्रों ने धुरी बना कर भारत के सुरक्षा तंत्र को निशाना बनाना शुरू किया है, भारत के पास एक सामरिक योजना का आभाव है। पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा किये गए मुंबई हमले की भर्त्सना विश्व के सभी देशों ने की जबकि चीन चुप रहा। सामरिक बढ़त से सम्बद्ध आर्थिक मामलों में भी भारत की कोई स्पष्ट नीति नहीं है।
जब भी कोई कूटनीतिक समस्या उत्पन्न होती है, उससे अस्थायी तौर पर निपटाने का प्रचलन है। सामरिक योजना के आभाव में मजबूत स्थान बना पाना असंभव है। भारत के सामरिक सुरक्षा तंत्र में साइबर सुरक्षा हेतु कोई व्यवस्था नहीं है। चीन अपनी टेलिकॉम कंपनियों के माध्यम से हार्डवेयर-इंस्टाल नाम की जासूसी भी करता है और भारत ने चीनी कंपनियों को बहुत ज्यादा छूट दे रखी है। इन नए खतरों से निपटने हेतु एक नई सोच की जरूरत है, जो अब नए नेतृत्व से ही अपेक्षित है।
कुशलता तथा अनुभव की बजाय
सामरिक संगठनों के उच्च पदों पर राजनीति प्रेरित नियुक्तियां करने का प्रचलन है। इन कमियों की वजह से रबिन्द्र सिंह जो राॅ का जाॅइंट सेक्रेटरी था अमेरिका को भारत की सभी सामरिक सूचनाएं पहुंचाता रहा। उजागर होने पर वह अमेरिका भाग गया। इस प्रकरण में सम्मिलित किसी व्यक्ति को उचित सजा नहीं हुई, ना ही भारत के अमेरिका को कूटनीति दबाव में डाला।
पिछले कुछ वर्षों तक भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एम. के. नारायण का कार्यकाल ऐसे कई कमियों को उजागर करता है। इन्होंने अपने पसंद के व्यक्तियों को राॅ तथा आई.बी. का प्रमुख बनाना चाहा इस प्रयास में इन्होंने इन संगठनों के कार्य को हतोत्साहित किया। ये सभी कमियां भारत के अव्यवस्थित सामरिक सूचना तंत्र को दर्शाती हैं। विभिन्न संगठनों में तालमेल, राष्ट्रीय सम्मान एवं सुरक्षा की आवश्यकता को सर्वोपरि बनाना जरूरी है। हाल के वर्षों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सामरिक मुद्दों पर ऐसे कदम उठाये हैं जिनका सीधा सम्बन्ध इनके वोट बैंक से हैं। आंतरिक सुरक्षा के मामले में आई.बी. की सरकारी मंत्रियों तथा सत्ता पक्ष के नेताओं ने जमकर खिचाई की जिसका एकमात्र उद्देश्य एक वर्ग विशेष को खुश करना था।
इन कमियों के बावजूद भारत को एक प्रमुख राष्ट्र के रूप में माना जाता है जिसका प्रमुख कारण भारत की बड़ी बाजार व्यवस्था तथा कुशल कामगारों की उपलब्धता है। उपलब्ध संसाधनों तथा क्षमताओं का पूर्ण उपयोग कर भारत के सामरिक सूचनातंत्र को प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की आवश्यकता है जिसे किसी भी स्थिति में अतिक्रमित न किया जा सके। सुरक्षा के नए आयाम हेतु यह एक आवश्यक कदम है। नए सुरक्षा नीति के आधार पर खतरों के आकलन (रिस्क अस्सेस्मेंट) कर एक नए सामरिक सूचनातंत्र की आधारशिला रखी जा सकती है। क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में सकारात्मक बढ़त बनाने के लिए इस सूचनातंत्र को व्यापक बनाया जा सकता है। नए सुरक्षा एजेंसी जैसे कि एन.आई.ए. बनाने की बजाय पहले से मौजूद संगठनों में ही सामरिक तालमेल तथा कुशलता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इन संगठनों का राजनीतिक उपयोग करने पर प्रतिबन्ध लगाने की व्यवस्था की भी जरूरत है।
यहां पर सवाल दाउद इब्राहिम जैसे मोस्ट वाटिंड अपराधी का नहीं बल्कि ऐसे अपराध के पूरे साम्राज्य को खत्म करने का है। ऐसे में अगर अजीत डोभाल ने अपनी छवि के अनुरूप काम कर दिया तो वो इतिहास में अपने नाम दर्ज करा देंगे।
(मनजीत नेगी – लेखक इंडिया टीवी के विशेष रक्षा संवाददाता हैं और पिछले करीब 10 सालों से अजीत डोभाल को व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं।)







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