एक ओर तो चीन के नेता भारतीय नेताओं के साथ वार्ता कर रहे हैं और दूसरी ओर चीन की सेना और वायु सेना भारत की सीमा में घुसपैठ कर देती है कभी उत्तराखंड में, तो कभी जम्मू कश्मीर में और कभी उत्तर पूर्व के राज्यों
एक ओर तो चीन के नेता भारतीय नेताओं के साथ वार्ता कर रहे हैं और दूसरी ओर चीन की सेना और वायु सेना भारत की सीमा में घुसपैठ कर देती है कभी उत्तराखंड में, तो कभी जम्मू कश्मीर में और कभी उत्तर पूर्व के राज्यों में। भले ही डिप्लोमेसी के मोर्चे पर चीन जो कहे, लेकिन देश की सरहद पर उसकी चाल अब भी टेढ़ी है। कुछ दिनों पहले उत्तराखंड के चमोली में चीन की सेना सेना की घुसपैठ का पता चला है। गोपेश्वर इलाके में 15 जुलाई को करीब 16 चीन के सैनिक घुस आए थे। बताया जा रहा है कि यहां तांझला में चीनी सैनिकों ने कई चरवाहों के टेंट जलाकर उन्हें खदेड़ दिया। उत्तराखंड में चीनी घुसपैठ कोई नई बात नहीं है। पिछले महीने ही एक चीनी हेलीकाप्टर भी चमोली में देखा गया था। उत्तराखंड की 350 कि.मी. सीमा चीन से व 275 किमी सीमा नेपाल से लगती है। चीन द्वारा अपने सीमावर्ती क्षेत्र में किए जा रहे आधारिक संरचना के विकास को देखते हुए राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण के कार्य में तेजी लाई जानी चाहिए।
सीमा पर चीन के बढ़ते दखल का जवाब देने के लिए केन्द्र सरकार ने कुछ समय पहले राज्यों के हाथ खोल दिए हैं। अब इन इलाकों में सड़क या दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में वन संरक्षण अधिनियम 1980 रोड़ा नहीं बनेगा। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) को दी गई विशेष छूट के आदेश केंद्रीय वन मंत्रालय से उत्तराखंड समेत चार राज्यों को आदेश मिल गए हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से हाल में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को जारी पत्र में साफ किया गया है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) से 100 कि.मी. दायरे में निर्माण के लिए बीआरओ को मंत्रालय से मंजूरी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। मंत्रालय ने सभी प्रस्तावित रक्षा प्रोजेक्ट में विशेष छूट दे दी है। इसमें सड़क निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास शामिल है। गृहराज्य मंत्री रिजिजु ने संसद में दिए गए एक सवाल के जवाब में कहा कि सिक्किम और उत्तराखंड में चीन की सीमा से लगी सामरिक महत्व की 8 सड़कों का निर्माण किया जा रहा है जिसमें सिक्किम में 3 और उत्तराखंड में 5 सड़कों के निर्माण का काम केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग को सौंपा गया है।
चीन लगातार ही घुसपैठ की हरकतें करता आ रहा है अब तो उसने उकसाने वाला कदम उठाते हुए अपनी सेना को लाखों विवादास्पद नक्शे बांटे हैं। नए नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा दिखाया गया है। चीनी अखबार पीएलए डेली के अनुसार, जल्दी ही सेना की सभी प्रमुख यूनिट्स को नए और सटीक नक्शे उपलब्ध करा दिए जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी सेना की सात कमानों में से एक ल्यानझोउ सैन्य कमान ने अपने सैनिकों के लिए डेढ़ करोड़ से ज्यादा नक्शों को अपडेट किया है। हालांकि चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि उसने इन नक्शों को प्रकाशित नहीं किया है। नए नक्शे में चीन की भारत से सटी सीमा के विवादित हिस्सों के अलावा दक्षिण व पूर्व चीन सागर के कई क्षेत्रों पर अपना दावा जताया गया है। चीन के इन दावों का भारत के अलावा जापान और तिब्बत हमेशा विरोध करते रहे हैं।
भारत सरकार ने चीन के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया जताई। अरुणाचल को चीन का हिस्सा दिखाने वाले नक्शे पर भारत ने कहा कि नक्शे से यह सच्चाई नहीं बदल जाती कि अरुणाचल भारत का हिस्सा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने कहा, ‘अरूणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। इस तथ्य को लेकर भारत ने चीनी अधिकारियों को विभिन्न अवसरों पर अवगत कराया है।’ चीन की ऐसी हरकतों से भारत और चीन के सम्बन्धों पर भी असर पड़ सकता है, जो कि दोनों देशों के हित में नहीं होगा।
अभी कुछ दिनों पहले ब्राजील के फोर्टलेजा शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के बीच मुलाकात हुई। दोनों नेताओं ने माना कि न केवल भारत-चीन के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं है, बल्कि दोनों देश एशिया और विश्व की सम्पन्नता की वृद्धि में एक उत्प्रेरक की भूमिका अदा कर सकते हैं। जिंगपिंग ने द्विपक्षीय संबंधों के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि जब भारत और चीन मिलते हैं तो पूरे विश्व की उन पर नजर रहती है।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही सप्ताह के अंदर यह भेंट वार्ता होने पर दोनों नेता प्रसन्न नजर आए। दोनों नेताओं ने पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान भारत के उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी की चीन यात्रा और जिंगपिंग के विशेष दूत के तौर पर चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान विकसित हुए द्विपक्षीय संबंधों की स्थिति पर संतोष जताया। दोनों पक्षों ने सीमा विवाद को हल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने सीमा पर परस्पर विश्वास एवं भरोसे को बढ़ाने और शांति बरकरार रखने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अगर भारत और चीन सीमा विवाद को परस्पर वार्ता से हल कर लेते हैं तो यह पूरे विश्व के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत होगा कि किस तरह शांतिपूर्वक तरीके से सीमा विवादों को सुलझाया जा सकता है।
रक्षा मामलों के जान
कार मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) दीपक के मेहता का मानना है कि भारत और चीन के बीच आपसी सम्बंध, विदेश नीति की एक प्रमुख चुनौती है, जिस पर नरेंद्र मोदी सरकार को पूरा ध्यान देना होगा और उस पर पार पाने के लिए प्रयास करने होंगे। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के फौरन बाद, चीन के प्रधानमंत्री ली केक्वियांग ने उन्हें टेलीफोन किया और बेहतर सम्बंधों के लिए अपनी सरकार की ओर से आश्वासन दिया; जवाब में मोदी ने ली को आश्वासन दिया कि चीन ‘‘हमेशा ही से भारत की विदेश नीति की एक प्राथमिकता रहा है।’’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के प्रधानमंत्री ली केक्वियांग के साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत में परस्पर प्राथमिकताओं को दोहराना, एक अच्छी शुरूआत है। मोदी की असरदार विदेश नीति का तत्काल प्रभाव दिखा। चीन ने अपने विदेशमंत्री वांग यी को जून में भारत भेजा और उम्मीद जताई कि इस यात्रा से दोनों देशों के बीच बेहतर आर्थिक सम्बंधों के लिए शुरूआती भूमिका तैयार की जाए। माना जा रहा है कि 2015 तक दोनों देशों के बीच व्यापार करीब सौ अरब डालर पहंुचने की उम्मीद है।
वैसे, अधिक आर्थिक सहयोग से उस सैन्य असंतुलन में फर्क नहीं पड़ेगा, जो भारत को अपने उत्तर मंे चीन के साथ झेलना पड़ रहा है और जिससे दोनों देशों के बीच पड़ने वाली लम्बी सीमा पर विवाद खड़े हो गए हैं। भले ही इससे बीजिंग के साथ भारत की बातचीत का स्तर बढ़े, लेकिन इसके साथ ही सरकार को उत्तर में सीमावर्ती बुनियादी सुविधाओं को उन्न्ात बनाने और आधुनिक सशस्त्र सेनाओं का आधुनिकीकरण करने पर ध्यान देना होगा-इन दो परियोजनाओं पर पिछली सरकार ने सरसरी तौर पर ही ध्यान दिया था। इसके साथ ही, चीन के दक्षिणपूर्वी एशियाई और पूर्व एशियाई पड़ोसी देश, भारत की ओर इस आशा से देख रहे हैं कि वह इस क्षेत्र में एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार के रूप में भारत की अधिकाधिक भूमिका निबाहेगा। सरकार की चुनौती इन सम्बंधों को एक ओर चीन के साथ तो दूसरी ओर दक्षिणपूर्वी और पूर्व एशियाई देशांे के साथ भारत हित में त्रिआयामी बनाना है।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चीन और भारत के बीच भू-राजनीतिक समीकरणों को समझना होगा। चीन का सकल घरेलू उत्पाद, भारत के मुकाबले चार गुना अधिक है। रक्षा पर चीन भारत से चैगुना अधिक खर्च करता है। उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया में दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्दी ही अमरीका को पीछे छोड़़कर पहले नम्बर पर पहंुच सकती है। बीजिंग, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति भी है और भारत सहित अपने सभी एशियाई देशों से कहीं अधिक बड़ी है। अगर आने वाले वर्षों में, भारत अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार करता भी है और चीन लड़खड़ाता है, तो भी दोनों देशों के बीच का भारी अंतर काफी अरसे तक बना रहेगा। इस बीच, चीन की ताकत के परिणाम भारत को हिमालय क्षेत्र में विवादित सीमा पर हर जगह नए सैन्य दबावों के रूप में दिखाई दे रहे हैं।
भारत हमेशा से कहता आ रहा है कि अगर किसी भी देश के पड़ोस में शान्तिपूर्ण माहौल है तो उसका पड़ोसी भी शान्तिपूर्ण तरीके से रहता है और ऐसे में दोनों देशों की तरक्की होना स्वाभाविक है। अब हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए चुनौती, वास्तविकता और भावनाओं के बीच तालमेल बैठाना है। इसके लिए, पहले हमें इस प्रकार के पेचीदा और नाज़ुक मुद्दों को दलगत राजनीति के दायरे से बाहर करना होगा। जब तक हम दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम नहीं करेंगे तब तक हमारा देश आगे नहीं बढ़ सकता। घुसपैठ को रोकने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास होना बहुत जरूरी है। जैसा कि आने जाने के सड़कों का निर्माण, पानी, बिजली जैसी मूलभत सुविधाओं की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कि वहां रहने वाले लोगों को परेशानी न हो और वह वहां से अपना पलायन न करें।
वाई एस बिष्ट







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