डा. एस. पी. सती एवं वाई. पी. रैवानी उत्तराखंड राज्य का अधिकांश हिस्सा पर्वतीय है और हिमालय की ये पर्वत श्रृंखलाएं अपने आप में विश्व की सबसे कम उम्र की, अभी भी निर्माण की प्रक्रिया में और अत्यंत भंगुर हैं। अपनी इन विशिष्टताओं के कारण
डा. एस. पी. सती एवं वाई. पी. रैवानी
उत्तराखंड राज्य का अधिकांश हिस्सा पर्वतीय है और हिमालय की ये पर्वत श्रृंखलाएं अपने आप में विश्व की सबसे कम उम्र की, अभी भी निर्माण की प्रक्रिया में और अत्यंत भंगुर हैं। अपनी इन विशिष्टताओं के कारण हिमालय बहुआपदीय क्षेत्र है। यद्यपि हिमालय में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक उथल-पुथल इन श्रृंखलाओं की निर्माण प्रक्रिया और इनकी अपनी अवस्थिति के कारण होती हैं, परन्तु इन घटनाओं का आपदा के रूप में सामने आने के पीछे मानवीय क्रियाकलाप ही जिम्मेदार हैं।
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं का अपना इतिहास है। यद्यपि दुर्भाग्य से यहाँ की आपदाओं के बारे में प्रमाणिक दस्तावेजी सुबूत अत्यंत क्षीण हैं, तथापि इतिहासकारों और प्राकृतिक आपदाओं पर शोध कर रहे विशेषज्ञों ने यत्र-तत्र बिखरे सूत्रों को जोड़कर इस क्षेत्र में पिछले कुछ शताब्दियों में घटित प्राकृतिक आपदा की घटनाओं पर कुछ हद तक विश्वसनीय जानकारियां जुटाई हैं। सबसे भीषण आपदा के रूप में सन् 1803 के भूकम्प का जिक्र मिलता है। हालांकि वैज्ञानिकों में इस भूकम्प के केंद्र को लेकर मतैक्य नहीं है। कुछ इसका केंद्र श्रीनगर गढ़वाल मानते हैं, कुछ बदरीनाथ के नजदीक और कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार इसका केंद्र उत्तरकाशी हो सकता है।
अंग्रेज लेखक रैपर के अनुसार इस भूकम्प में गढ़वाल क्षेत्र की जनसंख्या एक चैथाई रह गयी थी और तत्कालीन गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर गढ़वाल अस्सी प्रतिशत तक नेस्तनाबूत हो गया था। इस भूकम्प की तीब्रता का अधिकांश वैज्ञानिक 8 का अनुमान लगाते हैं.. हालांकि इसमें भी वैज्ञानिकों में मतैक्य नहीं है। इस भूकम्प की घटना का गढ़वाल के राजनीतिक इतिहास पर भी बड़ा असर पडा। भूकम्प से क्षत-विक्षत इस प्रांत पर कुछ ही महीनों बाद सन् 1804 गोरखाओं ने आक्रमण कर दिया था। इसमें गढ़वाल नरेश मारा गया था और गोरखाओं की बर्बरता के किस्से आज भी जनश्रुतियों में यहाँ यत्र-तत्र सुनने को मिलते हैं।
इसके अतिरिक्त कुछ अन्य भूकम्पों, सन् 1720, 1809, 1816, 1831, 1842, 1843, 1852, 1858, 1865, 1869, 1871, 1878, 1903, 1906, 1916, 1956, 1958, 1960, 1966, 1968, 1975, 1979 और 1980 में भी भूकम्प की घटनाओं का जिक्र मिलता है। जिनमें से अधिकांश में जन-धन हानि का प्रमाणिक जिक्र या तो कहीं मिलता ही नहीं है, या फिर बहुत अस्पष्ट मिलता है। यह भी संभव है कि इनमें से कुछ भूकम्पों में बड़ी जन हानि हुई ही ना हो। 1991 के उत्तरकाशी भूकम्प और 1999 में आये चमोली भूकम्प से व्यापक जन-धन हानि हुई थी।

आपदाओं की कड़ी में कुछ बड़ी भूस्खलन की घटनाओं की प्रमाणिक जानकारी भी दस्तावेजों में मिलती हैं। इनमें सन् 1868 में बिरही गाड, चमोली में भूस्खलन से 73 लोगों की मौत, 1880 में नैनीताल में भूस्खलन से 173 लोगों की मौत, 1894 में बिरही, नदी में बाढ़ के कारण सम्पूर्ण श्रीनगर सहित अलकनंदा घाटी में व्यापक तबाही, 1898 में नैनीताल, में भूस्खलन से 29 लोगों की मृत्यु, 1951 में सतपुली में बाढ़ 22 बसें बही और कई लोगों की मौत। 1970 में बेलाकोची और धारचुला में अचानक बाढ़ और भूस्खलन से क्रमशः 70 और 12 लोगों की मृत्यु, 1976 में मंदाकिनी घाटी, 1977 में तवाघाट, 1978 में कनोडिया गाड भागीरथी, 1979 में कोंथा, मंदाकिनी घाटी, 1980 में ज्ञानसू उत्तरकाशी, 1983 में बागेश्वर, 1984 में कपकोट, 1990 में ऋषिकेष नीलकंठ, 1991 में देवारखादोरा गोपेश्वर, 1996 में पिथौरागढ़, 1998 में ऊखीमठ और मालपा पिथौरागढ़, 2001 में फाटा रुद्रप्रयाग, 2002 में बुधाकेदार टिहरी, 2003 में सरनौल उत्तरकाशी, 2004 में विष्णुप्रयाग, 2005 में गोविन्दघाट, 2007 धारचुला, 2009 मुनस्यारी, 2010 भात्वादी उत्तरकाशी, बागेश्वर सहित उत्तराखंड के कई गाँव में व्यापक तबाही, 2011 में असीगंगा घाटी, 2012 में उखीमठ और बूढाकेदार और 2013 में तो त्राहि-त्राहि केदारनाथ आपदा में तो हजारों की जान कहने भर से काम नहीं चलने वाला.. इस पर बहुत कुछ लिखा भी जा चुका है और अभी भी उससे कहीं अधिक लिखा जा सकता है।
यहां उत्तराखंड में घटित एक बड़ी आपदा के बहाने आपदा प्रबंधन पर भी एक दृष्टि डालें तो उपयुक्त होगा.. 1893 में चमोली जिले में अलकनंदा नदी की एक सहायक नदी का बिरही के जलागम में गोना नामक स्थान पर एक तरफ की पूरी पहाड़ी टूट कर नदी में गिरी और नदी को अवरुद्ध कर दिया। भूस्खलन इतना बड़ा था कि लगातार एक साल तक नदी का पानी इस झील में भरता रहा। इस बीच तत्कालीन ब्रिटिश शासन काल में पी डब्लू डी के एक अधिकारी थे लेफ्टिनेंट कर्नल वुल फोल्ड जो कि हरिद्वार में बैठते थे। उन्होंने वायसराय से स्थिति को अवगत कराते हुए जरूरी स्वीकृतियां लेकर हरिद्वार से और गोना तक पेड़ों पर ठोक-ठोक कर टेलीग्राफ की लाइन बिछायी गयी। इस बात की व्यवस्था की गयी कि गोना से हर घंटे में झील की स्थिति का मापन कर सीधे हरिद्वार सन्देश भेजा जाय। इसके आधार पर झील के फटने की सटीक भविष्यवाणी की गयी। 25 अगस्त 1894 को जब यह झील भविष्यवाणी के अनुरूप टूटी तो पूरी अलकनंदा घाटी को पहले ही खाली करा दिया गया था। सम्पूर्ण अलकनंदा और गंगा घाटी में व्यापक तबाही हुई परन्तु एक भी मानव की मृत्यु दर्ज नहीं की गयी। आज से सवा सौ वर्ष पहले बहुत कम संसाधनों के बाबजूद प्रभावी आपदा प्रबंधन का यह सर्वोत्तम उदाहरण है।
वस्तुतः पिछले दो दशकों में वर्ष दर वर्ष उत्तराखंड में भूस्खलन जनित आपदाओं की उदास कहानियों की पुनरावृत्तियां यहां की नियति बन चुकी हैं। इस तरह के उदाहरण हमें जो जख्म दे जाते हैं उनसे अधिक त्रास तो इस बात को लेकर है कि हम इन घटनाओं से कुछ सबक नहीं सीखते। एक ही तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बाबजूद हम कम से कम राज्य बनने के बाद भी कोई सटीक प्रबंधन तंत्र विकसित नहीं कर पाए हैं। हम हिमालय की संवेदनशीलता की अनदेखी करते हैं, हम वैज्ञानिकों के शोध के उपरान्त दी गयी संस्तुतियों को नजरअंदाज करते हैं और हम हिमालय की पारिस्थितिकी, प्राकृतिक संसाधनों, धारिता (ब्ंततलपदह ब्ंचंबपजल) के प्रमाणिक आंकलनों के सर्वथा अभाव के बाबजूद बड़े पैमाने पर सड़क और जलविद्युत और अन्य परियोजनाओं पर कार्य कर रहे हैं। एक तो इस तरह के विकास कार्यों के लिए स्थापित मापदंड स्पष्ट और कठोर नहीं है और दूसरे मापदंड जैसे भी हो तो भी इनका पालन अधिकांशतः नहीं हो रहा है।
जलविद्युत परियोजनाएं और आपदा
पिछले
वर्ष की आपदा के बाद सर्वाधिक सुर्खियों में जो विवाद रहा वह जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर था। यह बात सत्य है की विकास की ओर उन्मुख राष्ट्र की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जल विद्युत परियोजनाओं की जरूरत है। परन्तु 2013 जून की आपदा में यह बात शिद्दत से उठी कि जल विद्युत परियोजनाओं ने इस आपदा की विराटता कई गुना बढ़ाई है.. इसको लेकर उच्चतम न्यायालय में याचिका विचाराधीन है और कम से कम छः परियोजनाओं पर कार्य पर रोक लगी है। यदि इस तथ्य की पड़ताल करें। टिहरी बांध के समय से ही बांधों को लेकर परस्पर विपरीत दो धाराएं सामने आती हैं। कुछ लोग जहां एन केन प्रकारेंण बांध बनाने के पक्ष में खड़े दिखते हैं तो कुछ इन्हें हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र के मद्देनजर इनको किसी भी सूरत में ना बनाए जाने के मत पर अड़े दिखाई देते हैं। जनसामान्य बांध से सम्बंधित मुद्दों को लेकर अमूमन दिग्भ्रमित दिखाई देता है। और इन परियोजनाओं में बनाए जाने में जिस हद तक धन लिप्त रहता है, उससे उपरोक्त दोनों में से किसी भी मत की निष्पक्षता पर सहज ही विश्वास करना कठिन हो जाता है। बांध लाबी की अपनी कार्यशैली होती है जिसमें वह सबसे पहले क्षेत्र के छोटे से लेकर बड़े नेताओं को अपने पक्ष में धन बल के चलते मोड़ देते हैं। उसके बाद छुटभैयों को ठेकेदार बना देते हैं। इस तरह बांध से उठे ज्वलंत मुद्दों पर किसी भी विरोध को दबाने के लिए स्वभाव से लगभग लठैतों की स्थानीय सेना तैयार हो जाती है। इसी तरह बांधों का सिरे से विरोध करने वालों ने भी इस मुद्दे से जुड़े समग्र पहलुओं पर जनता को जागरूक करने में बड़ी बाधा उत्पन्न की है और विरोध के विरुद्ध बांध लौबी ने अपने लठैतों को आगे कर बड़े पैमाने पर स्थापित मापदंडों की अनदेखी की है।
2013 की आपदा में भी बांध कंपनियों की यह कारगुजारी व्यापक स्तर पर रेखांकित हुई है.. उदाहरणार्थ श्रीनगर बांध का जो मालवा नदी किनारे नियमों की आपराधिक अनदेखी करके नदी किनारे बिना किसी सुरक्षा दीवार के यत्र तत्र ठिकाने लगाया गया था उसका लगभग 5 लाख घन मीटर मलवा बाढ़ के समय नदी ने बहा लिया और श्रीनगर के निचले क्षेत्रों पर बिछा कर व्यापक तबाही का शाबाब बना। यही नहीं इस मलवे ने नदी की धारा को मोड़ा जिससे गढ़वाल विश्वविद्यालय के चैरास कैम्पस का बहुत बड़ा हिस्सा टूट कर बह गया। विश्वविद्यालय का यह कैम्पस अभी भी खतरे की जड़ में है। वहीं परियोजना की नहर से लगातार रिसाव की खबरें आ रही हैं जिनसे सम्पूर्ण चैरास का निचला हिस्सा जिसमें गढ़व्ला विश्वविद्यालय का कैम्पस भी आता है, बड़े खतरे की जद में आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार ने जो विशेषज्ञ कमेटी बनायी, उसने बांधों के सामूहिक प्रभाव पर बहुत ही प्रमाणिक जानकारी जुटाई है। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर दिखाया गया है कि किस तरह बांध कंपनियों ने बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी की है जिसके कारण आपदा के समय विनाश की विराटता बढ़ी है। रिपोर्ट में बांधों का विरोध तो नहीं किया गया है परन्तु इनकी संख्या में नियंत्रण का सुझाव दिया गया है और उच्च हिमालय क्षेत्र जो कि भूगर्भिय दृष्टि से संवेदनशील है, में बांध ना बनाये जाने का प्रस्ताव भी किया है। इस रिपोर्ट में चेताया गया है की उच्चा हिमालय क्योंकि भूगर्भीय और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है इसलिए बांध हितकारी नहीं होंगे। साथ ही इस क्षेत्र में पुराने हिमनद अवसादों के रूप में जो असंगठित मलवा है, वह अतिवृष्टि की दशा में बांधों के संचयित जल के साथ मिल कर विनाश का तांडव मचा सकता हैं।
दिलचस्प यह भी है कि केंद्र सरकार लगभग एक साल तक इस रिपोर्ट को दबाई रही, फिर अचानक इस रिपोर्ट की संस्तुतियों को ही अपना शपथ पत्र बना कर उसने सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद ही यू टर्न लेकर इस शपथ पत्र से भी मुकर गयी.. यह कहना गलत न होगा कि बांध लौबी के दबाव में इस तरह के पाले बदले जा रहे हैं.. और वैज्ञानिकों की बड़ी जतन से बनायी गयी रिपोर्ट को बड़े ही गलत तरीके से पेश कर उन्हीं वैज्ञानिकों को बांध विरोधी करार दिया जा रहा है। केस अभी विचाराधीन है और निर्णय की सभी को प्रतीक्षा है।
क्या हमने कुछ सबक लिया ?
केदारनाथ आपदा जितनी बड़ी विभीशिका थी, उतना ही बड़ा अवसर भी था इस तरह की घटनाओं से सबक लेने का। परन्तु बीते पौने दो सालों के सरकारी क्रिया-कलाप, और पुनर्निर्माण के कार्यों में पैसा ठिकाने लगाने के सरे उपक्रम चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि हमारा इस तरह की प्राकृतिक घटनाओं के प्रति ना तो नजरिया में ही कोई अवधारणागत परिवर्तन आया है। नदियों के खनन में और ध्वस्त तटबंधों को ठीक करने के कार्य में अक्षम्य विलम्ब के अतिरिक्त निर्माण कार्यों की घटिया गुणवत्ता हम ना सुधारेंगे की अवधारणा की उदास कहानी बया करते हैं। भ्रष्टाचार के प्रभाव में सरकारें, नौकरशाही और ठेकेदार तो काहिर आकंठ डूबे हैं ही, आम जनमानस भी इससे अछूता नहीं है। प्रभावी आपदा प्रबंधन तंत्र अभी भी प्रांत में दूर की कौड़ी लगता है। स्कूल कालेजों में यथार्थपरख प्रशिक्षण देकर इस तरह की आपदाओं से खुद को और अन्य पीड़ितों को बचाने के लिए एक प्रभावशाली मानवसंसाधन तंत्र तैयार किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालयों में विकास परियोजनाओं के प्रभावों, आपदा प्रबंधन और वैकल्पिक रास्तों पर शोध किया जाना समय की मांग है।
(लेखक कम्पूटर साइंस विभाग, ’’भू-विज्ञान विभाग’’, हेमवन्ती नंदन बहुगुणा, गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल में कार्यरत हैं)







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