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अगर न बचेगा पर्यावरण न बचेंगे हम ?

सब जानते हैं कि नदियों का खोदा जाना पर्यावरण की दृष्टि से विनाशकारी है। नदियों में जमीन की सतह से ऊपर जितना पानी बहता हैए उससे अधिक सतह से नीचे बहता है। खासकर पहाड़ से नीचे गिर कर भाबर इलाके में नदियों का पानी एकदम

सब जानते हैं कि नदियों का खोदा जाना पर्यावरण की दृष्टि से विनाशकारी है। नदियों में जमीन की सतह से ऊपर जितना पानी बहता हैए उससे अधिक सतह से नीचे बहता है। खासकर पहाड़ से नीचे गिर कर भाबर इलाके में नदियों का पानी एकदम नीचे चला जाता है और फिर तराई में वह ऊपर आ जाता है। इसीलिये आज से पचास.साठ साल पहले तराई में दस फीट खोदने पर ही पानी निकल आता थाए जबकि भाबर में कुएँ खोदना कभी भी संभव नहीं रहा। दूसरी तरफ उत्तरकाशी से गंगोत्री की तरफ छोड़ी बड़ी नदियों पर दर्जनों हाइड्रो प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। इस पूरे इलाके में टूटते पहाड़ और ग्लेश्यिर पर कम होती बर्फ साफ तौर पर देखी जा सकती है। जबकि गंगोत्री से गोमुख के रास्ते पर पर्यटकों की बढती तादात से यहां गंगा की गोद कूड़े और गंदगी से भरी पड़ी है। खतरे की बात ये है कि ये कूडा बायोडिग्रेडबल भी नहीं। इस कचरे में पॉलीथिन और प्लास्टिक के दूसरे सामान ज्यादा हैं जो पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक हैं। ऐसा नहीं है कि प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं लेकिन वो भी चेतावनी और आग्रह वाले कुछ साइन बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेता है।

गंगोत्री गलेशियरए भागीरथी पर्वतए शिव पर्वत और रक्तवर्णा पर्वत ये सभी भागीरथी के स्रोत हैं। लेकिन इन पर भी खतरा साफ दिख रहा था। इनका वजूद पूरी तरह तबाही की तरफ बढ़ रहा है। ज़मीन धंसने की घटनायें यहां आम दिनों की बात हो चली है। जहां हर वक्त बर्फ की चादरें चट्टानों से ज्यादा मजबूत होती थीं वहां अब हर जगह दरारें दूर से ही देखी जा सकती हैं। ये दरारें एक दिन या एक पल की देन नहीं हैं और ये कोई मामूली बात भी नहीं है बल्कि ये पूरी दुनिया के लिये खतरे का सिग्नल है। गलेशियर लगातार पिघलकर अपनी जगह से हटते जा रहे हैं। जहाँ आज ग्लेशियर का मुहाना है साल भर बाद वो वहां नहीं होगा। बर्फ की चट्टानों में ये दरारें भी हर रोज बढ़ती जा रही हैं। आने वाले समय में जल संकट से बचने के लिए हमें गंगा और गोमुख की सुध लेनी होगी। अब हिमालय में हिमपात कम हो गया है। पौड़ी समेत उत्तराखंड के कई हिस्सों में में अब बर्फ नहीं पड़ती। मसूरी में कब बर्फ पड़ती और कब गल जाती है पता ही नहीं चलता।

इस समय केवल उत्तराखंड में पांच सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है। इन सभी परियोजनाओं को उत्तराखंड सरकार की पूर्ण मंजूरी के बाद ही चलाया जा रहा है। शायद सरकार अभी तक इन परियोजनाओं से उत्तराखंड के ग्रामीणों के समक्ष होने वाले संकट को नहीं समझ पा रही है। इन सभी परियोजनाओं से सीधे तौर पर यहां की आम गरीब जनता को नुकसान हो रहा है। साथ ही पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वह तो अभी अलग ही है। आज उत्तराखंड के अधिकतर गांवों की प्राकृतिक सुंदरता खत्म होती जा रही है। इंसान की हर मूल जरूरत की व्यवस्था जैसे पानीए जंगलए फलए कृषि इत्यादि का लगभग अंत होता जा रहा है और इन सभी का कारण सरकार द्वारा विकसित की जा रही परियोजनाएं हैं। इस समय उत्तराखंड की कोई भी छोटी या बड़ी नदी ऐसी नहीं है जिस पर कोई परियोजना न चल रही हो।

हम जिन खतरों की बात कर रहे हैं वो सरकारी लापरवाहियों की देन हैं। विकास के साथ कुदरत का तालमेल टूटा और लालच का राक्षस विकराल होता चला गया। हकीकत ये भी है कि विकास के नाम पर जो बड़े.बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट इस वक्त चल रहे हैं वहीं पर्यावरण के लिये तबाही की वजह बन रहे हैं। बड़ी बड़ी मशीनें पहाड़ों का सीना चीर कर आगे बढ़ी और इनका वजूद संकट में आने लगा। इनकी वजह से सदियों से खड़े पहाडों की बुनियादें हिल रही हैं। ये बात समझ से परे है कि उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच एको सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने में निशंक सरकार को क्या परेशानी है। कुछ निजी कंपनियों को फायदा पहुँचाने के लिए पर्यावरण की निर्मम बलि दी जा रही है। अब समय आ गया है की राज्य सरकार पर्यावरण को बचाने के लिए निजी स्वार्थों से हटकर राज्यहित में दूरगामी नीति बनाये। जिससे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम हो सके।

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