कविता के माध्यम से जाने उत्तराखंड के वीर कफ्फू चौहान की गाथा

कविता के माध्यम से जाने उत्तराखंड के वीर कफ्फू चौहान की गाथा

यह देवभूमि उत्तराखंड है महान वीरों से सुशोभित,
महान वीरों की वीर गाथाएँ करती सदा गौरवान्वित।
उप्पुगढ़ इतिहास का प्रसिद्ध गढ़पति कफ्फू चौहान,
मातृभूमि के रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग कर देने वाला जवान।

लेखक- संदीप डबराल

यह देवभूमि उत्तराखंड है महान वीरों से सुशोभित,
महान वीरों की वीर गाथाएँ करती सदा गौरवान्वित।
उप्पुगढ़ इतिहास का प्रसिद्ध गढ़पति कफ्फू चौहान,
मातृभूमि के रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग कर देने वाला जवान।

राजा अजय पाल के अधीन हो रहे थे सभी गढ़पति,
उसी समय विजय अभियान दृष्टि उप्पुगढ़ पर पड़ी।
स्वाभिमानी कफ्फू चौहान था उप्पुगढ़ का गढ़पति,
जिसे अपने गढ़ की स्वाधीनता प्राणों से प्यारी थी।

“मैं पशुओं में सिंह व पक्षियों में गरुड़ हूँ”यह कहकर,
बिना युद्ध अधीनता स्वीकारने का प्रस्ताव ठुकराया।
कफ्फू की गर्वोति,क्रुद्ध नृप ने उप्पुगढ़ पर की चढ़ाई,
मुट्ठी भर सेना, विशाल सेना के सम्मुख टिक ना पाई।

वैरी ने मृत्यु की झूठी सूचना माँ व पत्नी को जब दी,
माँ,पत्नी ने जलती चिता में कूदकर प्राणाहुति दे दी।
प्राणाहुति दे दी थी हजारों ललनाओं ने जौहर कर,
नृप सम्मुख पेश किया कफ्फू जीवित बंदी बनाकर।

कफ्फू ने फिर भी अधीनता को स्वीकार नहीं किया,
‘सिर काटकर मेरे पैरों में गिरा दो’नृप ने हुक्म दिया।
काट कर भी नृप वीर कफ्फू का सिर झुका न पाया,
मुँह में भरके मिट्टी झटके से सिर नृप से दूर गिराया।
यह दृश्य देख कर राजा अजय पाल स्तब्ध रह गए,
वीर तुम जीते मैं हारा’ मृत देह समक्ष नृप बोल उठे।
नृप ने स्वयं स्वाधीनता प्रेमी कफ्फू को मुखाग्नि दी,
स्थानीय जन मतवालेपन से कहते हैं कफ्फू सनकी।

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