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पक्के इरादों के अजीत डोभाल

भले ही हाल में नेपाल में नए संविधान के लागू होने बाद वहां बने हालात को भारत की कूटनीतिक चूक माना जा रहा हो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की आलोचना हो रही हो लेकिन सही मायनों में मोदी सरकार के एक साल में

Ajit Doval..भले ही हाल में नेपाल में नए संविधान के लागू होने बाद वहां बने हालात को भारत की कूटनीतिक चूक माना जा रहा हो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की आलोचना हो रही हो लेकिन सही मायनों में मोदी सरकार के एक साल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की सफलता का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है।

एक तरफ गैंगस्टर छोटा राजन को गिरफ्तार करने की रणनीति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के दिमाग की उपज है। छोटा राजन को इंडोनेशिया में गिरफ्तार करने की योजना उस रणनीति का एक हिस्सा है जो अंडर वल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम को पकड़ने के लिए बनाई गई है। छोटा राजन की गिरफ्तारी में डोभाल की अहम भूमिका रही है। छोटा राजन को इसलिए गिरफ्तार किया गया ताकि उसके जरिए दाऊद पर शिकंजा कसा जा सके। छोटा राजन के गुर्गे दाऊद इब्राहिम पर लगातार नजर रखते हैं ऐसे में छोटा राजन से सरकार को कई खुफिया जानकारी मिलने का अनुमान है।

वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश ने उल्फा नेता अनूप चेतिया को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत हस्तक्षेप और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की खास रणनीति के चलते भारत को सौंपा है। वह साल 1997 में बांग्लादेश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद से ही वहां था। 18 साल बाद हुए नागा शांति समझौते को अमली जामा पहनाने के पीछे असली दिमाग राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का ही था। अजीत डोभाल ने बातचीत के दौरान उग्रवादी संगठनों पर इस बात से भी दबाव बनाया कि हमारे पास सैन्य कार्रवाई और बातचीत दोनों के रास्ते खुले हैं।

इराक में फंसे भारतीयों को घर लाने का ऑपरेशन हो, सीमा पर पाक सेना की कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देने की रणनीति, या फिर हाल ही में पूर्वोत्तर में उग्रवादियों द्वारा सेना के 18 जवानों को मार देने के बाद सेना द्वारा म्यांमार में जाकर उग्रवादियों को खत्म करने के लिए भारतीय सेना के इतिहास की सबसे आक्रामक और सफल कार्रवाई। यही नहीं श्रीलंका में पूर्व राष्ट्रपति महिन्दा राजपक्षा को सत्ता से बाहर करने का मिशन। दरसल महेंद्र राजपक्षे चीन से नजदीकी बढ़ा रहे थे। इन सबके पीछे रक्षा सलाहाकार का दिमाग काम कर रहा है।

Narendra Modi with Ajit Dovalभले ही पाकिस्तान के साथ एनएसए स्तर की बातचीत परवान नहीं चढ़ पायी लेकिन अजीत डोभाल की रणनीति के तहत मोदी सरकार कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरने में कामयाब रही है। पहली बार भारत सरकार ने पाकिस्तान को दो टूक समझा दिया है कि अब कश्मीर पर दोनों देशों के बीच बातचीत बिना हुर्रियत नेताओं के होगी और पूरे कश्मीर यानी पीओके समेत होगी। मतलब साफ है अब पाकिस्तान कश्मीर मसले पर अपने ही बिछाए जाल में फंस गया है। यही नहीं, पाकिस्तान जो हमेशा भारत में प्रोपोगैंडा या आतंकवाद फैलाने की पहल किया करता था, आज वह देश की रक्षा नीति को पानी पी पी कर कोस रहा है। कुछ वर्ष पूर्व एक सेमिनार में मुंबई पर पाकिस्तानी हमले के हवाले से डोभाल ने बलूचिस्तान को ले कर एक ऐसी चुनौती पाकिस्तान के आगे फेंक दी थी कि पाकिस्तान सकते में आ गया। आज यूट्यूब पर उस टिप्पणी को ले कर पाकिस्तानी मीडिया और पाकिस्तान के हॉक माने जाने वाले लोगों के पसीने कैसे छूट रहे हैं, वह आप आसानी से देख सकते हैं। खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख ए एस दुल्लत का मानना है कि मोदी सरकार की सफलता और विफलता में डोभाल की अहम भूमिका होगी।

वास्तव में अजीत डोभाल एक ऐसे शख्स हैं जिन्हें देश की आंतरिक और बाह्य दोनों ही खुफिया एजेंसियों में लंबे समय तक जमीनी स्तर पर काम करने का लंबा अनुभव है। आने वाले दिनों में भी मोदी सरकार की खास पहलों में अजीत डोभाल की ही बड़ी भूमिका होगी। अजीत डोभाल भारत में जासूसी की दुनिया का ये वो चेहरा रहा है जो आज नरेंद्र मोदी सरकार में रुतबे और रसूख की एक नई पहचान बन चुका है।

देश के पांचवे सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल 31 मई 2014 को प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने अजीत डोभाल इंटेलीजेंश ब्यूरों के चीफ रह चुके हैं। उन्हें आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में काउंटर टेरेरिज्म का मास्टर माना जाता हैं क्योकि पंजाब से लेकर नार्थ ईस्ट तक और कंधार से लेकर कश्मीर तक डोभाल ने देश और दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लडाई में अहम योगदान दिया है।

Dawood Ibrahim

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का मुखिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होता है जिसका मुख्य काम प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सलाह देना होता है। एनएसए का ये पद 1998 में पहली बार उस वक्त बना था जब देश में दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया गया था। पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा थे। यह सरकार में एक अत्यंत महत्वपूर्ण ओहदा है।

जून महीने में 46 भारतीय नर्सों को ईराक में आतंकी संगठन आईएसआईएस ने बंधक बनाया था। नर्सों की वापसी को लेकर उस वक्त खूब हंगामा भी मचा था तब परदे के पीछे नर्सों की सुरक्षित वापसी के लिए जो ऑपरेशन चला उसके मास्टर माइंड अजीत डोभाल ही थे। पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों की नई शुरुआत हो या फिर पश्चिमी देशों

के साथ संबंधों का नया दौर, जानकार मानते हैं कि इन सारी कवायद के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का ही दिमाग काम कर रहा है। गत वर्ष अक्टूबर में पश्चिम बंगाल के वर्धमान में जब बम फटे तो जांच अधिकारियों के साथ खुद अजीत डोभाल घटना स्थल का जायजा लेने वर्धमान पहुंचे थे। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्वयं मौका ए वारदात पर पहुंचे। इसके बाद वधर्मान षडयंत्र के ताले खटाखट खुलते गए।

अजीत डोभाल 1968 बैच के आईपीएस अफसर हैं। डोभाल ने चार साल बाद 1972 में इंटेलीजेंश ब्यूरो ज्वाइन कर लिया था। 46 साल की अपनी नौकरी में महज 7 साल ही उन्होनें पुलिस की वर्दी पहनी क्योंकि डोभाल का ज्यादातर वक्त देश के खुफिया विभाग में गुजरा है। इसीलिए पहली नजर में डोभाल जितने सामान्य नजर आ

ते है उनका करियर उतनी ही करिश्माई रहा है। कामयाबियों से भरा हुआ है। खुफिया ब्यूरो के पूर्व आफिसर बताते हैं कि जब मिजोरम में उपद्रव चरम पर था, तब उस स्थिति को भी बदलने में अहम भूमिका निभाई थी। इसी तरह पंजाब और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को कुचलने में उनका खास रोल था। डोभाल ने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग में छह साल से ज्यादा समय तक काम किया। वह लंदन में भी भारतीय उच्यायोग में

नब्बे के दशक में जब कश्मीर आतंकवाद की आग में झुलस रहा था तब डोभाल ने पाक समर्थित आतंकवादी संगठनों की कमर तोड़ने के लिए कुछ आतंकवादियों को भारत के पक्ष में तोड़ा था। इनमें कूका परे ने पाक समर्थित आतंकियों को चुन चुन कर मारना शुरू कर दिया था। यह और बात है कि कूका परे बाद में विरोधी आतंकियों की गोली का शिकार हो गया था। चार वर्षों तक रहे। डोभाल ने 1999 में वाजपेयी सरकार के दौरान अपहृत किए गए भारतीय विमान आईसी 814 के यात्रियों को कंधार से वापस लाने में भी बड़ी भूमिका निभाई थी।

ajit-dobhal-at-his-native-village-53a6c52fdddec_exlstमिजो नेशनल आर्मी को शिकस्त देकर डोभाल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भी दिल जीत लिया था। यही वजह है कि उन्हें महज 6 साल के करियर के बाद ही इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित भी किया था जबकि ये पुरस्कार 17 साल की नौकरी के बाद ही दिया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल अब कुख्यात आतंकवादी दाउद इब्राहिम को घेरने की रणनीति में जुटे हुए हैं। यही वजह है कि हाल ही में पाकिस्तान ने दाउद की सुरक्षा पाकिस्तानी सेना के सुपुर्द कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ यूएई और ब्रिटेन यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने दुबई और लंदन में दाऊद की सम्पति का काला चिट्ठा वहां की सरकार को दिया है। दरसल अब अजीत डोभाल दुनियाभर में फैले दाऊद के साम्राज्य को खत्म करने के मिशन में जुट चुके हैं जिससे उसकी कमर टूट जाय।

अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड में हुआ। वह गैर सरकारी संस्था विवेकानंद की शाखा विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के निदेशक थे। वह बेहद तेज तर्रार अधिकारी माने जाते हैं। उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 1988 में उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया जो कि आम तौर पर सैन्य बलों को वीरता के लिए दिया जाता है। इसके अलावा वह भारतीय पुलिस पदक पाने वाले सबसे युवा अधिकारी थे।

मनजीत नेगी

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