उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है यहां पर कण-कण में देवी देवताओं का वास देखने को मिलता है। यहां के हर पहाड़ में आपको देवी देवताओं के मंदिर अवश्य देखने को मिलते हैं जो अपने चमत्कारों के कारण पूरे विश्व में विख्यात हैं। उन्हीं मंदिरों में से एक मां ज्वाल्पा देवी का मंदिर है जो पौड़ी गढ़वाल में पड़ता है।
मां ज्वाल्पा देवी मंदिर, उत्तराखंड पौड़ी गढ़वाल जिले के कफोलस्यू पट्टी के नयार नदी के किनारे 350 मीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इस मंदिर की स्थापना 1892 में हुई थी। कोटद्वार-पौड़ी मुख्य मार्ग पर कोटद्वार से ज्वाल्पा मंदिर की दूरी 63 किलोमीटर और पौड़ी से 33 किलोमीटर है। यहां पर श्रद्धालु सारे साल भर मां ज्वाल्पा के दर्शन करने के लिए आते हैं। नवरात्रों के दौरान यहां पर श्रद्धालु विशेष पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं और अष्टमी और नौमी के दिन यहां पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ देखी जाती है उसके बाद अष्टमी के दिन यहां पर भंडारे का आयोजन किया जाता है।
ज्वाल्पा देवी शक्तिपीठ थालियाल और बिष्ट जाति के लोगों की कुलदेवी है। इस शक्तिपीठ में ग्रीष्म और शीतकालीन नवरात्र में विशेष आयोजन होता है। ज्वाल्पा देवी मंदिर के बारे में एक मान्यता है कि इसमें कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की कामना लेकर आती हैं। ज्वाल्पा देवी मंदिर के पुजारी कफोलस्यूं के अणेथ गांव के अणथ्वाल ब्राह्मण हैं, जो कि बारी-बारी से मंदिर में पूजा करते हैं। शुरुआत में थपलियाल ब्राह्मणों द्वारा माता की पूजा का कार्य अणथ्वाल ब्राह्मणों को सौपा गया।
इस समय मंदिर की देखभाल और निर्माण कार्य ‘अणथ्वाल समिति’ और ‘ज्वाल्पा देवी समिति’ के द्वारा किया जाता है। मां ज्वाल्पा मंदिर के भीतर उपलब्ध लेखों के अनुसार ‘ज्वाल्पा देवी’ सिद्धिपीठ की मूर्ति ‘आदिगुरू शंकराचार्य जी’ के द्वारा स्थापित की गई थी। मंदिर के बारे में विश्वास के अनुसार भगवान अपने भक्तों की हर इच्छा को पूर्ण करते है। यहां पर सुन्दर मंदिर के अतिरिक्त भव्य मुख्यद्वार, तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु धर्मशालायें, स्नानघाट, शोभन स्थली व रोड़ से मंदिर स्थल तक पक्की सीढ़ियां के ऊपर टिन की सेट लगी हुई है जिससे कि बरसात या गर्मी के मौसम में श्रद्धालुओं को यहां पहुंचने में कोई असुविधा न हो। इसके अलावा यहां पर संस्कृत विद्यालय भी है। यात्रियों की सुविधा के लिए कुछ दूरी पर गढ़वाल मंडल विकास निगम का विश्राम गृह भी उपलब्ध है
मां ज्वाल्पा देवी की पौराणिक कहानी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, आदिकाल सतयुग में दैत्यराज पुलोम की सुपुत्री देवी शचि ने देवेंद्र अर्थात् राजा इन्द्र को पति के रूप में पाने के लिए, यहां नयार नदी के किनारे मां पार्वती की पूजा व कठोर तपस्या की थी। माता पार्वती ने देवी शचि की तपस्या से खुश होकर उन्हें दीप्त ज्वाला के रूप ने दर्शन दिए तथा उन्हें मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद दिया। देवी शचि को माता पार्वती के द्वारा ज्वाला रूप में दर्शन देने के कारण, इस शक्तिपीठ का नाम ज्वाल्पा देवी पड़ा। देवी शचि को मनवांछित जीवन साथी का वरदान मिलने के कारण, यह शक्ति पीठ कुंवारी कन्याओं को मनवंछित पति का वर देने वाला शक्तिपीठ माना जाता है। इसलिये यहां कुंवारी कन्याएं अपनी मनोकामना मां को बताने और मनवांछित वर का आशीर्वाद लेने आती हैं। माता पार्वती के ज्वाला रूप में प्रकट होने के कारण, माता के प्रतीक स्वरूप यहां लगातार अखंड दीपक प्रज्वलित रहता है। इस पुण्य परम्परा को चलाये रखने के लिए, नजदीकी पट्टियों मवाल्सयूं, कफोलस्यूं, खातस्यू, रिनवाडस्यूं, आदि के गांवों से तेल एकत्रित किया जाता है और मां के अखंड दीप को जलाए रखने की व्यवस्था की जाती है।
यह भी कहा जाता है कि 17वीं शताब्दी में ‘राजा प्रद्युम्नशाह ने मंदिर के लिये 11.82 एकड़ सिचिंत भूमि दान दी थी। इसी भूमि पर उस समय सरसों की खेती की जाती थी जिससे कि अखंडज्योति को जलाये रखने लिये तेल प्राप्त किया जा सके। मंदिर में हमेशा श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। बसन्त पंचमी व नवरात्रों में मेले का आयोजन भी होता है। कहते हैं, सच्चे मन से याद करने से और मां के दर्शन करने से मां ज्वाल्पा देवी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
ज्वाल्पा मंदिर से जुड़ीं स्थानीय लोक कथा
माता ज्वाल्पा की मूर्ति स्थापना की एक स्थानीय दंतकथा भी प्रचलित है जिसके अनुसार यह स्थल प्राचीनकाल में अमकोटी के नाम से विख्यात था। अमकोटी आस पास के गांवों वालों का इधर उधर जाते समय, विश्राम करने का स्थल था। अर्थात् पहले लोग पैदल ही जाते थे, तब लोग थोड़ी देर यहां पर बैठ कर जाते थे। अमकोटी निकटवर्ती इलाके मवालस्यूं, कफोलस्यूं, रिंगवाडस्यूं, घुडदोडस्यूं और गुराडस्यूं आदि विभिन्न इलाकों के ग्रामीण का विसोण रूकने का स्थान था। वे कही से भी आते जाते इस स्थान पर जरूर रूकते थे।
एक दिन कफोला बिष्ट नामक व्यक्ति नमक का कट्टा लेकर इस रास्ते से आ रहा था। इस स्थान पर पहुंचते ही वह नमक का कट्टा नीचे रखकर थोड़ी देर विश्राम के लिए रुक गया और अपने नमक के कट्टे के ऊपर कब उसकी आंख लग गई पता भी नही चला। जब उसकी आंख खुली तो, उसने अपना कट्टा उठाया, लेकिन उठा नही पाया। जब उसने कट्टा खोल के देखा, तो उसमें माता की मूर्ति थी। वह उस मूर्ति को वही छोड़कर भाग गया। तब बाद में नजदीकी अणेथ गांव के दत्ताराम नामक व्यक्ति को सपने में माता ने दर्शन दिये और वही मंदिर बनाये जाने की इच्छा जताई।
ज्वाल्पा देवी मंदिर कैसे जाएं
इस मंदिर में जाने के लिए आप कोटद्वार से सतपुली, पाटीसैंण के रास्ते यहां पहुंच सकते हैं। ज्वाल्पा देवी मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार पड़ता है। कोटद्वार से ज्वाल्पा देवी मंदिर 63 किलोमीटर दूर स्थित है। ज्वाल्पा देवी का निकट हवाई अड्डा देहरादून हवाई अड्डा पड़ता है। देहरादून से ज्वाल्पा देवी की दूरी 168 किलोमीटर है और देहरादून से ज्वाल्पा देवी मंदिर पहुंचने में लगभग 5 घंटे का समय लग जाता है। देहरादून से ऋषिकेश, देवप्रयाग, सतपुली होकर ज्वाल्पा देवी पहुंच सकते हैं।
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