– जयसिंह रावत, देहरादून
विधानसभा की सीधी भर्तियों में भी मंत्रियों, भाजपा के नेताओं और यहां तक कि आरएसएस के नेताओं और मुख्यमंत्री कार्यालय में कार्यरत लोगों के नाम भी आ रहे हैं। इसलिए बदनामी के छींटे सारे सत्ताधारी प्रतिष्ठान पर पड़ रहे हैं। पिछले 6 सालों में भाजपा की सरकारों के कार्यकाल में न तो पहले इतना बबंडर उठा था और ना ही सत्ता पक्ष की इतनी बदनामी हुई थी। इसलिए 2024 के लोक सभा चुनाव के आलोक में केवल दो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ही नहीं बल्कि कई मंत्री भी संकट में नजर आ रहे हैं। चूंकि छींटे मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर भी पड़े हैं, इसलिए इन असाधारण परिस्थितियों में धामी सरकार को भी काफी महफूज नहीं कहा जा सकता है।
असली दोषी तो सिफारिश करने वाले
स्पीकर ऋृतु खण्डूड़ी भूषण ने विधानसभा में बैकडोर नियुक्तियों की जांच का ऐलान तब किया जब धामी सरकार की बदनामी के छींटे दिल्ली तक पहुंचने लगे। इस जांच का दायरा भी 2012 से शुरू किया गया है, क्योंकि सरकार को कांग्रेस के शासनकाल के स्पीकर गोविन्द सिंह कुंजवाल को भी लपेटना था और साबित करना था कि गड़बडियां केवल भाजपा के शासनकाल में ही नहीं हुई।
अब अगर जांच बैठ भी गयी तो स्पीकर ऋतु खण्डूड़ी ज्यादा से ज्यादा पिछली नियुक्तियों को रद्द कर सकती हैं। लेकिन जिनकी सिफारिशों पर विधानसभा में नियुक्तियां हुई उनका वह क्या बिगाड़ लेंगी? जबकि जनता का आक्रोश नौकरी पाने वालों के खिलाफ नहीं बल्कि सत्ता के गलियारे में और सत्ताधारी दल में बैठे सिफारिश करने वाले सफेदपोशों के खिलाफ है।

मंत्रियों पर गिर सकती है गाज
मुख्यमंत्री धामी स्पीकर से विधानसभा की नियुक्तियों की जांच बिठवा कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो जाते। विधानसभा के बाहर सरकारी विभागों में भी बैकडोर नियुक्तियों के नित नये खुलासे हो रहे हैं। पब्लिक डोमेन में मंत्रियों द्वारा नियमों का उल्लंघन कर सीधे नियुक्ति आदेश जारी किये जाने वाले दस्तावेज जारी हो रहे हैं। चूंकि धामी पिछली विधानसभा के अंतिम दिनों में भी मुख्यमंत्री थे और उस दौरान भी कुछ मंत्रियों ने मानमानियां की थीं।
एक मंत्री ने तो बिहार के अपने नाते रिश्तेदारों की नौकरियां शिक्षण संस्थानों में लगवा दीं थी। सहकारिता विभाग में हुई नियुक्तियों के खिलाफ भी बाबाल हुआ मगर जांच नहीं हुई। एक मंत्री ने कुछ लोगों की सीधी नियुक्ति के आदेश तक जारी कर दिये। उस मंत्री से इसीलिए सचिवों की निभी नहीं। इस बार लगता है मोदी-अमित शाह की गाज ऐसे मंत्रियों पर गिर सकती है।
सानिध्य का लाभ उठाकर किया ऐसा कांड
सबसे बड़ा बबंडर अधीनस्थ चयन सेवा आयोग की परीक्षाओं के पेपर लीक मामले में हो रहा है। होगा भी क्यों नहीं? यह गिरोह कई सालों से सरकारी नौकरियां बेचता रहा। हाकम सिंह जैसे माफिया सत्ताधारियों से मधुर सम्बन्धों के बलबूते अरबपति बन गये। सरकार इस मामले में एसटीएफ से जांच करा रही है और उसमें विशेष जांच ऐजेंसी को काफी हद तक सफलता मिल भी रही है।
एसटीएफ ने सरकारी नौकरियों की दलाली कर करोड़ों रुपये कमाने वाले हाकम सिंह सहित इस नेटवर्क से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार तो कर लिया, फिर भी हाकम सिंह की सत्ता के गलियारे में ऊंची पहुंच ने सरकार द्वारा निष्पक्ष जांच कराने के दावे पर सवाल उठा दिये हैं। यह बात सही है कि हाकम सिंह के जिन सत्ताधारियों के साथ फोटो वायरल हो रहे हैं उनका हाकम के काले कारनामों में में शामिल होना जरूरी नही है।
अक्सर हाकम जैसे लोग अपने नापाक इरादों को अंजाम देने में प्रभावशाली या सत्ताधारी लोगों से अपने मतलब के लिए करीबियां बढ़ाते ही हैं और दन करीबियों का प्रचार भी करते हैं। मंत्री या आला अफसर हाकम सिंह के काले कारनामों में साथ हों या न हों मगर उनके कारण हाकम अपना प्रभाव बढ़ाने में कामयाब अवश्य रहा। इसलिए जितने पूर्व और वर्तमान सत्ताधारियों से हाकम की करीबियां रहीं, उनके दामन तक कुछ न कुछ छींटे अनजाने में ही सही, मगर चले तो गये ही हैं। सोशियल मीडिया में हाकम के साथ सत्ताधरियों की तस्वीरों में लोगों को नेताओं के असली चेहरे अब नजर आ रहे हैं।
शुरू से हुई भर्तियों में गड़बड़ी
उत्तराखंड में विधानसभा की भर्तियों में गड़बड़ी की शुरूआत 2000 में इसके अलग राज्य बनने के साथ ही हो गई थी। जब उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड विधानसभा के लिए कर्मचारी भेजे गए, कुछ कर्मचारी ऐसे थे, जो उत्तराखंड के ही थे, उत्तर प्रदेश विधानसभा में सत्र के दौरान अध्यक्ष अस्थाई कर्मचारी रखते थे। इनमें से कई को उत्तराखंड भेज दिया गया। तब राज्य में नई भर्तियों की कोई प्रक्रिया नहीं बनी थी, इसलिए इन अस्थायी कर्मचारियों को ही नियमित कर दिया गया।
स्पीकरों का मनमाना रवैया
उत्तराखंड विधानसभा में मनमानी नियुक्तियां किसी से छिपी नहीं हैं। लेकिन जांच तब हो रही है जब सरकारी विभागों में नौकरियों के रैकेट के खुलासे से बबंडर मच गया। उत्तराखंड में जो अंतरिम विधानसभा बनी थी उसमें प्रकाश पंत अध्यक्ष थे। तब उत्तर प्रदेश विधानसभा से आए अस्थाई कर्मचारियों को नियमित किया गया था और शायद यही कवायद प्रकाश पंत के लिए एक नजीर बनी। यहीं से उत्तराखंड विधानसभा की नियुक्तियों में गड़बड़ी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अब तक चलता रहा।
प्रकाश पंत 2002 में होने वाला विधानसभा चुनाव पिथौरागढ़ से लड़ना चाहते थे बतौर विधानसभा अध्यक्ष उन्होंने अपने कार्यकाल में 130 लोगों नौकरी दी। इनमें से ज्यादातर लोग पिथौरागढ़ के थे। पंत ने राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की बेटी को भी विधानसभा में नौकरी दी। 2002 में उत्तराखंड में पहला विधानसभा चुनाव हुआ इन चुनाओं के बाद कांग्रेस सत्ता में आई और यशपाल आर्य को विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया। पहली चुनी हुई विधानसभा में उन्होंने 85 लोगों को नियुक्त किया।

2007 में प्रदेश की कमान भाजपा को मिली और हरबंस कपूर विधानसभा के अध्यक्ष बने। हरबंस कपूर के कार्यकाल में लगभग 18 नियुक्तियां हुई। इनमें अधिकांश भाजपा के लोग थे। इस समय की नियुक्तियों का पैटर्न यह था कि नियुक्तियां एक-एक, दो-दो करके होती थी। लेकिन 2012 में जब कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की तो गोविंद सिंह कुंजवाल विधासभा अध्यक्ष बने तो यह पैटर्न बदल गया। कंुजवाल ने 2016 के आखिर में 158 लोगों को एक साथ नियुक्त किया। कुंजवाल के कार्यकाल में इतनी बड़ी संख्या में नियुक्तियां की गई, इसलिए इस मामले पर हो-हल्ला मचा।
पूर्व सीएम ने दो बार लौटाई फाइल
फिर 2017 में भाजपा सत्ता में आई और प्रेमचंद अग्रवाल अध्यक्ष बने। इस पद पर आने के बाद उन्होंने नए पदों के सृजन के लिए कोशिश शुरू की। फाइल दो बार त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास पहुंची। मुख्यमंत्री ने फाइल पर नोट किया कि ये नियुक्तियां चयन आयोग के जरिए ही होनी चाहिए। जाहिर है कि मामला तब वहीं थम गया। लेकिन अप्रैल 2021 में त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री के पद से हट गए। उसके बाद नये मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत बने।
इसके बाद अग्रवाल ने नए पदों से संबंधित फाइल तेजी से आगे बढ़ाई। नए पदों के सृजन की मंजूरी मिलने के बाद एक एजेंसी के जरिए 54 पदों के लिए आवेदन मांगे गए और परीक्षा भी हुई। लेकिन इस परीक्षा का नतीजा आता और चयन प्रक्रिया पूरी होती, इसके पहले ही अग्रवाल ने पुराने ढंग से 74 लोगों की नियुक्ति कर ली। इन लोगों ने दिसंबर में नौकरी ज्वाइन भी कर ली लेकिन उस समय के वित्त सचिव अमित नेगी ने इसकी वित्तीय मंजूरी नहीं दी। इस वजह से इन लोगों की तनख्वाह नहीं मिल रही थी।
प्रेमचंद अग्रवाल ने दी वित्तीय मंजूरी
वर्ष 2022 में भाजपा फिर सत्ता में आई और नई सरकार में प्रेमचंद अग्रवाल को दो महत्वपूर्ण मंत्रालय मिले। इनमें एक है संसदीय कार्य और दूसरा है वित्त। जिस दिन अग्रवाल ने मंत्री पद का कार्यभाल संभाला, उसी दिन उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर फाइल आगे बढ़ाई और कहा कि इतने पदों की मंजूरी दे दी गई है और इसे वित्तीय मंजूरी दी जाए। दिलचस्प बात यह है कि उसी दिन बतौर वित्त मंत्री उन्होंने इन पदों को वित्तीय मंजूरी दे दी और इन लोगों को तनख्वाह मिलने लगी।
मतलब विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर जो नियुक्तियां प्रेमचंद अग्रवाल ने की थी, उन्हें जरूरी कानूनी वैधता देने का काम संसदीय कार्य और वित मंत्री के तौर पर कर दिया और जब विधानसभा की भर्तियों ने तूल पकड़ने लगा तो तब प्रेमचंद अग्रवाल ने बयान दिया कि यह उनका विशेषाधिकार था। इसके बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया।
अब जब इन नियुक्तियों पर जांच के आदेश दे दिए गए हैं तो प्रेमचंद अग्रवाल कहते हैं कि मैंने एक भी नियुक्ति गलत ढंग से नहीं की। जांच से सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा। विधानसभा की हुई नियुक्तियों में अभी स्थिति यह है कि 2012 से पहले की सभी नियुक्तियों को नियमित कर दिया गया है।
हर विधानसभा अध्यक्ष ने अपनी मनमर्जी से जो नियुक्तियां की हैं, उसका परिणाम यह हुआ कि 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा से अधिक कर्मचारी 70 सदस्यों वाली विधानसभा में हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा में तकरीबन 500 कर्मचारी हैं जबकि उत्तराखंड विधानसभा में यह संख्या 550 के आसपास है।

आरएसएस नेताओं ने भी धोये बहती गंगा में हाथ
भाजपा में एक संगठन महामंत्री होता है जिसका चुनाव या नियुक्ति संगठन नहीं बल्कि आरएसएस करता है। भले ही प्रदेश संगठन की कार्यकारिणी भंग हो जाये मगर संगठन मंत्री या महामंत्री अपने पद पर तब तक बना रहता है जब तक आरएसएस चाहे। वह न केवल सरकार पर नजर रखता है, अपितु सरकार को इशारे पर चलाता भी है।
विधानसभा में आरएसएस के कुछ नेताओं के प्रभाव से भी नियुक्तियां हुई हैं। विधानसभा अलावा भी मंत्रियों के मार्फत ऐसे नेताओं को अपने-अपनो को एडजस्ट करने के अवसर मिले होंगे। बैकडोर नियक्तियों में मुख्यमंत्री के निजी स्टाफ के लोगों के भी नाम आ रहे हैं। चारों तरफ से घिरने के बावजूद अगर धामी सरकार स्वयं को महफूज मान रही है तो वह बहुत ही गफलत में है।
लोकसभा चुनाव के कारण महफूज नहीं धामी सरकार
लोकसभा के 2024 में होने वाले चुनाव की तैयारियां अगले साल 2023 से शुरू हो जानी हैं जिसके लिए अब कुछ ही महीने बचे हुये हैं। ठीक लोकसभा चुनाव से पहले इतना जनाक्रोश और ऐसी बदनामी शायद ही भाजपा शीर्ष नेतृत्व को सहन करेगा।
वैसे भी उत्तराखंड की 5 लोकसभा सीटों में से हरिद्वार और नौनीताल सीट पर भाजपा की गत विधानसभा चुनावों में खराब स्थिति रही और इन दो सीटों पर ही कांग्रेस की नजर टिकी हुयी है। इसलिए भाजपा पाक साफ पार्टी होने का दंभ भरने के लिए किसी की भी बलि चढ़ा सकती है।
बदनामी के इन छींटों को धोने के लिए विधानसभा में हुई तदर्थ नियुक्तियां तो रद्द होंगी ही साथ ही धामी मंत्रिमंडल में कुछ पर गाज गिर सकती है। हालांकि फिलहाल मुख्यमंत्री धामी की कुर्सी सुरक्षित कही जा सकती है, फिर भी सरकार को दीर्घजीवी कतई नहीं कहा जा सकता।
अगर विधानसभा की नियुक्तियों के बारे में कठोर निर्णय लेने पर ऋतु खण्डूड़ी की लोकप्रियता का ग्राफ उछल गया तो फिर सत्ता के खेल में उलट पुलट होने में देर नहीं लगेगी। वैसे भी ऋतु खण्डूड़ी के साथ उनके पिता की राजनीतिक विरासत भी है। ऋतु खण्डूड़ी की दिल्ली में सक्रियता पर भी सत्ता के दावेदार धड़ों की पैनी नजर रहती है।
प्रकाश पंत, भाजपा
इनका कार्यकाल 12 मार्च 2001 से 14 मार्च 2002 तक रहा। इनके कार्यकाल में उत्तराखंड विधानसभा में नेताओं के परिजनों को नियुक्त किया गया। इसमें मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की बेटी शामिल हैं।
यशपाल आर्य, कांग्रेस
इनका कार्यकाल 15 मार्च 2002 से 11 मार्च 2007 तक रहा। इनके कार्यकाल के दौरान विधानसभा में नेताओं के परिजनों की 85 नियुक्तियां हुई।
हरबंस कपूर, भाजपा
इनका कार्यकाल 12 मार्च 2007 से 13 मार्च 2012 तक रहा। इनके कार्यकाल के दौरान लगभग 18 नियुक्तियां हुई।
गोविंद सिंह कुंजवाल, कांग्रेस
इनका कार्यकाल 26 मार्च 2012 से 20 मार्च 2017 तक रहा। उन्होंने अपने कार्यकाल में 158 लोगों को विधानसभा में नियुक्त किया। जिसमें उनके परिवार के आठ लोग भी शामिल थे।
प्रेमचंद अग्रवाल, भाजपा
इनका कार्यकाल 23 मार्च 2017 से 21 मार्च 2022 तक रहा। इनके कार्यकाल में 74 नियुक्तियों हुई। जिसमें भाजपा नेताओं और आरएसएस के पदाधिकारियों के परिजनों को नियुक्त किया गया।
रितु खंडूरी भूषण, भाजपा
इनका कार्यकाल 26 मार्च 2022 से शुरू हुआ है। रितु खंडूरी के कार्यकाल में अभी कोई नियुक्ति नहीं हुई है। उन्होंने इन घोटालों की जांच के लिए एक समिति गठित की है।


Leave a comment