उत्तराखंड सरकार ने इस साल इगास के दिन अवकाश की घोषणा की है। गढ़वाल में इसे इगास और कुमाउंनी में इसे बूढ़ी दीवाली के रूप में मनाया जाता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के सभी लोगों को ट्वीट करके इस त्यौहार की बधाई दी है। उन्होंने ट्वीट किया लोकपर्व इगास हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है जो हमें अपनी जन्मभूमि से जोड़ता है तो आइए हम सभी मिलकर रिवर्स पलायन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करें।
उत्तराखंड सरकार ने बूढ़ी दीवाली/इगास के शुभ अवसर पर “#SelfieWithFamily” अभियान के अंतर्गत 3 भाग्यशाली विजेताओं को प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान करने का निर्णय लिया है। यह त्यौहार मनाते हुए आप भी अपने परिवार के साथ सेल्फी लेकर हमे भेजे और आकर्षक उपहार जीतने का अवसर प्राप्त करें।
लोकपर्व इगास हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है जो हमे अपनी जन्मभूमि से जोड़ता है तो आइए हम सभी मिलकर रिवर्स पलायन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करें। #इगास
— Office Of Pushkar Singh Dhami (@OfficeofDhami) November 3, 2022
शहर के शायद ही किसी बच्चे ने इगास के बारे में सुना होगा। दरअसल आजकल पहाड़ के बच्चों को भी इगास का पता नहीं है कि इगास नाम का कोई त्यौहार भी है। दरअसल पहाडियों की असली दीपावली इगास ही है, जो दीपोत्सव के ठीक ग्यारह दिन बाद मनाई जाती है।
दीपोत्सव को इतनी देर में मनाने के दो कारण हैं। पहला और मुख्य कारण ये कि – भगवान श्रीराम के अयोध्या वापस आने की खबर सूदूर पहाडी निवासियों को ग्यारह दिन बाद मिली और उन्होंने उस दिन को ही दीपोत्सव के रूप में हर्षाेल्लास से मनाने का निश्चय किया। बाद में छोटी दीपावली से लेकर गोवर्धन पूजा तक सबको मनाया, लेकिन ग्यारह दिन बाद की उस दीपावली को नहीं छोडा।
पहाडों में दीपावली को लोग दीए जलाते हैं, गौ पूजन करते हैं, अपने ईष्ट और कुलदेवी कुलदेवता की पूजा करते हैं, नई उड़द की दाल के पकौड़े और गहत की दाल के स्वांले (दाल से भरी पूडी़) बनाते हैं।

दीपावली और इगास की शाम को सूर्यास्त होते ही हर घर के द्वार पर ढोल दमाऊ के साथ बडई (एक तरह की ढोल विधा) बजाते हैं फिर लोग पूजा शुरू करते हैं, पूजा समाप्ति के बाद सब लोग ढोल दमाऊ के साथ कुलदेवी या देवता के मंदिर जाते हैं और वहां पर मंडाण (पहाडी नृत्य) नाचते हैं, चीड़ की राल और बेल से बने भैला (एक तरह की मशाल) खेलते हैं, रात के बारह बजते ही सब घरों से इकट्ठा किया सतनाजा (सात अनाज) गांव की चारों दिशा की सीमाओं पर रखते हैं। इस सीमा को दिशाबंधनी कहा जाता है इससे बाहर लोग अपना घर नहीं बनाते। ये सतनाजा मां काली को भेंट होता है।
भारत के बहुत से उत्सव लुप्त हो चुके हैं। बहुत से उत्सव तेजी से पूरे भारत में फैल रहे हैं जैसे महाराष्ट्र का गणेशोत्सव, बंगाल की दुर्गा पूजा, पूर्वांचल की छठ पूजा, पंजाब का करवाचौथ, गुजरात का नवरात्रि में मनाया जाना वाल गरबा डांडिया आदि।
लेकिन पहाडी त्यौहार इगास लुप्त होने वाले त्यौहारों की श्रेणी में है। इसका मुख्य कारण है बढता बाजारवाद तथा क्षेत्रीय लोगों की उदासीनता और पलायन है। धन्यवाद है उत्तराखंड की राज्य सरकार का जिसने इसे राज्य का मुख्य त्यौहार का दर्जा देकर इस अवसर पर सरकारी अवकाश की घोषणा की।


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