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पहाड़ों की ओर लौटने के अभियान के पांच साल

उत्तराखंड की संस्कृति, भाषा, परंपराएं, तीर्थ, ऊंचे पहाड़ और मन की गहराइयों तक उतर जाने वाला नदियों और गदेरों का कल-कल निनाद हो या मंदिरों में बजने वाले शंख और घंटियों का अनहद नाद। पर्वतों की खामोशी हो या प्रकृति का अप्रतिम संगीत। पहाड़ की

उत्तराखंड की संस्कृति, भाषा, परंपराएं, तीर्थ, ऊंचे पहाड़ और मन की गहराइयों तक उतर जाने वाला नदियों और गदेरों का कल-कल निनाद हो या मंदिरों में बजने वाले शंख और घंटियों का अनहद नाद। पर्वतों की खामोशी हो या प्रकृति का अप्रतिम संगीत। पहाड़ की इस लय को दूर परदेस में बैठे हर व्यक्ति तक पहुंचाने की कोशिश में शुरू हुआ हिल-मेल का सफर अपने पांच वर्ष पूरे कर चुका है। इस कालखंड में हिल-मेल ने उत्तराखंड के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों को न केवल उपयुक्त मंचों पर उठाया बल्कि पूरी प्रतिबद्धता के साथ पहाड़ से जुड़े हर मुद्दे पर वैचारिक विमर्श सामने रखा। उत्तराखंड की महाआपदा के बाद वहां के हालात और पुननिर्माण कार्यों की पड़ताल जारी रखी। साथ ही हिल-मेल का निरंतर यह प्रयास भी रहा कि पहाड़ से दूर रहने वाले लोगों को फिर पहाड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करें और प्रवासी उत्तराखंडी अपनी मातृभूमि से जुड़ें। पहाड़ में अपने वीरान होते जा रहे गांवों-खेत खलिहानों के लिए कुछ न कुछ करें। हिल-मेल ने बिना किसी पूर्वाग्रह के उत्तराखंड की सही तस्वीर सामने रखी और पहाड़ के आखिरी आदमी की आवाज की आवाज बना।
केदारनाथ में हुई विनाशलीला के बाद पर्वतपुत्रों समेत समूचे देश की आस्था के केंद्र केदारपुरी के पुनर्निर्माण पर हिल-मेल का खासा जोर रहा। इसी कड़ी में 2014 में केदारनाथ पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। केदारनाथ आपदा और आगे का रास्ता नाम से एक विजन डॉक्यूमेंट भी पेश किया गया। यह प्रयास आगे भी जारी रहा। इसके बाद उत्तराखंड से जुड़े तमाम हितधारकों, बुद्धिजीवियों और विशेषज्ञों के साथ हिल-मेल ने वर्ष 2015 में ‘केदारनाथ का पुनर्निर्माण और उत्तराखंड का नव निर्माण’ नाम से एक वैचारिक विमर्श भी लोगों के सामने रखा। यह हिल-मेल के सरोकारी कोशिशों के कुछ चमकते उदाहरण हैं।
हिल-मेल वेबसाइट का शुभारंभ वर्ष 2012 में किया गया था। इसके बाद दिल्ली के कांस्टीट्यूसन क्लब में पहली मार्च 2013 को उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूड़ी और तत्कालीन नौसेना अध्यक्ष एडमिरल डी के जोशी ने संयुक्त रूप से हिल-मेल वेबसाइट का विधिवत शुभारंभ किया। इन पांच वर्षों में हिल-मेल ने पहाड़ से जुड़े मुद्दों को अपने पोर्टल के माध्यम से पुरजोर तरीके से उठाने का काम किया है।
इसके अलावा हिल-मेल ने विगत चार वर्षों में केदारनाथ आपदा और उससे मिले सबक को लेकर समय-समय पर कई स्तर पर चर्चा और गोष्ठियों का आयोजन किया। पहली मार्च 2014 को हिल-मेल ने केदारनाथ आपदा को लेकर ऋषिकेष में एक सेमिनार का आयोजन किया था। उसके बाद 9 मई 2015 को नई दिल्ली के कांस्टीट्यूसन क्लब में एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत कई विशेषज्ञ वक्ताओं ने पहाड़ में आपदा से निपटने को लेकर की जाने वाली तैयारियों पर अपने विचार व्यक्त किए। हिल-मेल उत्तराखंड की पहली पत्रिका है जिसने ‘केदारनाथ आपदा और आगे का रास्ता’ नाम से एक विजन डॉक्यूमेंट प्रस्तुत किया।
हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हम पहाड़ की जनता की आवाज को उचित मंच तक पहुंचाने का माध्यम बने हैं। उत्तराखंड के गठन को कई वर्ष बीत जाने के बाद भी आम जनता की अपने प्रतिनिधियों और रोजमर्रा के कामों से जुड़े अधिकारियों तक सीधी पहुंच नहीं बन पाई। लोगों की हक-हकूक की आवाज या तो पहाड़ों में ही कहीं गुम हो जाती या फिर अनसुनी कर दी जाती। हम पहाड़ से आने वाली किसी भी आवाज को संबंधित नेताओं, अधिकारियों और विभागों तक पहुंचाने की कोशिश के अपने अभियान को आगे बढ़ाते हुए हिल-मेल फाउंडेशन ने फरवरी 2016 में हिल-मेल पत्रिका की शुरूआत की। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े।
हिल-मेल के विचारों को साकार करते समय हमेशा यह बात उभर कर सामने आई कि पहाड़ के बारे में इंटरनेट पर काफी कुछ होने के बाद भी एक अधूरापन है या यूं कहें कि सामग्री तो है लेकिन बेहद बिखरी हुई। इसे एक लड़ी में पिरोना जरूरी है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए हिल-मेल आगे बढ़ रहा है। हमने जहां हिल-मेल पोर्टल और हिल-मेल पत्रिका के माध्यम से संगठित प्रयास किया है वहीं वैचारिक आयोजनों के जरिए हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं पर चिंतन पेश किया है।
बहुत कम समय में हिल-मेल ने पहाड़ से जुड़ी हर उस शख्सियत को अपने साथ जोड़ा है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में शीर्ष पर पहुंचकर उत्तराखंड का नाम रोशन किया है। ये प्रबुद्ध लोग न केवल हिल-मेल के साथ जुड़े हैं, बल्कि हिल-मेल के मंच से पहाड़ की चिंता और समस्याओं के समाधान पर अपनी राय रख रहे हैं। हिल-मेल प्रवासी भारतीयों को एक साथ लाने के लिए जहां साल में दो बार मिलन कार्यक्रम आयोजित करता है वहीं उसने 2016 में उत्तराखंड के 50 प्रभावशाली व्यक्तियों की रैंकिंग भी जारी की। हिल-मेल के इस प्रयास को भी काफी सराहा गया। इसके अलावा विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट काम करने वाले लोगों को हर वर्ष हिल-रत्न सम्मान भी प्रदान किया जाता है।
हिल-मेल ने पहाड़ के उत्पादों को संरक्षण देने के लिए भी अभिनव पहल की है। हिल-मेल के हर आयोजन में पहाड़ में पैदा होने वाले अनाजों को न केवल प्रमोट किया जाता है बल्कि पहाड़ी व्यंजनों को ही परोसा जाता है। हिल-मेल ने अपने आयोजनों के जरिए पहाड़ की सभी प्रमुख शख्सियतों को साथ लाने का काम किया है। चाहे वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल हों या राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत। चाहे वह सेना प्रमुख बिपिन रावत हों या कोस्टगार्ड के महानिदेशक राजेंद्र सिंह। हाल ही में उत्तराखंड सदन में भी इस तरह का प्रवासी मिलन कार्यक्रम रखा गया। इसमें एनएसए डोभाल, सीएम त्रिवेंद्र रावत, सेनाप्रमुख रावत, एनटीआरओ के प्रमुख आलोक जोशी, कोस्ट गार्ड प्रमुख राजेंद्र सिंह, गेल के सीएमडी बीसी त्रिपाठी, एयरइंडिया के तत्कालीन सीएमडी अश्विनी लोहानी, ओएनजीसी के डायरेक्टर एचआर डीडी मिश्रा, गेल की डायरेक्टर मार्केटिंग गजेंद्र सिंह, हंस फाउंडेशन के संरक्षक भोलेजी महाराज और गुरुमाता मंगला और पत्रकार मंजीत नेगी समेत कई प्रबुद्ध शख्सियतें शामिल हुईं। इससे पहले, एनएसए डोभाल ने भी इन शख्सियतों को अपने यहां भोज पर आमंत्रित किया था।
उत्तराखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में हिल-मेल फाउंडेशन की ओर से भी कई जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसमें बागवानी, पौधरोपण के अलावा स्वच्छता अभियान पर स्कूलों में विशेष सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। इस समय हिल-मेल फाउंडेशन, हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर इनवायरमेंट इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट (हाईफीड) के साथ मिलकर उत्तराखंड के तीन गांवों में महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम चला रहा है। ओएनजीसी द्वारा वित्त पोषित इस कार्यक्रम में महिलाओं को आॅफ सीजन में आर्गेनिक सब्जियों के उत्पादन के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

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