डा. अजीत सिंह नैन ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूप-रेखा के बारे में बताया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित मुख्य अतिथि डा. एम. महापात्र का स्वागत करते हुए बताया कि डा. महापात्र को ‘साइकलोन मैन’ के रूप में जाना जाता है।
इस अवसर पर सम्मेलन के मुख्य अतिथि डा. एम. महापात्रा ने सम्मेलन के आयोजन को सामयिक बताते हुए पंतनगर विश्वविद्यालय की देश की खाद्य सुरक्षा में किये जा रहे योगदान की सराहना की। डा. महापात्रा ने बदलते मौसम के कारण आने वाली चुनौतियों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में विभिन्न कारणों से हो रहीं हानियों को कम करना ताकि लाभ को बढ़ाना, लद्यु एवं सीमान्त कृषकों को जोत का आकार बहुत छोटा होने, भूमिगत जल में लगातार कमी होने, प्राकृतिक आपदा, वर्षा आधारित खेती में प्राकृतिक आपदा का अधिक प्रभाव तथा त्रुटिपूर्ण वर्षात आदि के कारण कृषकों की आमदनी कम होती है। वहीं खाद्यान्न सुरक्षा पर प्रश्न खड़ा होता है। अतः बदलते वातारण की चुनौतियों के मध्य देश की जनसंख्या का ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न उत्पादन को निरन्तर बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
सम्मेलन के उद्घाटन सम्बोधन करते हुए प्राध्यापक डा. सर्ज सावरी ने कहा कि भारत ऐसा देश है जिसकी खाद्यान्न उत्पादन की असीमित क्षमता है। उन्होंने वैश्विक, भारत देश तथा पंतनगर के परिप्रेक्ष्य में खाद्य सुरक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए खाद्य सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की तथा पंतनगर विश्वविद्यालय में ‘वैश्विक खाद्य सुरक्षा केन्द्र’ स्थापित करने की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। डा. पी. रामासुन्दरम ने कहा कि पंतनगर विश्वविद्यालय वैश्विक खाद्य सुरक्षा विषय पर सम्मेलन हेतु सबसे उपयुक्त स्थान है। विश्व के कई देशों में खाद्य सुरक्षा की कमी है। खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण युक्त खाद्य उत्पादन पर भी बल दिये जाने की आवश्यकता है।

विश्वविद्यालय के कुलपति डा. मनमोहन सिंह चौहान ने भारत में कृषि, औद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य आदि विभिन्न क्षेत्रों में हुई प्रगति पर आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि हम खाद्यान्न सुरक्षा में आत्मनिर्भर है, परन्तु पोषकयुक्त भोजन की आवश्यकता है क्योंकि अभी भी 20 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं, 4 प्रतिषत बच्चों का शारीरिक विकास असंतोषजनक है तथा 13 प्रतिशत बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। कुपोषण की समस्या से निजात पाने के लिए मूल-भूत, रणनीति और मांगपरक शोध करने की आवश्यकता है। हमें लीक से हटकर कार्य करने की जरूरत है। निदेशक संचार डा. जे.पी. जायसवाल ने बताया कि यह सम्मेलन विश्वविद्यालय में खाद्य सुरक्षा केन्द्र के स्थापना के लिए सूत्रधार है।
डा. के.पी. सिंह ने खाद्यान्न सुरक्षा में कृषि वैज्ञानिकों के योगदान को सराहते हुए विभिन्न विश्वविद्यालयों में कृषि के क्षेत्र में शिक्षा पा रहे विद्यार्थियों की संख्या का उल्लेख किया तथा कृषि के क्षेत्र में अध्ययन को अत्यधिक सुदृढ़ बनाने के लिए वैज्ञानिकों को स्वायत्ता प्रदान करने पर बल दिया।
विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. तेज प्रताप ने बताया कि खाद्य सुरक्षा एकल, पारिवारिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय जैसे विभिन्न चरणों से होकर गुजरती है। उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा का अभिप्राय अनाज सुरक्षा से नहीं होना चाहिए अपितु कृषि के अन्य क्षेत्रों जैसे दूध, दही, मत्स्य, तेलीय, दलहन आदि की सुरक्षा से भी सम्बन्धित होना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों का सही रूप में उपयोग भी खाद्य सुरक्षा का एक आयाम है।
सम्मेलन में डा. पॉल डी. इस्कर, पेनसेल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी, यूएसए; डा. एल. विलोकेट; डा. अजय कोहली, उपमहानिदेशक शोध, अन्तर्राष्ट्रीय चावल अनुंसधान संस्थान, फिलीपिंस; डा. यू.एस. सिंह, क्षेत्रीय समन्वयक, अन्तर्राष्ट्रीय चावल अनुंसधान संस्थान, वाराणसी; डा. लक्ष्मीकांत, निदेशक, विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा; डा. एम. मधु, निदेशक, भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, देहरादून; के साथ विश्व के अन्य देशों यथा अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों से भी वैज्ञानिक ऑनलाइन जुड़कर सम्मेलन को संबोधित किया। विश्वविद्यालयों सभी अधिष्ठाता, निदेशक, संकाय सदस्य तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया। सम्मेलन के आयोजन सचिव डा. के.पी. सिंह ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।


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